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​गुंबद हो या दीवारें, मुगलों के देश उज्बेकिस्तान में इमारतें नीली क्यों हैं?

हिन्दुस्तान पर मुगलों ने 300 सालों से ज्यादा तक समय तक राज किया. सल्तनत की नींव उज्बेकिस्तान से आए बाबर ने रखी थी, इस देश की तस्वीरें देखेंगे तो पाएंगे कि यहां गुम्बद हों या पूरी इमारत सब कुछ नीला नजर आता है. समरकंद का रेगिस्तान स्क्वायर हो या बीबीखानम मस्जिद, हर इमारत मानो आसमान का एक टुकड़ा जमीन पर उतार लाई हो. लेकिन कभी सोचा है कि यहां के ज्यादातर पए निर्माण हों या पुरानी इमारतें, ये नीली क्यों नजर आती हैं. इनका नीला रंग सिर्फ इसकी खूबसूरती तक सीमित नहीं है. इसका भी अपना एक मतलब है. हालांकि इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं.

​गुंबद हो या दीवारें, मुगलों के देश उज्बेकिस्तान में इमारतें नीली क्यों हैं?

नीले रंग का कनेक्शन 14वीं15वीं सदी के तैमूर साम्राज्य से जुड़ा है. तैमूर जिसे तैमूरलंग भी कहा जाता है, उसने अपनी राजधानी समरकंद को दुनिया के सबसे शानदार शहरों में बदलने की ठानी थी. उसने अपने विजय अभियानों के दौरान अलगअलग देशों से बेहतरीन कारीगरों, वास्तुकारों और शिल्पकारों को समरकंद बुलाया. इन्हीं कारीगरों ने एक नई तरह वास्तुकला शैली गढ़ी, जिसमें नीले रंग की टाइल्स का इस्तेमाल प्रमुख से किया जाता था. तैमूर के बाद उसके पोते उलुगबेक ने भी इस विरासत को आगे बढ़ाया और समरकंद को शिक्षा और खगोल विज्ञान का बड़ा केंद्र बना दिया.

नीले रंग का खास मतलब

नीला रंग सिर्फ सजावट के लिए नहीं चुना गया था, इसके पीछे गहरा प्रतीकात्मक अर्थ भी है. मध्य एशिया और फारस की परंपरा में हमेशा से ही नीला रंग आसमान, पानी और सुरक्षा का प्रतीक माना या है. इस्लामी वास्तुकला में यह रंग अनंत आकाश, स्वर्ग और ईश्वरीय पवित्रता से जोड़कर देखा गया. इस्लामी परंपरा में इमारतों को इंसानी या पशु आकृतियों से सजाने की मनाही थी, इसलिए कारीगरों ने ज्यामितीय पैटर्न, कैलिग्राफी और रंगों के जरिए ही अपनी कलात्मकता का नमूना पेश किया और वो सर्वश्रेष्ठ उदाहरण साबित हुआ. नीले गुंबद इस सोच का सबसे खूबसूरत उदाहरण बने, मानो हर इमारत आसमान और स्वर्ग से जुड़ने का एक रास्ता हो.

मध्य एशिया और फारस की परंपरा में हमेशा से ही नीला रंग आसमान, पानी और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है. फोटो: pexels

टाइल्स के रंगों में छिपा राज

नीले रंग के पत्थरों में विज्ञान छिपा है. नीले रंग असल में अलगअलग धातुओं के ऑक्साइड से बनी चमकदार परत से आते हैं. गहरा कोबाल्ट ब्लू रंग कोबाल्ट ऑक्साइड से बनता था, जबकि हल्का फिरोजी रंग तांबे से मिलता था. कई बार महंगे लापिस लाजुली पत्थर से मिलतेजुलते असर के लिए भी कोबाल्ट का इस्तेमाल किया जाता था, क्योंकि असली लापिस लाजुली सिर्फ अफगानिस्तान की खदानों में मिलता था और बेहद कीमती था. कारीगर इन रंगीन टाइलों को बेहद बारीकी से काटकर मोजेक की तरह जोड़ते थे, जिसे ‘मुशब्बक’ तकनीक कहा जाता है. कई जगह पहले टेराकोटा पर नक्काशी की जाती, फिर उस पर टर्कोइज और कोबाल्ट की चमकदार चढ़ाई जाती, जिससे धूप में टाइल्स कीमती रत्नों की तरह चमकती थीं.

उज्बेकिस्ताान के समरकंद में बनी रेगिस्तान मस्जिद. फोटो: pexels

समरकंद और बुखारा जैसे शहर प्राचीन सिल्क रोड यानी रेशम मार्ग पर स्थित थे, जो चीन को ईरान, भारत और यूरोप से जोड़ता था. इस व्यापारिक रास्ते से न सिर्फ माल, बल्कि कला, तकनीक और कारीगर भी एक जगह से दूसरी जगह पहुंचते थे. फारस से आए कुम्हारों और शिल्पकारों ने ही मध्य एशिया में ग्लेज्ड टाइलों की यह तकनीक फैलाई. यही वजह है कि उज्बेकिस्तान की वास्तुकला में फारसी, अरबी और मंगोल प्रभावों का खूबसूरत मेल देखने को मिलता है. रंगीन टाइलों से सजी इमारतें उस दौर में धन, सत्ता और सांस्कृतिक श्रेष्ठता दिखाने का भी एक जरिया थीं.

मुगल बादशाह बाबर.

समरकंद कहलाता है नीले गुंबदों का शहर

दुनिया भर में समरकंद को सिटी ऑफ ब्लू डोम्स’ भी कहते हैं. यहां रेगिस्तान स्क्वायर के तीन भव्य मदरसे, बीबीखानम मस्जिद और शाहएजिंदा मकबरों की कतार, हर जगह नीले गुंबद और दीवारें नजर आती हैं. यूनेस्को ने साल 2001 में समरकंद को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था. स्थानीय लोगों के लिए ये इमारतें सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पहचान और पूर्वजों की विरासत का प्रतीक हैं.

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