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​हर साल कपड़ों का 9.2 करोड़ टन कचरा… ट्रेंड से परेशान है एनवायरमेंट?

आज क्या पहनूं ऑफिस जाने की जल्दी में नेहा ने अलमारी खोली तो सारे कपड़े उसके ऊपर ही आ गिरे. जींस,टॉप कुर्ते, ट्राउजर अलमारी भरी हैं लेकिन मन भारी हैं कि पहनने को कुछ है ही नहीं या दुविधा है क्या पहनूं. जल्दी में निकाला एक पुराना कुर्ता और पहन लिया .शाम को मोबाइल पर ऑनलाइन सेल का नोटिफिकेशन आता है. नया टॉप देखकर वो तुरंत कार्ट में डाल देती है.

​हर साल कपड़ों का 9.2 करोड़ टन कचरा… ट्रेंड से परेशान है एनवायरमेंट?

ये सिर्फ नेहा की कहानी नहीं हैं नेहा में बहुत सी लड़कियों को अपनी परेशानी नजर आ सकती है.जरूरत से ज्यादा कपड़े फैशन, ट्रेंड, सेल और ऑनलाइन शॉपिंग की वजह से अलमारी में जमा होते जा रहे हैं.

फास्ट फैशन ने बदला कपड़े खरीदने का पैटर्न

फास्ट फैशन मतलब ऐसे कपड़े जिनका ट्रेंड जितनी तेजी से आता है उतनी ही तेजी से चला भी जाता है. कोई एक ट्रेंड आया,देखते ही देखते वैसे कपड़े ना सिर्फ बाजार भर में दिखे ऑनलाइन भी वहीं सब दिखने लगा. और कीमत भी कम है तो खरीदना भी आसान है. ऑनलाइन शॉपिंग ने इसमें एक और पैसिलिटी जोड़ दी कि बस फ़ोन उठाया देखा और ऑर्डर हो गया. कई बार तो ऐसा भी होता है, आप फ़ोन पर कुछ और काम कर रहें होते हैं लेकिन 70% ऑफ का नोटिफिकेशन या लिमिटेड टाइम ऑफर या स्पेशल डील देखकर आप काम गए भूल और खरीद लिया डिस्काउंटेड पीस. जरूरत हो या नहीं.

इसलिए कपड़े खरीदने और उन्हें पहनने के बीच का समय लगातार कम होता जा रहा है. यूनाइटेड नेशन एनवायरमेंट प्रोग्राम के हिसाब से साल 2000 से 2015 के बीच कपड़ों का प्रोडक्शन दोगुना हुआ, लेकिन लोग अब कपड़ों को पहले के मुकाबले कम समय तक पहनते हैं यानि कम रिपीट करते हैं.

हर साल कपड़ों का 9.2 करोड़ टन कचरा

अब इस खरीदारी का बड़ा असर जान लेते हैं. दुनिया में हर साल करीब 9.2 करोड़ टन टेक्सटाइल वेस्ट पैदा होता है. यानी हर सेकंड लगभग एक कचरा ट्रक जितने कपड़े लैंडफिल या जलाने के लिए जा रहा है. बात सिर्फ पुराने कपड़ों की नहीं है. जो कपड़े कम पहने जाते हैं, जल्दी पुराने लगने लगते हैं या ट्रेंड से बाहर हो जाते हैं, वे भी इसी कचरे में शामिल होते हैं. अलमारी में जगह कम होने की समस्या धीरेधीरे शहरों के कचरे की समस्या बनती जा रही है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर शिमला में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज के फैलो संजय भट्ट कहते हैं वेस्ट यानि कचरा एक ऐसी चीज है जिसके जिम्मेदारी ना तो कंपनियों ने ली है ना सरकारों ने. ना हीं कंपनियों ने इसके लिए कोइ फैसिलिटी रखी.

दूसरी बात हमें बचपन में कभी नहीं सिखाया गया कि वेस्ट हमारी जिम्मेदारी है अब अगर कंपनियों का वॉल्यूम बढ़ेगा तो वेस्ट बढ़ेगा. सरकार को वेस्ट मैनेजमेंट का अलग विभाग बनाना चाहिए. वेस्ट मैनेजमेंट की टैकनीक महंगी है आम आदमी नहीं कर सकता और अमीर इसलिए इसमें नहीं पड़ते क्योंकि कचरा सुनते ही रिस्पेक्टबल नहीं लगता .

एक ड्रेस बस एक कपड़ा नहीं

एक कपड़ा तैयार होने से पहले कई स्टेज से गुजरता है. फाइबर तैयार होता है, कपड़ा बनता है, रंगाई होती है, सिलाई होती है और फिर पैक होकर दुकान या हमारे घर तक पहुंचता है. इस पूरे प्रोसेस में पानी और एनर्जी लगती है.यूएनईपी कहता है टेक्सटाइल इंडस्ट्री हर साल 86 मिलियन ओलंपिक साइज के स्विमिंग पूल के बराबर पानी इस्तेमाल करती है.

दुनिया में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में टेक्सटाइल इंडस्ट्री की हिस्सेदारी करीब 2 से 8 फीसदी है. कपड़ों में इस्तेमाल होने वाले सिंथेटिक फाइबर भी चिंता की वजह हैं. साल 2023 में दुनिया के सिर्फ करीब 8 फीसदी टेक्सटाइल फ्रेबिक रीसाइकिल्ड सोर्स से आए थे.

रीसाइकिल करना भी आसान नहीं

अक्सर लगता है कि पुराने कपड़े रिसाइकिल हो जाएंगे और परेशानी खत्म. लेकिन हर कपड़ा आसानी से नया कपड़ा नहीं बन जाता. अलगअलग फैब्रिक, कलर, डिजाइन और कपड़ों में लगी दूसरी चीजें रिसाइकिलिंग को मुश्किल बनाती हैं. टेक मेक एंड वेस्ट के सिद्धांत को खत्म करने के लिए काम कर रही इंटरनेशनल चैरिटी इंस्टीट्यूट एलेन मैकआर्थर फाउंडेशन कहती है कपड़ों में इस्तेमाल मैटिरियल का 1 फीसदी से भी कम हिस्सा नए कपड़े बनाने के लिए दोबारा इस्तेमाल हो पाता है.

हमें कितने कपड़ों की जरूरत है

फास्ट फैशन का इम्पैक्ट कम हो इसका मतलब ये नहीं कि आपका नए कपड़े खरीदना गलत है. सवाल ये है पार्थ क्या हम जरूरत के लिए खरीद रहें हैं या इसलिए कि वो सेल में हैं और फैशन में कई बार लोग फ्लांट करते हैं मैं कपड़े रिपीट नहीं करती. लेकिन किसी कपड़े को रिपीट करना उसकी केयर करना, जरूरत न हो तो किसी और को देना, पुराने कपड़े इस्तेमाल करना और खरीदने से पहले एक जरूरी थॉट देना ये सब कपड़ों की उम्र बढ़ा सकते हैं.

क्योंकि बात सिर्फ आपकी अलमारी में रखे कपड़ों की गिनती की नहीं हैं कितने यूज हो रहें हैं कितने स्पेस घेर रहें हैं असल सवाल ये है. इसलिए अगली बार ऑनलाइन सेल में Buy Now दबाने से पहले ये जरूर सोचिएगा कि क्या मेरे पास ये पहले से नहीं है या इसकी कितनी जरूरत है.

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