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इंसानों का पेशाब भी पिघला रहा ग्लेशियर! हर साल हजारों लीटर से बढ़ रहा असर, वैज्ञानिकों की स्टडी में बड़ा खुलासा.

इंसानों का पेशाब भी पिघला रहा ग्लेशियर! हर साल हजारों लीटर से बढ़ रहा असर, वैज्ञानिकों की स्टडी में बड़ा खुलासा.

ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया भर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। इसी बीच नेपाल और अमेरिका के वैज्ञानिकों की एक स्टडी ने माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर को लेकर एक ऐसा पहलू सामने रखा है, जिसने लोगों का ध्यान खींच लिया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि एवरेस्ट के बेस कैंप पर पर्वतारोहियों की बड़ी संख्या और वहां होने वाली मानवीय गतिविधियों का ग्लेशियर पर असर पड़ रहा है।

यह अध्ययन Regional Environmental Change Journal में प्रकाशित हुआ है। इसमें एवरेस्ट के खुम्बु ग्लेशियर और उसके आसपास बढ़ती गर्मी के अलग-अलग स्रोतों का अध्ययन किया गया है।

एवरेस्ट बेस कैंप पर हर दिन हजारों लीटर पेशाब

माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान ऊंचाई और ठंड के कारण पर्वतारोहियों की जीवनशैली काफी अलग होती है। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2023 के क्लाइंबिंग सीजन में बेस कैंप क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 6,766 लीटर पेशाब जमा होने का अनुमान लगाया गया।

एवरेस्ट बेस कैंप खुम्बु ग्लेशियर के ऊपर स्थित है। यहां चढ़ाई के मौसम में बड़ी संख्या में पर्वतारोही और स्टाफ मौजूद रहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान करीब 1,600 टेंट लगाए जाते हैं, जिनमें किचन, शॉवर, जनरेटर और अन्य सुविधाएं भी होती हैं।

क्या सच में पेशाब की गर्मी से पिघल रही है बर्फ?

इस दावे को समझना जरूरी है। इंसानी शरीर से निकलने वाले पेशाब का तापमान करीब 37 डिग्री सेल्सियस हो सकता है, लेकिन बाहर निकलने के बाद वह तेजी से ठंडा होने लगता है। इसलिए ऐसा नहीं है कि पेशाब की गर्मी सीधे भारी मात्रा में ग्लेशियर को पिघला रही है।

शोधकर्ताओं ने यह आकलन किया कि इस गर्मी का कितना हिस्सा वास्तव में बर्फ तक पहुंचता है। अध्ययन के मुताबिक, गर्मी का बहुत छोटा हिस्सा ही ग्लेशियर की बर्फ को प्रभावित करता है, जबकि काफी ऊर्जा आसपास की हवा और चट्टानों में चली जाती है।

शोध में यह भी अनुमान लगाया गया कि एक क्लाइंबिंग सीजन के दौरान करीब 154 टन बर्फ पिघलने की स्थिति बन सकती है। हालांकि, वैज्ञानिकों के अनुसार इंसानी पेशाब ग्लेशियर के पिघलने की सबसे बड़ी वजह नहीं है।

असली चिंता बढ़ता तापमान

वैज्ञानिकों की चिंता का मुख्य कारण हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ता तापमान है। अध्ययन में बताया गया है कि वर्ष 2000 के बाद हिमालय में बर्फ पिघलने की रफ्तार पहले की तुलना में काफी बढ़ी है।

बेस कैंप की सतह का तापमान खुम्बु ग्लेशियर के अन्य हिस्सों के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। शोध के अनुसार, यहां तापमान में करीब 0.28 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष की वृद्धि दर्ज की जा रही है।

ग्लेशियरों के लिए बढ़ता मानवीय दबाव भी चिंता का विषय

एवरेस्ट पर हर साल बड़ी संख्या में पर्वतारोही पहुंचते हैं। उनके लिए बनाए गए कैंप, खाना पकाने की व्यवस्था, जनरेटर और अन्य गतिविधियों से निकलने वाली गर्मी स्थानीय वातावरण को प्रभावित करती है।

ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ स्थानीय मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के पीछे व्यापक स्तर पर बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन कहीं अधिक महत्वपूर्ण कारक हैं।

इस अध्ययन ने यह जरूर दिखाया है कि दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पर बढ़ती मानवीय मौजूदगी का असर सिर्फ कचरे या प्रदूषण तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां के बेहद संवेदनशील हिमनद पर्यावरण पर भी पड़ सकता है।

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