BusinessIndia

​क्या खत्म होगी डॉलर की बादशाहत, BRICS पर टिकी हैं नजरें, ऐसे बदल सकता है गेम

भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है. ऐसे में एक बड़ा सवाल यह है कि क्या BRICS देश अंतरराष्ट्रीय कारोबार में अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं? इस मुद्दे पर भारत, चीन और रूस की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है. हालांकि, तीनों देशों का रुख एक जैसा नहीं है.

​क्या खत्म होगी डॉलर की बादशाहत, BRICS पर टिकी हैं नजरें, ऐसे बदल सकता है गेम

असल में मौजूदा चर्चा डॉलर को पूरी तरह खत्म करने से ज्यादा एक ऐसा वित्तीय सिस्टम बनाने की है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए सिर्फ डॉलर ही एकमात्र विकल्प न हो. भारत स्थानीय करेंसी और आसान पेमेंट सिस्टम चाहता है. चीन Yuan की अंतरराष्ट्रीय भूमिका बढ़ाने पर जोर दे रहा है. वहीं रूस अपने BRICS कारोबार का बड़ा हिस्सा पहले ही राष्ट्रीय करेंसी में कर रहा है.

डीडॉलराइजेशन का मतलब क्या है?

आसान भाषा में समझें तो डीडॉलराइजेशन का मतलब अंतरराष्ट्रीय कारोबार, भुगतान और वित्तीय लेनदेन में अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल कम करना है. इसके लिए देश आपसी कारोबार में अपनीअपनी करेंसी का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके अलावा डॉलर के बजाय दूसरे पेमेंट सिस्टम और डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल भी बढ़ाया जा सकता है.

भारत क्या चाहता है?

भारत का रुख इस मामले में काफी सावधानी वाला है. भारत स्थानीय करेंसी में द्विपक्षीय कारोबार बढ़ाने और दूसरे देशों के साथ पेमेंट को आसान और सस्ता बनाने के पक्ष में है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत डॉलर के खिलाफ कोई अभियान चलाना चाहता है. अगस्त में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने साफ कहा था कि भारत अलग BRICS करेंसी के पक्ष में नहीं है. यानी भारत ऐसी कोई साझा करेंसी बनाने का समर्थन नहीं करता, जिसका इस्तेमाल सभी BRICS देश करें. इसके बावजूद भारत ऐसे सिस्टम पर काम कर रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय भुगतान में डॉलर आधारित बिचौलियों की जरूरत कम हो सके.

जनवरी में आई रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक ने BRICS देशों की आधिकारिक डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव दिया था. इससे देशों के बीच कारोबार और पर्यटन से जुड़े भुगतान सीधे किए जा सकते हैं और डॉलर पर निर्भरता कुछ कम हो सकती है. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अगस्त में कहा था कि BRICS देश अपने फास्ट पेमेंट सिस्टम और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ने की संभावना पर चर्चा कर रहे हैं. इसका मुख्य उद्देश्य सीमा पार भुगतान को सस्ता और तेज बनाना है. इसलिए भारत का फोकस फिलहाल किसी एक BRICS करेंसी को डॉलर की जगह लाने के बजाय स्थानीय करेंसी, बेहतर पेमेंट सिस्टम और कम लेनदेन लागत पर है.

अमेरिका की नजर BRICS पर क्यों है?

अमेरिका BRICS के इस पूरे घटनाक्रम पर करीब से नजर रख रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अगर BRICS देश बड़ी मात्रा में डॉलर के बजाय अपनी स्थानीय करेंसी में कारोबार करने लगते हैं, तो इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी वित्तीय सिस्टम की भूमिका कुछ कम हो सकती है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार BRICS देशों को डॉलर की जगह कोई दूसरी करेंसी लाने की कोशिश के खिलाफ चेतावनी दे चुके हैं. भारत भी नहीं चाहता कि उसे किसी ऐसे अभियान का हिस्सा माना जाए, जिसका मकसद सीधे अमेरिकी डॉलर को चुनौती देना हो. 1

213 सितंबर को होने वाले BRICS सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय भुगतान और BRICS देशों के बीच स्थानीय करेंसी में कारोबार बढ़ाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है. ऐसे में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह वित्तीय स्वतंत्रता बढ़ाए, लेकिन अमेरिका के साथ अपने मजबूत आर्थिक रिश्तों को भी बनाए रखे.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply