तलवार भारी पड़ी तो जेहाद, खतना और जबरन धर्मांतरण. जब संकट में घिरा तो ब्राह्मणों को दान, जीत के लिए जाप और मंत्र पाठ. टीपू सुल्तान को लेकर विवाद अकारण नहीं हैं. समर्थकविरोधी और इतिहासकार क्या कहते है, यह हमेशा बहस का मुद्दा रहे हैं और रहेंगे. लेकिन टीपू की खुद की चिट्ठियां बयान करती हैं कि जीत के उन्माद में हिंदुओं और ईसाइयों पर उसका कहर टूटा और जब अंग्रेजों से मुकाबले में संकट में पड़ा तो श्रृंगेरी के शंकराचार्य से लेकर पंडितोंपुजारियों के प्रति उदार हो उनकी शरण में गया. टीपूहिंदुओं के लिए कभी नीमनीम तो कभी शहदशहद रहा. पढ़िए इतिहास के पन्नों के हवाले से इसी से जुड़े कुछ प्रसंग.

टीपू के पिता हैदर अली अक्सर कहते हुए सुने गए थे कि उनका यह नालायक उत्तराधिकारी उनका बनाया साम्राज्य नष्ट कर देगा. इतिहासकार ब्लिक्स ने पितापुत्र के बीच के रिश्तों का जिक्र करते हुए लिखा है कि हैदर की नज़र में टीपू की बुद्धि साधारण थी. उसका बेवजह गुस्सा, क्रूरता और जिद्दी स्वभाव पिता को खिन्न करता था.
पिता हैदर को टीपू पर नहीं था यकीन
टीपू की दो हरकतों ने हैदर को काफी क्रुद्ध किया था. शिकार के दौरान टीपू हिंदू मंदिरों में पाले सांडों को भाले से घायल करता और कभीकभी उन्हें मार भी डालता था. टीपू द्वारा बहुसंख्य हिंदू प्रजा की भावनाओं पर किए जाने वाले इस आघात को हैदर सख्त नापसंद करता था. दूसरे मसले में तो हैदर ने टीपू को काफी गालियां दी थीं और उसे एकांत कारावास में डाल दिया था. वजह युद्ध के दौरान बंदी बनाए गए एक अंग्रेज सिपाही का टीपू द्वारा जबरन खतना कराना था. यह सिपाही कर्नल स्मिथ और टीपू के मध्य युद्ध में पकड़ा गया था. युद्ध के बाद हैदर अली अंग्रेजों से सुलह की कोशिशों में था. टीपू की इस हरकत ने हैदर को आशंकित किया कि अंग्रेज चुप नहीं बैठेंगे.
टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली. फोटो: Wikipedia
गद्दी पर बैठने के साथ निरंकुशता बढ़ी
हैदर अली की मौत के बाद मैसूर के सुल्तान के तौर पर युद्धों में शुरुआती जीत ने टीपू की निरंकुशता और बढ़ाई. कूर्ग में स्थानीय आबादी के विद्रोह की खबरें मिलने पर उसने कमांडर जैन उल आबिदीन शूस्तरी को 17 सितंबर 1785 को फरमान भेजा, “आपको कूर्ग के लोगों पर बड़ा हमला करना है. ध्यान रहे हमले में जितने लोग मारे जाएं या पकड़े जाएं, उन सभी को मुसलमान बनाना है. “
फरमान का वीभत्स पहलू था कि मारे गए विद्रोहियों की लाशों का भी खतना किया जाना था. इसी साल दिसंबर महीने तक टीपू की फौज ने विद्रोह को कुचल दिया. टीपू भी वहां पहुंचा. विक्रम संपत ने अपनी किताब ” टीपू सुल्तान ” में 5 जनवरी 1786 को करनूल के नवाब को लिखे टीपू के पत्र को उद्धृत किया है,” कुछ समय पहले कूर्ग के लोग बगावत पर उतर आए. जैसे ही खबर मिली हम तेजी से पहुंचे और करीब चालीस हजार बागियों को पकड़ लिया. वे हमारी सेना से डरकर जंगलों और पहाड़ों में छिप गए थे, जहां पक्षी भी नहीं पहुंच सकते थे. हमने उनके इलाकों से निकालकर इस्लाम में शामिल किया और अपनी अहमदी फौज में भर्ती कर लिया. ढोंग करने वालों के लिए यह चेतावनी और सच्चे मुसलमानों के लिए अच्छी खबर है. “
पिता हैदर अली टीपू सुल्तान को दी गई शिक्षा से खुश नहीं था.
जबरिया हजारों का धर्मांतरण
धर्मान्तरित कूर्गों की तादाद अपने एक पत्र में टीपू ने पचास हजार बताई है. इतिहासकार किरमानी ने इसे लगभग अस्सी हजार बताया. जर्मन मिशनरी जॉर्ज रिखटर ने इसे पच्चासी हजार तो इतिहासकार ब्लिंक्स ने लगभग सत्तर हजार लिखा है. तादाद में भिन्नता के बाद भी यक़ीनन यह बड़ा धर्मांतरण था जिसने टीपू को खासा खुश किया था. 13 जनवरी 1786 को टीपू ने मीर मुईनुद्दीन को अपने पत्र में लिखा, ” सर्वशक्तिमान अल्लाह की कृपा और पैगंबर की मदद से हमने जफीराबाद ताल्लुके को दुरुस्त कर लिया है.
कूर्ग जाति के लगभग पचास हजार मर्दोंऔरतों को बंदी बना लिया और उन्हें अहमदी वर्ग में शामिल कर लिया. यह घटना इस्लाम की ताकत बढ़ाने वाली है. इसलिए हम चाहते हैं कि सभी मुसलामानों को इस शुभ अवसर का आनन्द प्राप्त हो. जनवरी 1786 के मध्य श्रीरंगपट्टना में नजूमियों के मशविरे से तय समय पर राजधानी के सभी मुसलमानों को काफ़िरों के सामूहिक धर्मपरिवर्तन का चश्मदीद बनने के लिए लाल बाग मस्जिद बुलाया गया. हालांकि बुलाए जाने का मकसद वहां पहुंचने के बाद ही लोगों को पता चल सका. परम्परा तोड़ कर नमाज़ की शुरुआत मुग़ल सम्राट शाह आलम की जगह टीपू सुल्तान की ताकत के गुणगान से हुई. टीपू के मुताबिक शाह आलम किसी सम्मान के लायक नहीं , क्योंकि वह महादजी सिंधिया के हाथों की कठपुतली है.
मजहबी जुनून बढ़ता गया
धर्मांतरण को लेकर टीपू का जुनून आगे बढ़ता गया. 28 फरवरी 1789 को उसने कालीकट के दीवान को लिखा,” 242 नायर कैदी भेजे जा रहे हैं. उनका खतना कराकर मुसलमान बना दो. कोई भी भागा तो हमारी नाराजगी झेलनी होगी.” 7 मार्च 1789 को बदरउजज़मान ख़ान और अन्य को अपने पत्र में उसने लिखा,” जिहाद के कारण बड़ी संख्या में काफ़िरों ने खुद ही सच्चा विश्वास स्वीकार कर लिया.
इस्लाम की प्रगति के लिए हथियार उठाना सभी मुसलमानों का सच्चा कर्तव्य है.” विक्रम संपत के अनुसार मार्च 1789 तक टीपू की विशाल सेना ने कुट्टीपुरम को घेर लिया. दो हजार नायर परिवारों की जान बख्शने की कीमत में स्वेच्छा से इस्लाम अपनाने या फिर जबरन धर्म परिवर्तन बाद देश छोड़ने की शर्त रखी गई. दबाव में अगले ही दिन पुरुषों का खतना किया गया और परिवार की महिलाओंबच्चों के साथ गोमांस खाने को मजबूर किया गया. अंग्रेजों के मदद से इनकार के बाद चिरक्कल का राजा उपहारों के साथ टीपू की शरण में पहुंचा. उसके पारिवारिक मंदिर पर टीपू की नज़र थी.
राजा ने मंदिर बचाने के लिए चार लाख रुपए और मंदिर की छत पर लगीं सोने की प्लेटें भेंट करने की पेशकश की. घमंड से भरे टीपू ने कहा कि धरती और समुद्र का सारा खजाना भी मंदिर नहीं बचा सकता. दावा किया कि इस पवित्र युद्ध में आठ हजार मंदिरों का विनाश हुआ, जिसमें अनेक सोनेचांदी या तांबे की छत वाले थे. हालांकि इतिहासकार ब्लिंक्स नष्ट मंदिरों की संख्या पर शक जाहिर करते हुए कहते हैं कि निश्चय ही मलबार में बड़ी संख्या में मंदिर नष्ट किए गए लेकिन आठ हजार की संख्या अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकती है, क्योंकि जब अपराधों को पुण्य बताया जाता है तो दावे बढ़चढ़कर किए जाते हैं.
टीपू सुल्तान.
शंकराचार्य की मदद
पर इसी टीपू की अप्रैल 1791 में मराठों के अनियमित सैनिकों पिंडारियों द्वारा श्रृंगेरी के शंकराचार्य के पवित्र मंदिर के नष्ट करने पर जुदा तस्वीर दिखती है. हालांकि इसे मराठों के खिलाफ हिंदुओं की सहानुभूति हासिल करने से भी जोड़ा जाता है. इतिहासकार जी. एस. सरदेसाई के अनुसार टीपू से बदला लेने की जिद में रघुनाथराव पटवर्धन ने श्रृंगेरी के शंकराचार्य के पवित्र मंदिर को अकारण नष्ट कर दिया. यह एक हिंदू द्वारा हिंदू धर्म का अपमान था, जिसकी दुःखद स्मृति मराठों को लंबे समय तक ताजा रही.
मराठों नेताओं को इसका पश्चाताप रहा और शंकराचार्य को संतुष्ट करने की उन्होंने कोशिश की. टीपू ने लिखापढ़ी में मंदिर पर हमले और लूट का विरोध किया. 6 जुलाई 1791 को उसने शंकराचार्य को लिखा,” यह सुनकर गहरा दुःख हुआ कि मठ पर मराठा घुड़सवारों ने हमला किया. ब्राह्मणों को चोट पहुंचाई. देवी शारदा की मूर्ति निकाल कर तोड़ी और मठ की सारी चीजें लूट लीं. देवी की यह प्राचीन पूजित मूर्ति तुरंत स्थापित की जानी चाहिए ताकि वह सूर्य और चंद्रमा की तरह स्थायी रहे. जिन्होंने एक पवित्र मठ को नष्ट किया है, वे और उनके परिवार जल्दी ही संकट झेलेंगे. “
टीपू ने मठ की मरम्मत, पुनर्निर्माण और मूर्ति स्थापना के लिए चार सौ रहटिया की सहायता भेजी. 18 जुलाई को उसने शंकराचार्य से विदनूर के आसफ़ द्वारा भेजे अनाज और नकद स्वीकार करने का अनुरोध किया. टीपू ने उन्हें पालकी और अन्य उपहार भी भेजे. अपने पत्रों में टीपू ने मठ के दुश्मनों के नाश की प्रार्थना के साथ शंकराचार्य से मैसूर की प्रजा के कल्याण के लिए पूजा और तप करने का भी आग्रह किया.
फिर मंत्रजाप से जिंदगी और जीत की आस
जिन कूर्गो को टीपू ने जबरन धर्मांतरित किया और जुल्म ढाये उन्हीं को अंग्रेजों के बढ़ते दबाव के बीच 26 मई 1791 को टीपू ने लिखा कि वे पहले की तरह अपने धार्मिक रीतिरिवाज निभायें. श्रृंगेरी के शंकराचार्य से उसका पत्र व्यवहार चलता रहा. 14 सितंबर 1791 को उन्हें लिखे पत्र में टीपू ने शत्रुओं पर उसकी जीत के लिए शुरू अडतालीस दिनों के शत चंडी जाप के प्रति आभार व्यक्त किया. 4 मई 1799 जो अंग्रेजों से युद्ध में उसकी जिंदगी का आखिरी दिन था, टीपू को अंतिम सहारा अलौकिक चमत्कार का था.
चन्नपट्टना से बड़ी संख्या में ब्राह्मण पुजारियों को बुलाया गया. उन्हें खूब दक्षिणा देकर टीपू की जीवन रक्षा और जीत के लिए लगातार जप कराया गया. युवावस्था में ज्योतिष पर कोई भरोसा न करने वाले टीपू को अब उस पर काफी विश्वास हो चला था. इस मौके पर उसने मुख्य पुजारी को काले तिलों की एक थैली और दो सौ रुपए भेंट किए. अन्य ब्राह्मणों को एक काला बैल, एक भैंस, एक काली बकरी, मोटे काले कपड़े की जैकेट,उसी कपड़े की टोपी, नब्बे रुपए और तेल से भरा लोहे का एक बर्तन दिया. आखिरी दान देते समय टीपू को तेल से भरे पात्र में अपनी परछाईं देखनी होती थी.
मान्यता थी कि मंत्रों से अभिसिंचित तेल में अपनी परछाईं देखने से अशुभ प्रभाव समाप्त हो जाते हैं. दोपहर तक इन अनुष्ठानों में टीपू विधिवत सम्मिलित हुआ. लेकिन यह सब कुछ काम नहीं आया. अंग्रेज किले की दीवारें भेद चुके थे. टीपू की फौज पस्त थी. भीतर के गद्दार भी टीपू के हर कदम की दुश्मन को खबर कर रहे थे. यह टीपू की जिंदगी की आखिरी शाम थी.



