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कृष्ण जन्म के छठे दिन गाया जाता है यह बधाई गीत, दिल को छू लेगा इस गाने का मतलब..

कृष्ण जन्म के छठे दिन गाया जाता है यह बधाई गीत, दिल को छू लेगा इस गाने का मतलब..

कृष्ण जन्माष्टमी की रात कान्हा के जन्म के साथ ही मानो गोकुल की गलियों में उत्सव उतर आता है. मंदिरों में घंटियां बजती हैं, घरों में भजन गूंजते हैं और महिलाएं पारंपरिक बधाई गीत गाकर खुशी मनाती हैं. इन्हीं लोकगीतों में एक गीत है- ‘जन्म लियो दोनों भैया, गोकुल में बाजे बधैया’. इसकी खासियत यह है कि गीत केवल कृष्ण जन्म की खुशी नहीं बताता, बल्कि उस पूरे लोक संसार की तस्वीर खींच देता है, जहां बच्चे के जन्म पर घर-आंगन से लेकर गलियों तक उत्सव मनाया जाता है.

कृष्ण की छठी के अवसर पर भी कई क्षेत्रों में ऐसे लोकगीत गाने की परंपरा रही है. हालांकि अलग-अलग इलाकों में गीत के बोल और धुन थोड़े बदल सकते हैं. कहीं इसे बधाई के रूप में गाया जाता है तो कहीं छठी या नामकरण के अवसर पर. गीत की पंक्तियों में गोकुल की खुशियां, रोशनी, ढोल और बधाई देने वालों का उत्साह साफ नजर आता है.

‘जन्म लियो दोनों भैया’ में छिपी है गोकुल की खुशी

गीत की शुरुआत ही उत्सव के माहौल से होती है- ‘जन्म लियो दोनों भैया, गोकुल में बाजे बधैया.’ यहां ‘बधैया’ यानी बधाई या खुशी के गीतों की ओर संकेत है. लोकभाषा में ऐसी पंक्तियां किसी शुभ अवसर की सामूहिक खुशी को व्यक्त करती हैं. कृष्ण जन्म की कथा में गोकुल और नंद भवन का विशेष महत्व है. इसलिए इस तरह के लोकगीतों में गोकुल केवल एक स्थान नहीं रहता, बल्कि खुशियों से भरे पूरे संसार का प्रतीक बन जाता है. कल्पना कीजिए, किसी गांव में घर में बच्चे का जन्म हुआ हो और आसपास की महिलाएं एक साथ गीत गाने लगें. यही सामूहिक खुशी इस गीत में भी महसूस होती है.

दीपों से जगमगाता है पूरा गोकुल

गीत में आगे ‘जगमग दिए जलत हैं’ और ‘द्वारे-द्वारे दीप जलत हैं’ जैसी भावनाएं आती हैं. इन पंक्तियों के जरिए जन्मोत्सव की रोशनी को सामने रखा गया है. दीप जलाना भारतीय परंपरा में शुभता और मंगल का संकेत माना जाता है. इसलिए कृष्ण जन्म के संदर्भ में दीपों की यह तस्वीर बेहद स्वाभाविक लगती है. गीत सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे गोकुल की गलियां और घरों के दरवाजे दीपों से रोशन हैं और हर ओर कान्हा के जन्म की चर्चा हो रही है.

गलियों में धूम और ढोल की आवाज

गीत का एक और आकर्षक हिस्सा है, जिसमें ‘गलियों-गलियों धूम मची है’ और ढोल बजने की बात आती है. लोकगीतों की खूबी यही होती है कि वे बड़े धार्मिक प्रसंग को आम जिंदगी की तस्वीरों से जोड़ देते हैं. कृष्ण के जन्म की खुशी सिर्फ नंद भवन तक सीमित नहीं रहती. गीत में पूरा गोकुल नाचता-गाता नजर आता है. ढोल बज रहे हैं, लोग बधाई दे रहे हैं और हर तरफ उत्सव जैसा माहौल है. यही वजह है कि ऐसे गीत सुनते ही श्रोता कहानी पढ़ने के बजाय उसे महसूस करने लगता है.

‘कौन लुटाए हीरे-मोती’ का क्या अर्थ है?

गीत में ‘कौन लुटाए हीरे मोती’ और ‘कौन लुटाए रुपैया’ जैसी पंक्तियां भी आती हैं. लोकगीतों में इस तरह की भाषा अक्सर खुशी और उदारता दिखाने के लिए इस्तेमाल होती है. यहां हीरे-मोती और रुपयों की बात को केवल धन के अर्थ में देखना जरूरी नहीं है. भाव यह है कि खुशी इतनी बड़ी है कि लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार और बधाई लुटा रहे हैं. आगे राजा के हीरे-मोती लुटाने और मैया के रुपैया लुटाने की कल्पना इसी उत्सव को और रंगीन बना देती है.

कन्हैया के नाम से जुड़ी है खास खुशी

गीत में ‘नाम धरो है कन्हैया’ का भाव भी आता है. कृष्ण के बाल रूप को लोक परंपरा में कन्हैया, कान्हा, नंदलाला जैसे स्नेहभरे नामों से पुकारा जाता है. इसलिए नामकरण का संदर्भ गीत को बच्चे के जन्म से आगे एक नए पारिवारिक संस्कार से जोड़ देता है. यही इस गीत की सबसे खूबसूरत बात है. इसमें भगवान कृष्ण का दिव्य स्वरूप होने के साथ-साथ एक नवजात बच्चे के घर में आने वाली सामान्य खुशी भी दिखाई देती है. मां का लाड़, परिवार की उमंग और पड़ोसियों की बधाई- सब कुछ लोकभाषा में सहज ढंग से सामने आता है.

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