
लखनऊ, अमृत विचार। नौकरी बदलने की खुशी तब और बढ़ जाती है, जब नई नौकरी उसी सरकार की हो और पद भी पहले से बेहतर हो। लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस के करीब 1,700 सिपाहियों के लिए नई सरकारी नौकरी में चयन की खुशी अब परेशानी में बदल गई है। किसी का चयन दरोगा पद पर हुआ है तो किसी का कंप्यूटर ऑपरेटर, लेखपाल या अन्य सरकारी पद पर। नई जिम्मेदारी संभालने के लिए पुरानी नौकरी से रिलीविंग जरूरी है, लेकिन करीब आठ लाख रुपये की रिकवरी का पेच उनके रास्ते में खड़ा हो गया है।
इन करीब 1,700 सिपाहियों में लगभग 75 फीसदी का चयन दरोगा पद के लिए हुआ है। पुलिस विभाग का कहना है कि सिपाही पद पर नियुक्ति के समय अभ्यर्थियों से बॉन्ड लिया गया था। इसमें ट्रेनिंग और प्रोबेशन पूरा होने से पहले नौकरी छोड़ने पर प्रशिक्षण पर हुए खर्च के साथ वेतनभत्तों की रकम वापस करने की शर्त शामिल है।
1700 सिपाहियों से करीब 136 करोड़ रुपये की रिकवरी
औसतन एक सिपाही पर करीब आठ लाख रुपये की रिकवरी बन रही है। इस हिसाब से करीब 1,700 सिपाहियों से विभाग को लगभग 136 करोड़ रुपये की रकम वापस लेनी होगी। यही रकम अब नई सरकारी नौकरी ज्वाइन करने के इच्छुक जवानों के लिए सबसे बड़ी अड़चन बन गई है। जवानों की मांग है कि उन्हें दूसरी सरकारी नौकरी में जाने के लिए रिलीव किया जाए और रिकवरी की रकम में राहत दी जाए। उनका कहना है कि वे पुलिस विभाग छोड़कर निजी क्षेत्र या किसी दूसरे राज्य में नौकरी करने नहीं जा रहे, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार की ही दूसरी नौकरी ज्वाइन कर रहे हैं।
एक ही बैच के सिपाही, अब दूसरी सरकारी नौकरी में चयन
दरअसल, उत्तर प्रदेश पुलिस में वर्ष 2023 में 60,244 सिपाही पदों पर भर्ती निकाली गई थी। करीब 57 हजार अभ्यर्थी चयनित हुए। इनकी ट्रेनिंग 21 जून 2025 से शुरू होकर 20 अप्रैल 2026 तक अलगअलग रिक्रूटमेंट सेंटरों में चली। इसी दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड ने दरोगा के 4,543 पदों के साथ कंप्यूटर ऑपरेटर, लेखपाल समेत अन्य पदों पर भी भर्ती निकाली।
पुलिस की ट्रेनिंग कर रहे हजारों अभ्यर्थियों ने इन भर्तियों में आवेदन किया। जुलाई 2026 में दरोगा भर्ती का अंतिम परिणाम जारी हुआ तो तस्वीर बदल गई। ट्रेनिंग कर रहे करीब 1,700 सिपाहियों के नाम अलगअलग सरकारी भर्तियों की मेरिट सूची में सामने आए। इनमें करीब तीन चौथाई अभ्यर्थियों का चयन दरोगा पद के लिए बताया जा रहा है।
बागपत में 21 सिपाही बने दरोगा, लेकिन नहीं छोड़ पा रहे नौकरी
इस स्थिति को बागपत के उदाहरण से समझा जा सकता है। यहां सिपाही पद पर ट्रेनिंग ले रहे 21 जवानों का चयन दरोगा पद के लिए हुआ है। इसी तरह गाजीपुर, जौनपुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, कानपुर, लखनऊ, मुरादाबाद, वाराणसी और आगरा समेत कई जिलों के सिपाहियों का भी अलगअलग सरकारी पदों पर चयन हुआ है। नई नौकरी का रास्ता तो साफ है, लेकिन मौजूदा पुलिस नौकरी से बाहर निकलने के लिए रिकवरी की रकम जमा करने की शर्त उनके सामने बड़ी बाधा बन गई है।
नौकरी ज्वाइन करते समय ही साइन कराया गया था बॉन्ड
पुलिस विभाग के मुताबिक, सिपाही पद पर नियुक्ति के समय अभ्यर्थियों से बॉन्ड साइन कराया गया था। इसमें स्पष्ट प्रावधान है कि ट्रेनिंग और प्रोबेशन पूरा किए बिना नौकरी छोड़ने की स्थिति में ट्रेनिंग पर आया खर्च और वेतनभत्तों की रकम वापस करनी होगी। विभाग के अनुसार, चयनित जवानों को यह रकम उसी जिले के एसपी/एसएसपी या पुलिस कमिश्नर कार्यालय में जमा करनी होगी, जहां उनकी तैनाती है। रकम जमा नहीं करने की स्थिति में इस्तीफा मंजूर नहीं होने और मामला लंबित रहने की बात कही जा रही है।
आखिर आठ लाख रुपये की रिकवरी कैसे बन रही?
ट्रेनिंग पर करीब 2.58 लाख रुपये:
पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह के मुताबिक, प्रशिक्षण के दौरान एक सिपाही पर रोजाना औसतन करीब 863 रुपये खर्च होते हैं। इसमें बैरक, भोजन, यूनिफॉर्म, ट्रेनिंग सामग्री, हथियार, स्टाफ और प्रशिक्षकों के वेतन समेत अन्य खर्च शामिल हैं। करीब 300 दिन की ट्रेनिंग में यह खर्च लगभग 2.58 लाख रुपये बैठता है।
वेतनभत्तों पर करीब 5.42 लाख रुपये:
नियमों के मुताबिक सिपाही भर्ती होने के बाद दो साल तक प्रोबेशन पर रहता है। इस दौरान मूल वेतन के साथ डीए, वर्दी भत्ता और अन्य सुविधाएं मिलती हैं। विभाग के मुताबिक प्रोबेशन पूरा होने से पहले नौकरी छोड़ने पर इस अवधि में मिले वेतन और भत्तों की रकम की भी गणना की जाती है। पीएफ और पेंशन फंड में कटी रकम का भी हिसाब जोड़े जाने की बात कही गई है। इस तरह ट्रेनिंग खर्च और वेतनभत्तों को मिलाकर रिकवरी की रकम करीब आठ लाख रुपये तक पहुंच रही है।
जवानों की दलील ट्रेनिंग का खर्च वापस करेंगे, पूरी सैलरी क्यों?
दूसरी सरकारी नौकरी में चयनित जवान अब विभाग से राहत की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि वे पुलिस की नौकरी छोड़कर निजी कंपनी या दूसरे राज्य में नहीं जा रहे हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार की ही दूसरी नौकरी में जा रहे हैं।
जवानों का कहना है कि वे ट्रेनिंग पर खर्च हुए करीब 2.58 लाख रुपये वापस करने को तैयार हैं, लेकिन दो साल के पूरे वेतनभत्तों की रकम वापस मांगना उचित नहीं है। उनका यह भी तर्क है कि इस दौरान उन्होंने विभाग में अपनी सेवाएं दी हैं। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इनमें बड़ी संख्या सामान्य परिवारों से आने वाले युवाओं की है। ऐसे में अचानक करीब आठ लाख रुपये की व्यवस्था करना उनके और उनके परिवारों के लिए आसान नहीं है।
पुलिस मुख्यालय का रुख बॉन्ड की शर्तों में राहत नहीं
वहीं, पुलिस मुख्यालय का रुख इस मामले में फिलहाल स्पष्ट बताया जा रहा है। विभाग के अनुसार स्थापना विभाग का पुराना आदेश लागू रहेगा। दूसरी सरकारी नौकरी मिलना अभ्यर्थी के लिए फायदे की स्थिति है और इस आधार पर बॉन्ड की शर्तों में छूट नहीं दी जा सकती। यानी रिकवरी की रकम जमा किए बिना इन सिपाहियों के लिए नई सरकारी नौकरी में जाने की राह आसान नहीं होगी।
1700 पद फिर हो सकते हैं खाली
इस पूरे मामले का एक दूसरा पहलू भी है। 60,244 सिपाही पदों की भर्ती में सरकार ने बड़ी राशि खर्च की थी। इनमें से तीन हजार से अधिक अभ्यर्थियों के पहले ही ज्वाइन नहीं करने की बात सामने आई थी। अब यदि करीब 1,700 प्रशिक्षित सिपाही भी दूसरी सरकारी नौकरी के लिए पुलिस विभाग छोड़ते हैं तो इतने पद फिर खाली हो सकते हैं।
ऐसे में इन पदों को भरने के लिए सरकार को दोबारा भर्ती और प्रशिक्षण पर खर्च करना पड़ सकता है। फिलहाल एक तरफ करीब 1,700 जवान बेहतर सरकारी पद पर जाने का अवसर मिलने के बाद रिलीविंग का इंतजार कर रहे हैं, तो दूसरी ओर पुलिस विभाग के सामने प्रशिक्षित जवानों को बनाए रखने और पहले से किए गए भर्तीप्रशिक्षण खर्च के सवाल खड़े हैं।



