कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है. ईरान युद्ध के जल्द खत्म होने के संकेत नहीं मिलने के बीच 10 सितंबर को ब्रेंट क्रूड 105 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया. यह 25 मई 2026 के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर है. ब्रेंट क्रूड की कीमत में पिछले कुछ दिनों से लगातार तेजी बनी हुई है. इससे पहले बुधवार को भी ब्रेंट फ्यूचर्स की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थी. 10 सितंबर को शाम 6:55 बजे भारतीय समय के मुताबिक ब्रेंट क्रूड करीब 4% बढ़कर 105.25 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था.

तेल की कीमतों में तेजी की सबसे बड़ी वजह ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव है. अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी के सामने ईरान पीछे हटने वाला नहीं है. अगर अमेरिका ईरान के इलाके पर हमले जारी रखता है तो ईरान अपने हमले और तेज कर सकता है. इधर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिया है कि यह युद्ध नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों के बाद ही खत्म हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि तब तक पेट्रोल की कीमतों में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद नहीं है. इससे बाजार में जल्द युद्धविराम की उम्मीद कमजोर हुई है. अगस्त की शुरुआत के मुकाबले ब्रेंट क्रूड की कीमत अब करीब 30% बढ़ चुकी है.
सऊदी अरब में तेल उत्पादन घटा
तेल की कीमत बढ़ने की एक और बड़ी वजह सऊदी अरब का घटता उत्पादन है. ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के पश्चिमी तट से होने वाली तेल सप्लाई को निशाना बनाने की धमकी दी है. OPEC की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब ने अगस्त में रोजाना 6.2 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन किया. यह 2026 में उसका सबसे कम मासिक उत्पादन है. जुलाई के मुकाबले अगस्त में उत्पादन करीब 23% कम रहा.
अब चीन पर बाजार की नजर
विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में यह तेजी कितने समय तक बनी रहेगी, यह काफी हद तक चीन पर निर्भर करेगा. चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है और हाल के हफ्तों में उसने तेल की खरीद बढ़ाई है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि चीन की बढ़ती खरीद ने फिजिकल क्रूड मार्केट को मजबूत किया है. अगर चीन की तेल खरीद आगे भी बढ़ती रही तो खाड़ी क्षेत्र में सप्लाई की किसी भी परेशानी का असर और बड़ा हो सकता है और कीमतें और ऊपर जा सकती हैं. वहीं, अगर चीन ने तेल आयात कम कर दिया तो कच्चे तेल की कीमतों में जारी तेजी कुछ हद तक थम सकती है. बाजार में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि चीन की मांग कितनी मजबूत रहती है और ईरान युद्ध कितने समय तक चलता है.



