
सऊदी अरब: दुनिया के सबसे शुष्क देशों में शामिल सऊदी अरब में पानी की जरूरत पूरी करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। देश का बड़ा हिस्सा रेगिस्तान है, बारिश बेहद कम होती है और प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत भी सीमित हैं। इसके बावजूद यहां करोड़ों लोग रहते हैं और उनके घरों तक रोजाना पीने का पानी पहुंचता है।
आखिर ऐसा कैसे संभव है? इसके पीछे समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने की आधुनिक तकनीक, विशाल डिसेलिनेशन प्लांट और सैकड़ों किलोमीटर लंबा पाइपलाइन नेटवर्क काम करता है।
रेगिस्तान में पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती
सऊदी अरब का अधिकांश हिस्सा बेहद सूखा और रेगिस्तानी है। देश के कई इलाकों में गर्मियों के दौरान तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है, जबकि बारिश भी बहुत कम होती है।
देश की बड़ी आबादी लाल सागर और फारस की खाड़ी के आसपास रहती है। वहीं अंदरूनी हिस्सों में कई इलाके बेहद शुष्क और कम आबादी वाले हैं। ऐसे में समुद्र के किनारे तैयार किए गए पानी को दूर बसे शहरों तक पहुंचाने के लिए विशाल पाइपलाइन नेटवर्क तैयार किया गया है।
समुद्र का खारा पानी बनता है पीने लायक
सऊदी अरब के लिए समुद्र पानी का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत है, लेकिन समुद्री पानी सीधे पीने योग्य नहीं होता। इसमें बड़ी मात्रा में नमक और अन्य अशुद्धियां मौजूद होती हैं।
इसी वजह से देश में बड़े-बड़े डिसेलिनेशन प्लांट लगाए गए हैं। इन प्लांट में समुद्र से पानी खींचकर उसे कई चरणों में साफ किया जाता है और उसमें मौजूद नमक तथा दूसरी अशुद्धियों को अलग किया जाता है।
समुद्र से पानी प्लांट तक पहुंचाने के लिए तट के पास बड़े इनटेक पाइप लगाए जाते हैं। पानी के साथ समुद्री जीव और बड़े कण सिस्टम में न आएं, इसके लिए शुरुआती स्तर पर विशेष स्क्रीन का इस्तेमाल किया जाता है।
इसके बाद पानी को अलग-अलग फिल्टर से गुजारा जाता है। पहले बड़े कण और अशुद्धियां हटाई जाती हैं, फिर सैंड फिल्टर और अन्य फिल्ट्रेशन सिस्टम के जरिए पानी को और साफ किया जाता है। इसके बाद बारीक कार्ट्रिज फिल्टर छोटे कणों को भी अलग करने में मदद करते हैं।
रिवर्स ऑस्मोसिस है सबसे अहम चरण
समुद्री पानी को मीठा बनाने की प्रक्रिया में रिवर्स ऑस्मोसिस बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें हाई-प्रेशर पंप समुद्री पानी को विशेष मेम्ब्रेन से गुजारते हैं।
इस मेम्ब्रेन से पानी के अणु आगे निकल जाते हैं, जबकि नमक और कई दूसरी अशुद्धियां पीछे रह जाती हैं। इस प्रक्रिया के बाद पानी काफी हद तक शुद्ध हो जाता है।
हालांकि, रिवर्स ऑस्मोसिस के बाद पानी में जरूरी मिनरल की मात्रा भी कम हो सकती है। इसलिए इसे पीने योग्य बनाने के लिए कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे जरूरी मिनरल दोबारा मिलाए जाते हैं। साथ ही पानी का pH स्तर भी नियंत्रित किया जाता है।
सैकड़ों किलोमीटर तक जाती हैं पानी की पाइपलाइन
पानी को समुद्र के किनारे तैयार करने के बाद असली चुनौती उसे रेगिस्तान के दूर-दराज इलाकों तक पहुंचाने की होती है। इसके लिए सऊदी अरब ने विशाल पाइपलाइन नेटवर्क तैयार किया है।
इन पाइपलाइनों के जरिए डिसेलिनेशन प्लांट से तैयार पानी को सैकड़ों किलोमीटर दूर शहरों और दूसरे इलाकों तक पहुंचाया जाता है। इसे रेगिस्तान के बीच बनी एक कृत्रिम नदी की तरह समझा जा सकता है।
इतनी गर्मी में कैसे टिकती हैं पाइपलाइन?
रेगिस्तान में पाइपलाइन बिछाना आसान काम नहीं है। तेज गर्मी, रेत के खिसकने और जमीन के दबाव जैसी कई चुनौतियां सामने आती हैं।
इसके लिए मजबूत सामग्री से पाइप तैयार किए जाते हैं। बड़े पैमाने पर कार्बन स्टील का इस्तेमाल किया जाता है। पाइप तैयार होने के बाद उनकी अल्ट्रासोनिक टेस्टिंग की जाती है और जंग से बचाने के लिए विशेष कोटिंग भी की जाती है।
पाइपलाइन बिछाने से पहले सर्वे टीमें इलाके का निरीक्षण करती हैं। GPS और आधुनिक सर्वे उपकरणों की मदद से पाइपलाइन का रास्ता तय किया जाता है। ऐसे क्षेत्रों से बचने की कोशिश की जाती है जहां रेत के टीले लगातार खिसकते रहते हैं या जमीन पाइपलाइन के लिए खतरा पैदा कर सकती है।
इस पूरे सिस्टम पर खर्च होता है भारी पैसा
सऊदी अरब के लिए समुद्री पानी को पीने योग्य बनाना और फिर उसे दूर-दराज के शहरों तक पहुंचाना बेहद महंगा काम है।
बड़े डिसेलिनेशन प्लांट बनाने और चलाने के अलावा पानी को सैकड़ों किलोमीटर दूर पहुंचाने के लिए विशाल पाइपलाइन नेटवर्क की जरूरत होती है। इसके निर्माण, रखरखाव और पानी की पंपिंग पर भी भारी खर्च आता है।
दरअसल, सऊदी अरब में पानी की पूरी व्यवस्था उसकी प्राकृतिक परिस्थितियों की मजबूरी भी है। जहां नदियां और बारिश बेहद सीमित हैं, वहां आधुनिक तकनीक ने समुद्र को ही मीठे पानी के बड़े स्रोत में बदल दिया है।
यही वजह है कि डिसेलिनेशन प्लांट और विशाल पाइपलाइन नेटवर्क सऊदी अरब के लिए सिर्फ तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत पूरी करने वाला बेहद महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा बन चुका है।



