Supreme Court CJP Case: में ‘ के नाम से हुए प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने साफ किया कि प्रदर्शन से जुड़े किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक जांच शुरू करने के लिए FIR दर्ज करने का निर्देश देने का अधिकार के पास है। कोई जांच समिति या दूसरी संस्था अपनी तरफ से ऐसा आदेश नहीं दे सकती।

सुनवाई के दौरान ने पांच सदस्यीय हाईपावर्ड एनक्वायरी कमेटी की भूमिका और उसकी सीमाएं भी स्पष्ट कीं। अदालत ने कहा कि समिति जांच कर सकती है और अपनी सिफारिशें कोर्ट के सामने रख सकती है, लेकिन FIR दर्ज करने का निर्देश देना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
सुप्रीम कोर्ट ने बनाई है 5 सदस्यीय कमेटी
आंदोलन से जुड़े मामलों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पांच सदस्यीय HighPowered Enquiry Committee का गठन किया है। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। समिति को प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर लगाए गए जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के आरोपों की जांच करनी है। इसके अलावा सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोप भी जांच के दायरे में हैं। कोर्ट ने समिति को प्रभावित लोगों और पीड़ितों की पहचान करने, दस्तावेजों व अन्य सबूतों की जांच करने और लोगों से मिले प्रतिवेदनों पर विचार करने की अनुमति दी है। गवाहों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए समिति गुमनाम शिकायतें भी स्वीकार कर सकती है।
FIR को लेकर क्या है विवाद?
दरअसल, दिल्ली पुलिस ने CJP आंदोलन से जुड़े 13 FIR को वापस लेने और प्रदर्शन में शामिल लोगों की भूमिका की जांच से संबंधित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी। पुलिस का कहना था कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद करीब 2,873 लोगों की आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच की जरूरत है, ताकि हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या अन्य आपराधिक गतिविधियों में उनकी भूमिका का पता लगाया जा सके। हालांकि, अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि प्रदर्शनकारियों को दी गई राहत का मतलब यह नहीं है कि गंभीर अपराधों में शामिल लोगों को भी स्वत: संरक्षण मिल जाएगा। हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर मामलों को अलग तरीके से देखा जाएगा।
1 सितंबर के आदेश में क्या कहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शन से जुड़े आपराधिक मामलों पर महत्वपूर्ण आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि 20 से 25 जुलाई के बीच हुए प्रदर्शनों को लेकर दर्ज FIR में आगे जांच या कार्रवाई नहीं की जाएगी और इन मामलों को बंद माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि इन घटनाओं के संबंध में नई FIR दर्ज नहीं की जानी चाहिए।
कोर्ट ने साफ की ‘लक्ष्मण रेखा’
गुरुवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके न्यायिक आदेश की सीमा और उसकी व्याख्या को लेकर कोई दूसरी संस्था अपनी तरफ से फैसला नहीं कर सकती। FIR से जुड़े मामलों में अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा। यानी जांच समिति अपनी जांच पूरी कर सकती है, सबूत जुटा सकती है और अपनी सिफारिशें अदालत को दे सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश वह खुद नहीं दे सकती।
ये भी पढ़ें:
NEET से जुड़े मुद्दों से शुरू हुआ था CJP आंदोलन
CJP आंदोलन की शुरुआत NEET परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर हुई थी। जुलाई में आंदोलन खत्म होने के बाद भी FIR, पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को लेकर विवाद बना हुआ है। इस बीच प्रदर्शन में शामिल एक नाबालिग लड़की को कथित धमकी और उत्पीड़न के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता दिखाई है। अदालत ने लड़की और उसके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
ये भी पढ़ें:
पुलिस कार्रवाई और हिंसा के आरोपों की जांच करेगी कमेटी
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित HPEC को 20 जुलाई के छात्र प्रदर्शन से जुड़े अलगअलग आरोपों की स्वतंत्र जांच करनी है। समिति पुलिस की कथित ज्यादती, सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे मामलों की भी पड़ताल करेगी। जांच के दौरान समिति उपलब्ध दस्तावेजों, अन्य साक्ष्यों और लोगों की ओर से दिए गए प्रतिवेदनों पर विचार कर सकती है। गवाहों की सुरक्षा को देखते हुए गुमनाम शिकायतों की अनुमति भी दी गई है। इससे उन लोगों को अपनी बात रखने का मौका मिलेगा, जिन्हें पहचान सामने आने पर खतरा महसूस होता है।
ये भी पढ़ें:



