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​BRICS 2026: सऊदी अरब-यूएई जैसे तेल संपन्न देश ब्रिक्स में क्यों हुए शामिल? यहां समझें पूरा गणित

ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन का नई दिल्ली में आगाज हो चुका है. इस 18वें शिखर सम्मेलन में शामिल होने को रूसी राष्ट्रपति पुतिन पहुंच चुके हैं. शी जिनपिंग समेत अन्य वैश्विक नेता भी पहुंच रहे हैं. ब्रिक्स की शुरुआत में सिर्फ ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी लेकिन दो बरस पहले कई देश इस संगठन का हिस्सा बने. इनमें सऊदी अरब और यूएई भी शामिल हैं. जब नए देश जुड़े तो भी सवाल उठे और जब नई दिल्ली में सदस्य देश फिर से जुट रहे हैं तो भी सवाल बने हुए हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सऊदी अरबयूएई जैसे तेल, गैस संपन्न देश ब्रिक्स में क्यों हुए शामिल? आइए, इसे समझते हैं.

​BRICS 2026: सऊदी अरब-यूएई जैसे तेल संपन्न देश ब्रिक्स में क्यों हुए शामिल? यहां समझें पूरा गणित

ब्रिक्स में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का शामिल होना वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है. यह कदम केवल किसी नए अंतरराष्ट्रीय संगठन की सदस्यता हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश, कूटनीतिक संतुलन और बदलती विश्व व्यवस्था जैसे कई महत्वपूर्ण कारण हैं. ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी. बाद में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से इसका नाम ब्रिक्स पड़ा. वर्ष 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को समूह के विस्तार के तहत शामिल किया गया. इसके बाद यह मंच विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के एक बड़े समूह में बदल गया.

पश्चिमी निर्भरता को संतुलित करने की रणनीति

सऊदी अरब और UAE लंबे समय से अमेरिका और पश्चिमी देशों के महत्वपूर्ण साझेदार रहे हैं. उनकी सुरक्षा, हथियारों की खरीद, वित्तीय व्यवस्था और ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा पश्चिमी देशों से जुड़ा रहा है. इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में खाड़ी देशों ने अपनी विदेश नीति में अधिक स्वतंत्रता दिखानी शुरू की है. इन देशों को एहसास हुआ है कि किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में जोखिम पैदा कर सकती है. अमेरिका की नीतियों में बदलाव, पश्चिम एशिया में बदलते सैन्य समीकरण और वैश्विक राजनीति में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने खाड़ी देशों को वैकल्पिक साझेदार तलाशने के लिए प्रेरित किया है.

ब्रिक्स की सदस्यता सऊदी अरब और यूएई को चीन, भारत, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के साथ मजबूत संबंध बनाने का अवसर देती है. इसका अर्थ यह नहीं है कि ये देश अमेरिका से संबंध समाप्त करना चाहते हैं. वास्तव में, उनकी नीति संतुलन बनाने की है. वे पश्चिम के साथ भी संबंध रखना चाहते हैं और पूर्वी तथा विकासशील देशों के साथ भी सहयोग बढ़ाना चाहते हैं.

तेल और गैस के लिए बड़ा बाजार

सऊदी अरब और UAE की अर्थव्यवस्था में तेल और गैस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. सऊदी अरब दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में शामिल है, जबकि यूएई भी ऊर्जा क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाता है. ब्रिक्स में भारत और चीन जैसे दुनिया के बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश मौजूद हैं. भारत और चीन दोनों की अर्थव्यवस्थाओं को लगातार बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आवश्यकता होती है. ऐसे में ब्रिक्स मंच ऊर्जा उत्पादक देशों और ऊर्जा उपभोक्ता देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का एक प्रभावी माध्यम बन सकता है.

सऊदी अरब और यूएई के लिए यह सदस्यता अपने ऊर्जा निर्यात के बाजार को अधिक सुरक्षित और विविध बनाने का अवसर है. यदि पश्चिमी बाजारों में मांग घटती है या वहां राजनीतिक दबाव बढ़ता है, तो एशिया और अन्य उभरते बाजारों में ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है. इसके अलावा, दीर्घकाल में ऊर्जा क्षेत्र में संयुक्त निवेश, रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं.

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहते हैं.

चीन और भारत के साथ आर्थिक संबंध

चीन, सऊदी अरब और UAE का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है. चीन को ऊर्जा की आवश्यकता है और खाड़ी देशों के पास तेल तथा गैस के विशाल भंडार हैं. इस वजह से दोनों पक्षों के आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं. भारत भी सऊदी अरब और यूएई के लिए महत्वपूर्ण साझेदार है. भारत और खाड़ी देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, निवेश, प्रवासी भारतीयों और समुद्री संपर्कों के क्षेत्र में गहरे संबंध हैं.

यूएई में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रहते हैं और दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं. ब्रिक्स की सदस्यता इन द्विपक्षीय संबंधों को बहुपक्षीय सहयोग में बदल सकती है. इससे व्यापारिक समझौते, बैंकिंग सहयोग, निवेश और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को नया मंच मिल सकता है. खाड़ी देशों की पूंजी और भारत तथा चीन की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मिलकर विकास के नए अवसर पैदा कर सकती हैं.

डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश

ब्रिक्स में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था विकसित करने पर चर्चा होती रही है. सऊदी अरब और यूएई के लिए यह विषय विशेष महत्व रखता है, क्योंकि उनका ऊर्जा व्यापार परंपरागत रूप से अमेरिकी डॉलर पर आधारित रहा है. हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि खाड़ी देश डॉलर को तुरंत छोड़ने जा रहे हैं. डॉलर अभी भी वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था की प्रमुख मुद्रा है. फिर भी, स्थानीय मुद्राओं में सीमित व्यापार, द्विपक्षीय भुगतान व्यवस्था और वैकल्पिक वित्तीय तंत्र इन देशों को अधिक विकल्प दे सकते हैं.

अमेरिकी डॉलर.

यदि तेल और अन्य वस्तुओं के व्यापार में अलगअलग मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ता है, तो भुगतान प्रणाली में विविधता आएगी. इससे किसी एक मुद्रा और वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है. यह बदलाव धीरेधीरे होगा, लेकिन ब्रिक्स की सदस्यता इस दिशा में बातचीत को गति दे सकती है.

निवेश और आर्थिक विविधीकरण

सऊदी अरब और यूएई दोनों ही तेल पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहे हैं. सऊदी अरब ने विजन 2030 के माध्यम से पर्यटन, निर्माण, तकनीक, लॉजिस्टिक्स, मनोरंजन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देने की योजना बनाई है. यूएई पहले से ही वित्त, विमानन, पर्यटन, रियल एस्टेट और व्यापार का बड़ा केंद्र बन चुका है. ब्रिक्स देशों के साथ जुड़कर खाड़ी देश अपनी अर्थव्यवस्था में अधिक विदेशी निवेश आकर्षित कर सकते हैं. भारत की सूचना तकनीक, चीन की विनिर्माण क्षमता, रूस की ऊर्जा और रक्षा विशेषज्ञता तथा ब्राजील की कृषि शक्ति इन देशों के लिए नए सहयोग के अवसर पैदा कर सकती है. इसके अलावा, ब्रिक्स के माध्यम से सऊदी अरब और यूएई अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के बाजारों तक अपनी पहुंच बढ़ा सकते हैं. इन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और डिजिटल सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है.

All set for BRICS 2026!@BricsIndia2026 pic.twitter.com/nXqqoBmoAm

— Narendra Modi September 10, 2026

पश्चिम एशिया में कूटनीतिक प्रभाव

सऊदी अरब और यूएई केवल आर्थिक शक्तियां नहीं हैं, बल्कि पश्चिम एशिया की राजनीति में भी उनका महत्वपूर्ण प्रभाव है. ब्रिक्स में शामिल होकर वे वैश्विक कूटनीति में अपनी भूमिका को और मजबूत करना चाहते हैं. ब्रिक्स में ईरान का शामिल होना भी महत्वपूर्ण है. सऊदी अरब और ईरान लंबे समय तक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी रहे हैं. दोनों देशों के एक ही मंच पर आने से संवाद और तनाव कम करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं. हालांकि, इससे सभी विवाद समाप्त नहीं होंगे, लेकिन बातचीत के लिए एक अतिरिक्त मंच जरूर उपलब्ध होगा. यूएई के लिए भी ब्रिक्स सदस्यता उसकी बहुध्रुवीय विदेश नीति के अनुरूप है. यूएई अलगअलग शक्तियों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखने की नीति पर चलता रहा है. वह अमेरिका, चीन, भारत, रूस और यूरोपीय देशों के साथ अपने हितों के अनुसार सहयोग करना चाहता है.

क्या यह अमेरिका विरोधी कदम है?

सऊदी अरब और यूएई का ब्रिक्स में शामिल होना सीधे तौर पर अमेरिका विरोधी कदम नहीं माना जाना चाहिए. दोनों देशों के अमेरिका के साथ सुरक्षा और आर्थिक संबंध अब भी महत्वपूर्ण हैं. ब्रिक्स को भी केवल पश्चिम विरोधी गठबंधन के रूप में देखना सही नहीं होगा. यह समूह अलगअलग राजनीतिक विचार रखने वाले देशों को एक साथ लाता है. भारत के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंध हैं, जबकि रूस और चीन का अमेरिका के साथ रणनीतिक तनाव है. ऐसे में ब्रिक्स का उद्देश्य अधिकतर विकासशील देशों की आवाज मजबूत करना, आर्थिक सहयोग बढ़ाना और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करना है.

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