मौसम विभाग ने 12 सितंबर से कुछ दिनों के लिए देश के कई हिस्सों में बारिश, तेज हवाओं के संकेत जारी किए हैं. मतलब बदरा फिर से बरसेंगे. आपको भिगोएंगे. तैयार हो जाइए. यह मानसून की विदाई से ठीक पहले का मामला है. आइए इसी बहाने जान लेते हैं कि मानसून की विदाई कब और कैसे होती है? विज्ञान इस मसले पर क्या कहता है?

भारत में मानसून सिर्फ बारिश का मौसम नहीं है. यह देश की खेती, जल भंडारण और अर्थव्यवस्था से जुड़ा बड़ा मौसम तंत्र है. आमतौर पर दक्षिणपश्चिम मानसून जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है. सितंबर के बाद इसकी ताकत धीरेधीरे कम होने लगती है. इसके बाद मानसून की विदाई शुरू होती है. इस साल मानसून की विदाई से पहले बारिश का एक और दौर देखने को मिल सकता है.
मौसम विभाग से जुड़े पूर्वानुमानों के अनुसार, 12 सितंबर से 21 सितंबर के बीच देश के कई हिस्सों में बारिश, गरज और तेज हवाओं की संभावना है. यह स्थिति देखने में थोड़ी असामान्य लग सकती है. एक तरफ मानसून की विदाई की बात हो रही है. दूसरी तरफ बारिश का दौर बढ़ने का अनुमान है. लेकिन मौसम विज्ञान के अनुसार, मानसून की विदाई अचानक नहीं होती. यह कई चरणों में पूरी होने वाली प्रक्रिया है.
मानसून की विदाई सबसे पहले कहां से होती है?
भारत में मानसून की विदाई आमतौर पर उत्तरपश्चिम भारत से शुरू होती है. इसमें राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल होते हैं. विदाई की प्रक्रिया सितंबर के दूसरे सप्ताह के आसपास शुरू हो सकती है. हालांकि, इसकी सही तारीख हर साल अलग होती है. मौसम विभाग कई वैज्ञानिक संकेतों के आधार पर इसकी घोषणा करता है. उत्तरपश्चिम भारत से मानसून पीछे हटने के बाद यह मध्य भारत की ओर बढ़ता है. इसके बाद पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में मानसून की गतिविधि कम होती है. दक्षिण भारत के कुछ इलाकों में बारिश का असर अक्टूबर और नवंबर तक रहता है.
सितंबर में मानसून पूरी तरह खत्म नहीं होता. फोटो: PTI
मानसून की विदाई कैसे पहचानी जाती है?
मानसून की विदाई केवल बारिश कम होने से तय नहीं होती. इसके लिए कई संकेत देखे जाते हैं. सबसे पहले किसी क्षेत्र में लगातार कई दिनों तक बारिश की गतिविधि कम होती है. आसमान में बादल कम होने लगते हैं. हवा में नमी घटती है. दिन और रात के तापमान में अंतर बढ़ने लगता है. इसके साथ ही सतह के पास हवाओं की दिशा में भी बदलाव आता है. मानसून के दौरान हवाएं समुद्र से जमीन की ओर आती हैं.
विदाई के समय यह प्रवाह कमजोर पड़ने लगता है. कई बार हवाओं की दिशा उत्तरपश्चिम या उत्तरपूर्व की ओर बदलने लगती है. वायुमंडल में नमी की मात्रा भी कम होती है. ऊंचाई वाले स्तरों पर शुष्क हवा का प्रभाव बढ़ता है. इन सभी संकेतों को देखने के बाद मौसम विभाग किसी क्षेत्र से मानसून की विदाई की घोषणा करता है.
मानसून ट्रफ की भूमिका क्या है?
मानसून ट्रफ कम दबाव का एक लंबा क्षेत्र होता है. यह आमतौर पर उत्तरपश्चिम भारत से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैला रहता है. यह ट्रफ मानसून की बारिश को नियंत्रित करता है. जब ट्रफ दक्षिण की ओर खिसकता है, तब भारत के बड़े हिस्से में बारिश बढ़ सकती है. जब यह उत्तर की ओर चला जाता है, तब मैदानी इलाकों में बारिश कम हो सकती है. हिमालय की तलहटी में बारिश बढ़ सकती है. मानसून की विदाई के समय यह ट्रफ कमजोर पड़ने लगता है. इसके कारण बारिश का क्षेत्र भी धीरेधीरे सिमटता जाता है. हालांकि, ट्रफ के आसपास कम दबाव का क्षेत्र बन जाए तो विदाई के दौरान भी तेज बारिश हो सकती है.
12 से 21 सितंबर के बीच मध्य भारत, दक्षिण भारत, पूर्वी भारत और पश्चिमी भारत के कई हिस्सों में बारिश का अनुमान है. फोटो: PTI
12 से 21 सितंबर के बीच बारिश क्यों?
सितंबर में मानसून पूरी तरह खत्म नहीं होता. इस महीने में कई बार बंगाल की खाड़ी और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में कम दबाव का क्षेत्र बनता है. कम दबाव का क्षेत्र हवा को ऊपर उठाता है. इससे बादल बनते हैं. नमी से भरी हवाएं समुद्र से जमीन की ओर आती हैं. इन हवाओं के कारण मध्य, पूर्वी, दक्षिणी और पश्चिमी भारत में बारिश हो सकती है.
मौसम से जुड़े पूर्वानुमानों के अनुसार, 12 सितंबर से 21 सितंबर के बीच मध्य भारत, दक्षिण भारत, पूर्वी भारत और पश्चिमी भारत के कई हिस्सों में सक्रिय बारिश हो सकती है. कुछ इलाकों में गरज के साथ बौछारें पड़ सकती हैं. तेज हवाएं भी चल सकती हैं. यह बारिश मानसून की विदाई को कुछ समय के लिए धीमा कर सकती है. इसका मतलब यह नहीं है कि मानसून फिर से पूरी ताकत के साथ लौट आया है. यह विदाई से पहले आने वाला सक्रिय दौर हो सकता है.
किसानों के लिए सितंबर की बारिश क्यों जरूरी है?
सितंबर की बारिश खेती के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है. इस समय खरीफ फसलें खेतों में बढ़ रही होती हैं. धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलों को मिट्टी में नमी की जरूरत होती है. अगर बारिश सही समय पर होती है, तो फसलों को फायदा मिल सकता है. मिट्टी में नमी बनी रहती है. सिंचाई की जरूरत कम हो सकती है. जलाशयों में भी पानी बढ़ सकता है. लेकिन बहुत ज्यादा बारिश नुकसान भी पहुंचा सकती है. खेतों में पानी भर सकता है. फसलें गिर सकती हैं. कटाई के लिए तैयार फसलों को नुकसान हो सकता है. इसलिए बारिश की मात्रा और उसका वितरण दोनों महत्वपूर्ण हैं.
India may witness one final spell of monsoon activity before the southwest monsoon retreats. Rainfall is expected across parts of Central, South, East and West India from September 1221.
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— PBSHABD September 9, 2026
क्या मानसून की विदाई का मतलब बारिश पूरी तरह खत्म होना है?
मानसून की विदाई का अर्थ यह नहीं है कि देश के हर हिस्से में बारिश तुरंत बंद हो जाएगी. कुछ क्षेत्रों में स्थानीय मौसम प्रणालियों के कारण बारिश जारी रह सकती है. बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र पूर्वी और मध्य भारत में बारिश ला सकते हैं. दक्षिण भारत में अक्टूबर और नवंबर के दौरान उत्तरपूर्वी मानसून सक्रिय हो सकता है. तमिलनाडु, पुडुचेरी, आंध्र प्रदेश और केरल के कुछ हिस्सों में इस दौरान बारिश होती है. इसीलिए मानसून की विदाई को एक लंबी प्रक्रिया माना जाता है. उत्तरपश्चिम भारत में विदाई पहले होती है. दक्षिणपूर्वी तट पर इसका प्रभाव बाद तक बना रह सकता है.
आम लोगों को क्या सावधानी रखनी चाहिए?
आंधी और बिजली चमकने के दौरान खुले मैदान में न रहें. पेड़ के नीचे खड़े न हों. बिजली के खंभों और धातु की वस्तुओं से दूरी बनाए रखें. तेज बारिश के दौरान जलभराव वाले रास्तों पर जाने से बचें. पहाड़ी इलाकों में यात्रा करने से पहले स्थानीय मौसम चेतावनी जरूर देखें. किसानों को खेतों में पानी निकासी की व्यवस्था करनी चाहिए. तेज हवा की संभावना हो तो ढीली वस्तुओं और कृषि उपकरणों को सुरक्षित जगह पर रखें. मौसम विभाग की चेतावनी को गंभीरता से लेना जरूरी है. स्थानीय स्तर पर मौसम का असर अलगअलग हो सकता है. इसलिए सामान्य अनुमान के बजाय अपने जिले की ताजा चेतावनी देखना अधिक सुरक्षित है.
मानसून की विदाई एक वैज्ञानिक और धीरेधीरे होने वाली प्रक्रिया है. यह उत्तरपश्चिम भारत से शुरू होती है. इसके बाद मानसून मध्य, पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों से पीछे हटता है. सितंबर में बारिश का एक और सक्रिय दौर आना इस प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है. 12 सितंबर से 21 सितंबर के बीच संभावित बारिश से कई राज्यों को राहत मिल सकती है. लेकिन तेज बारिश, आंधी, बिजली और जलभराव का खतरा भी बना रहेगा.
विज्ञान बताता है कि मानसून की विदाई केवल कैलेंडर की तारीख से तय नहीं होती. हवा की दिशा, नमी, बादलों की स्थिति, कम दबाव के क्षेत्र और बारिश के लगातार कम होने जैसे संकेतों का अध्ययन किया जाता है. इसलिए मानसून की विदाई को समझने के लिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि बारिश हो रही है या नहीं. जरूरी यह है कि बारिश का क्षेत्र कितना सिमट रहा है, हवाओं का रुख क्या है और वातावरण में नमी कितनी बची है.



