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श्रीकृष्ण जन्म की वो दिव्य रात, जब प्रकृति भी हो गई थी मंगलमय, जानें क्या हुआ था उस पावन क्षण.

श्रीकृष्ण जन्म की वो दिव्य रात, जब प्रकृति भी हो गई थी मंगलमय, जानें क्या हुआ था उस पावन क्षण.

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में आधी रात के समय भगवान श्रीकृष्ण का मथुरा की कारागार में प्राकट्य हुआ था।

श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का बेहद सुंदर और दिव्य वर्णन मिलता है। यह प्रसंग केवल भगवान के जन्म की कथा नहीं है, बल्कि उस समय की परिस्थितियों और प्रकृति में आए शुभ बदलावों का भी वर्णन करता है।

अधर्म बढ़ा तो भगवान ने लिया अवतार

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कंस के अत्याचार से धरती पर अधर्म बढ़ता जा रहा था। पृथ्वी अत्याचारों से व्याकुल होकर गौ का रूप धारण कर देवताओं के साथ ब्रह्मा जी के पास पहुंची।

देवताओं ने भगवान से पृथ्वी का भार कम करने और अधर्म का अंत करने की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेने का संकल्प किया।

श्रीकृष्ण के जन्म से पहले बदल गया था प्रकृति का रूप

श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण के प्राकट्य से पहले के वातावरण का बहुत मनोहारी वर्णन मिलता है। ऐसा बताया गया है कि उस समय चारों ओर शुभ और शांत वातावरण बनने लगा था।

आकाश स्वच्छ हो गया था और नक्षत्र तथा ग्रह शांत दिखाई दे रहे थे। दिशाएं निर्मल और प्रसन्न थीं। नदियों का जल साफ हो गया था। रात के समय भी सरोवरों में कमल खिलने लगे थे।

वन और उपवन रंग-बिरंगे फूलों से सज गए थे। पक्षियों की मधुर आवाज और भौरों की गुनगुनाहट वातावरण को आनंदमय बना रही थी। ठंडी और सुगंधित हवा चल रही थी, जिससे चारों ओर सुखद माहौल बन गया था।

कंस के अत्याचार के कारण जिन स्थानों पर धार्मिक अनुष्ठानों की अग्नि बुझ गई थी, वहां अग्निहोत्र की अग्नियां फिर से प्रज्वलित होने लगीं। संतों और साधुजनों के मन में भी प्रसन्नता छा गई।

देवताओं ने भी मनाया भगवान का आगमन

जब भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का समय आया, तब स्वर्ग में देवताओं की दुंदुभियां बजने लगीं। किन्नर और गंधर्व मधुर गीत गाने लगे। सिद्ध और चारण भगवान की स्तुति करने लगे।

देवताओं और ऋषि-मुनियों ने प्रसन्न होकर पुष्पों की वर्षा की। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पूरी सृष्टि भगवान के धरती पर आगमन का स्वागत कर रही हो।

आधी रात को हुआ भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात को मथुरा की कारागार में भगवान श्रीकृष्ण देवकी के गर्भ से प्रकट हुए। धार्मिक ग्रंथों में उनके जन्म के समय के दिव्य स्वरूप का विशेष वर्णन मिलता है।

मान्यता के अनुसार, भगवान ने देवकी और वसुदेव के सामने दिव्य चतुर्भुज रूप धारण किया था। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे। उनके शरीर पर पीतांबर और वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न था।

भगवान के इस दिव्य स्वरूप को देखकर देवकी और वसुदेव समझ गए कि उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु प्रकट हुए हैं।

देवकी और वसुदेव ने की भगवान की स्तुति

भगवान का दिव्य स्वरूप देखकर देवकी और वसुदेव ने उनकी स्तुति की। देवकी ने भगवान से प्रार्थना की कि वे अपना दिव्य स्वरूप बदलकर सामान्य शिशु का रूप धारण कर लें, क्योंकि उन्हें कंस से अपने पुत्र की सुरक्षा की चिंता थी।

भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया और बाल रूप धारण किया। इसके बाद श्रीकृष्ण के जीवन की वह अद्भुत कथा शुरू हुई, जिसने आगे चलकर अत्याचार और अधर्म के अंत का मार्ग प्रशस्त किया।

श्रीकृष्ण जन्म का यह प्रसंग भारतीय धार्मिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जन्माष्टमी के अवसर पर भक्त भगवान श्रीकृष्ण के इसी दिव्य प्राकट्य और उनकी बाल लीलाओं का स्मरण करते हैं।

डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं तथा श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग पर आधारित है। अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में कथा के विवरण में कुछ भिन्नताएं मिल सकती हैं।

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