हिंदी और तकनीक का तालमेल बढ़ता रहा है. इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड ने डिजिटल दुनिया में हिंदी का दायरा बढ़ाया है. वाइस टाइपिंग का ट्रेंड अलग ही इतिहास रच रहा है. इस ट्रेंड ने उन लोगों को भी हिंदी की ताकत से रूबरू कराया जो ठीक से लिखना नहीं जानते. हिंदी अपनी शुरुआत से लेकर कई बदलाव के दौर से गुजरी है. अब से 77 बरस पहले आज ही के दिन यानी 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से तय किया कि देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी भारत की राज भाषा होगी. राष्ट्र भाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 में पहली बार आधिकारिक तौर पर पूरे देश में 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया गया. आज जिस तरह से हिंदी फलफूल रही है, उसमें हमारे साहित्यकारों ने भी बहुत बड़ा योगदान दिया. तुलसी, कबीर, सूरदास ने योगदान दिया तो भारतेन्दु हरिश्चंद्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भी हिन्दी को समृद्ध किया.

आइए हिंदी दिवस के बहाने समझते हैं कि हिंदी का इतिहास कितना पुराना है? कैसे जीवन में इसके इस्तेमाल का तरीका बदला? टाइपराइटर से लेकर इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड और आज वॉइस टाइपिंग कैसे बदल रही है लोगों की आदत?
रातोंरात नहीं हुआ हिंदी का विकास
हिंदी भारत की प्रमुख भाषाओं में से एक है. इसका इतिहास बहुत पुराना है. हिंदी का विकास अचानक नहीं हुआ. यह कई भाषाओं और बोलियों के लंबे मेल से बनी है. हिंदी की जड़ें भारतीय आर्य भाषा परिवार में मानी जाती हैं. संस्कृत इस परिवार की प्राचीन भाषा थी. संस्कृत से प्राकृत भाषाएं बनीं. प्राकृत से अपभ्रंश भाषाओं का विकास हुआ. आगे चलकर इन्हीं से हिंदी की कई बोलियां बनीं. हिंदी के विकास में शौरसेनी अपभ्रंश की बड़ी भूमिका रही. लगभग दसवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच हिंदी का प्रारंभिक रूप दिखाई देने लगा.
हिंदी कई भाषाओं और बोलियों के लंबे मेल से बनी है. फोटो: Pexels
उस समय भाषा का रूप आज की हिंदी से अलग था. इसमें स्थानीय शब्दों का अधिक प्रयोग होता था. समय के साथ हिंदी की कई बोलियां विकसित हुईं. इनमें ब्रज भाषा, अवधी, बुंदेली, भोजपुरी, हरियाणवी और राजस्थानी प्रमुख हैं. खड़ी बोली ने आगे चलकर आधुनिक मानक हिंदी का रूप लिया.
भक्ति काल में हिंदी ने लिया विस्तार
हिंदी के इतिहास में भक्ति काल का विशेष महत्व है. इस समय संतों और कवियों ने लोकभाषाओं में रचनाएं कीं. उनकी भाषा आम लोगों के करीब थी. कबीर ने सरल भाषा में सामाजिक रूढ़ियों पर सवाल उठाए. सूरदास ने ब्रज भाषा में भक्ति काव्य लिखा. तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस की रचना की. मीराबाई ने भी लोक भाषा में भक्ति गीत लिखे. इन कवियों ने हिंदी को घरघर पहुंचाया. धार्मिक विचार केवल विद्वानों तक सीमित नहीं रहे. आम लोग भी उन्हें समझने लगे. इस दौर में हिंदी बोलने और सुनने की भाषा के साथ साहित्य की भाषा भी बनी.
कैसे सामने आई आधुनिक हिंदी?
आधुनिक हिंदी का विकास मुख्य रूप से खड़ी बोली से हुआ. यह बोली दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आसपास बोली जाती थी. उन्नीसवीं शताब्दी में इसका साहित्यिक रूप मजबूत हुआ. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आधुनिक हिंदी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण काम किया. उन्होंने नाटक, पत्रकारिता और निबंध के माध्यम से हिंदी का प्रसार किया. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी लेखन को व्यवस्थित रूप दिया. प्रेमचंद ने हिंदी को आम जीवन से जोड़ा. उन्होंने किसानों, मजदूरों और मध्यम वर्ग की समस्याओं पर लिखा. उनकी भाषा सरल थी. इससे हिंदी पाठकों की संख्या बढ़ी. स्वतंत्रता आंदोलन में भी हिंदी का उपयोग बढ़ा. नेताओं ने लोगों से संवाद करने के लिए भारतीय भाषाओं का सहारा लिया. हिंदी ने अलगअलग क्षेत्रों के लोगों के बीच संपर्क बनाने में मदद की.
हिंदी टाइपराइटर ने लिखने की आदत में बड़ा बदलाव किया. फोटो: Pexels
हिंदी के इस्तेमाल में कैसे आए बदलाव?
पहले हिंदी का उपयोग मुख्य रूप से बोलचाल, लोकगीत और धार्मिक रचनाओं में होता था. लिखित सामग्री सीमित लोगों तक पहुंचती थी. शिक्षा का प्रसार कम था. छपाई की सुविधा भी बहुत कम थी. छापाखाने के विकास के बाद हिंदी पुस्तकों और समाचार पत्रों की संख्या बढ़ी. लोगों को पढ़ने की सामग्री मिलने लगी. पत्रिकाओं ने नए विचारों को घरों तक पहुंचाया. आज हिंदी का उपयोग जीवन के हर क्षेत्र में होता है. शिक्षा, प्रशासन, पत्रकारिता और मनोरंजन में हिंदी की बड़ी भूमिका है. हिंदी फिल्मों और टेलीविजन ने इसे देश के अलगअलग हिस्सों तक पहुंचाया. इंटरनेट ने हिंदी के इस्तेमाल को और बदल दिया है. अब लोग हिंदी में ईमेल लिखते हैं. सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं. ऑनलाइन खरीदारी करते हैं. डिजिटल भुगतान और सरकारी सेवाओं में भी हिंदी का विकल्प मिलता है.
कैसी थी टाइपराइटर के दौर की हिंदी?
हिंदी टाइपराइटर ने लिखने की आदत में बड़ा बदलाव किया. इससे हाथ से लिखने की जरूरत कम हुई. कार्यालयों में पत्र, आवेदन और रिपोर्ट तेजी से तैयार होने लगीं. हिंदी टाइपराइटर में देवनागरी अक्षरों के लिए अलग कुंजियां होती थीं. हर अक्षर और मात्रा का अपना स्थान था. टाइपिस्ट को इन कुंजियों की स्थिति याद करनी पड़ती थी. हिंदी टाइपिंग सीखना आसान नहीं था. इसमें नियमित अभ्यास की जरूरत होती थी. मात्रा, संयुक्त अक्षर और आधे अक्षर टाइप करना कठिन माना जाता था. उस समय टाइपिस्ट सरकारी कार्यालयों और निजी संस्थानों में बहुत जरूरी होते थे. उनकी मांग अधिक थी. एक कुशल टाइपिस्ट कम समय में बड़ी मात्रा में सामग्री तैयार कर सकता था. टाइपराइटर की अपनी सीमाएं भी थीं. इसमें गलत अक्षर सुधारना कठिन होता था. कागज बदलना पड़ता था. फॉन्ट बदलना भी आसान नहीं था. फिर भी इसने हिंदी लेखन को तेज और व्यवस्थित बनाया.
यूनिकोड ने हिंदी के हर अक्षर को एक मानक कोड दिया. फोटो: Pexels
फिर शुरू हुई कंप्यूटर पर हिंदी टाइपिंग
कंप्यूटर आने के बाद हिंदी लिखने का तरीका फिर बदला. शुरुआत में हिंदी को कंप्यूटर पर लिखना कठिन था. अलगअलग फॉन्ट और कोडिंग का उपयोग होता था. कई लोग कृतिदेव जैसे फॉन्ट में हिंदी लिखते. इसमें अंग्रेजी कुंजी दबाने पर हिंदी अक्षर दिखाई देते थे. यह तरीका सामान्य अंग्रेजी कीबोर्ड से जुड़ा था. इस व्यवस्था की एक समस्या थी. अलग फॉन्ट में लिखी सामग्री हर कंप्यूटर पर सही नहीं खुलती थी. फाइल साझा करने पर अक्षर बिगड़ जाते थे. इंटरनेट पर भी ऐसी सामग्री का उपयोग कठिन था. यूनिकोड के आने से यह समस्या काफी कम हुई. यूनिकोड ने हर अक्षर को एक मानक कोड दिया. अब हिंदी सामग्री अलगअलग उपकरणों पर अधिक आसानी से दिखाई देने लगी.
इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड का खास है महत्व
इनस्क्रिप्ट भारत सरकार द्वारा समर्थित कीबोर्ड व्यवस्था है. इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं के लिए एक मानक टाइपिंग पद्धति बनाना था. इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड में देवनागरी अक्षरों को वैज्ञानिक ढंग से रखा गया है. इसमें स्वर, व्यंजन और मात्राओं के लिए निश्चित कुंजियां होती हैं. अलगअलग भारतीय भाषाओं के कीबोर्ड में भी समान ढांचा मिलता है. इनस्क्रिप्ट सीखने वाला व्यक्ति दूसरी भारतीय भाषाओं में भी आसानी से टाइपिंग सीख सकता है. यह इसकी बड़ी विशेषता है. शुरुआत में इनस्क्रिप्ट कठिन लग सकता है. कुंजियों की स्थिति याद करने में समय लगता है. लेकिन अभ्यास के बाद टाइपिंग तेज हो जाती है. इनस्क्रिप्ट में शब्दों को सही देवनागरी रूप में टाइप किया जा सकता है. यह हिंदी के औपचारिक लेखन के लिए उपयोगी है. सरकारी काम, प्रकाशन और पेशेवर लेखन में इसका महत्व आज भी है.
आज वॉइस टाइपिंग हिंदी लेखन का नया तरीका बन रही है. फोटो: Pexels
फोनेटिक टाइपिंग और मोबाइल ने बहुत कुछ बदल दिया
मोबाइल फोन ने हिंदी टाइपिंग को आम लोगों तक पहुंचाया. अब कई लोग इनस्क्रिप्ट के बजाय फोनेटिक टाइपिंग का उपयोग करते हैं. फोनेटिक टाइपिंग में हिंदी शब्दों को अंग्रेजी अक्षरों में लिखा जाता है. जैसे नमस्ते लिखने के लिए NAMASTE टाइप किया जाता है. सॉफ्टवेयर इसे देवनागरी में बदल देता है. यह तरीका सीखने में आसान है. इसके लिए देवनागरी कीबोर्ड याद करने की जरूरत नहीं होती. युवा वर्ग इसका अधिक उपयोग करता है. मोबाइल कीबोर्ड शब्दों का अनुमान भी लगाता है. वह अगले शब्द का सुझाव देता है. इससे लिखने की गति बढ़ती है. इमोजी और छोटे संदेशों ने संवाद की शैली भी बदल दी है.
वॉइस टाइपिंग आज की नई आदत
आज वॉइस टाइपिंग हिंदी लेखन का नया तरीका बन रही है. इसमें उपयोगकर्ता बोलता है. मोबाइल या कंप्यूटर उसकी आवाज को शब्दों में बदल देता है. वॉइस टाइपिंग से लिखने का समय घटता है. जिन लोगों को कीबोर्ड पर टाइपिंग कठिन लगती है, उनके लिए यह बहुत उपयोगी है. बुजुर्ग और कम पढ़ेलिखे लोग भी इसका लाभ ले सकते हैं. वॉइस टाइपिंग ने हिंदी को अधिक सहज बनाया है. अब लोग बोलकर संदेश लिखते हैं. नोट बनाते हैं. खोज करते हैं. सोशल मीडिया पोस्ट तैयार करते हैं. इससे बोलने और लिखने का अंतर कम हो रहा है. पहले विचार लिखने के लिए हाथ या कीबोर्ड की जरूरत होती थी. अब बोलना ही लेखन की पहली सीढ़ी बन गया है. फिर भी वॉइस टाइपिंग पूरी तरह सही नहीं है. उच्चारण, विराम और स्थानीय बोलियों के कारण कई बार गलत शब्द आ जाते हैं.
इस तरह हम कह सकते हैं कि हिंदी ने खूब तरक्की की है. यह दिनबदिन सुधार की ओर है. हिंदी के महत्व को दुनिया ने भी समझा है. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसे संस्थानों ने भी अपना अमूल्य योगदान दिया है. अभी इसे और आगे जाना है. इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए.



