मुगल इतिहास में 1719 का साल बहुत उथलपुथल भरा था. दिल्ली की सत्ता कमजोर हो चुकी थी. एक के बाद एक बादशाह बदल रहे थे. दरबार में षड्यंत्र बढ़ रहे थे. अमीरों और सेनापतियों का प्रभाव भी बढ़ रहा था. इसी दौर में रफ़ीउद्दौला नाम का एक शहजादा मुगल सिंहासन पर बैठा. इतिहास में उसे शाहजहां द्वितीय के नाम से भी जानता है. वह अपने ही सिपहसालार सैयद बंधुओं की कठपुतली बनकर रह गया था. रफ़ीउद्दौला का शासन बहुत छोटा था.

वह जून 1719 से सितंबर 1719 तक ही बादशाह रहा. उसकी मृत्यु 19 सितंबर 1719 को फतेहपुर सीकरी में हुई थी. इसलिए उसकी डेथ एनिवर्सरी पर साम्राज्य के उस दौर को याद करना जरूरी है, जब बादशाह नाम का था और असली सत्ता दरबार के ताकतवर अमीरों के हाथ में थी.
मुगल साम्राज्य में बढ़ती कमजोरी
औरंगजेब की मृत्यु 1707 में हुई. इसके बाद मुगल साम्राज्य धीरेधीरे कमजोर होने लगा. कोई भी शासक उसके बाद जम नहीं पाया. उत्तराधिकार के लिए लगातार युद्ध हुए. प्रांतों में विद्रोह बढ़े. मराठे, जाट, सिख और राजपूत अपनी शक्ति बढ़ा रहे थे. दरबार में भी गुटबाजी चरम पर थी. कोई अमीर किसी शहजादे का समर्थन करता था. कोई दूसरा अमीर किसी अन्य राजकुमार के साथ खड़ा होता था. बादशाह की शक्ति लगातार घट रही थी. इसी राजनीतिक अस्थिरता का लाभ सैयद बंधुओं ने उठाया. इनका नाम अब्दुल्ला खान और हुसैन अली खान था. दोनों भाई बहुत प्रभावशाली सैन्य और राजनीतिक सरदार थे. इतिहास में उन्हें किंग मेकर्स यानी बादशाह बनाने वाले लोगों के रूप में जाना जाता है.
सैयद बंधु.
क्यों थे सैयद बंधु प्रभावशाली?
सैयद बंधुओं के पास सेना थी. दरबार में उनका मजबूत गुट था. वे जानते थे कि कमजोर बादशाह उनके लिए अधिक उपयोगी होगा. इसलिए वे ऐसे राजकुमार को सिंहासन पर बैठाना चाहते थे, जो उनके निर्णयों का विरोध न करे. फर्रुखसियर के साथ उनका संघर्ष हुआ. फर्रुखसियर ने पहले उनकी सहायता से सत्ता हासिल की थी और लगभग छह साल तक सिंहासन पर रहा. जब वह काबू में नहीं आया तो सैयद बंधुओं ने उसे सत्ता से हटाने की साजिश शुरू की. फिर उसकी हत्या कर दी गई. इसके बाद उन्होंने रफ़ीउद्दाराजात को बादशाह बनाया. उसका शासन भी कुछ ही महीनों तक चला. उसकी तबीयत खराब थी. जून 1719 में उसकी मृत्यु हो गई. अब सैयद बंधुओं को एक नए बादशाह की जरूरत थी. तब उन्होंने रफ़ीउद्दौला को चुना.
रफ़ीउद्दौला का सिंहासन पर बैठना
रफ़ीउद्दौला मुगल शाही परिवार से था. वह रफ़ीउस्शान का पुत्र और बहादुर शाह प्रथम का पौत्र था. उसके परिवार का संबंध मुगल उत्तराधिकार की मुख्य धारा से था. रफ़ीउद्दाराजात की मृत्यु के बाद सैयद बंधुओं ने उसे दिल्ली की गद्दी पर बैठाया. उसने शाहजहां द्वितीय की उपाधि धारण की. यह उपाधि मुगल इतिहास के महान बादशाह शाहजहां की याद दिलाती थी. लेकिन नाम और उपाधि के पीछे वास्तविक शक्ति नहीं थी. रफ़ीउद्दौला के पास स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता बहुत कम थी. सेना सैयद बंधुओं के नियंत्रण में थी. दरबार के बड़े फैसले भी वही लेते थे. बादशाह के पास शाही पद था. सैयद बंधुओं के पास सत्ता की वास्तविक ताकत थी.
इसीलिए उसे कठपुतली बादशाह कहा गया
रफ़ीउद्दौला का शासन सैयद बंधुओं के प्रभाव में चला. वह अपने फैसले स्वतंत्र रूप से नहीं ले सकता था. प्रशासनिक नियुक्तियां, सैन्य फैसले और दरबारी राजनीति पर सैयद बंधुओं का असर था. उस समय बादशाह का पद बहुत प्रतिष्ठित था. जनता और प्रांतों के लिए बादशाह ही साम्राज्य का सर्वोच्च शासक था. लेकिन दिल्ली के भीतर स्थिति बदल चुकी थी. बादशाह के नाम से फरमान जारी होते थे. सिक्कों पर उसका नाम आता था. दरबार में उसके सामने लोग झुकते थे. फिर भी असली निर्णय उन लोगों के हाथ में थे, जिनके पास सेना और राजनीतिक समर्थन था. यही कारण है कि इतिहासकार रफ़ीउद्दौला को सैयद बंधुओं की कठपुतली कहा गया. यह शब्द उस समय की वास्तविक सत्ता व्यवस्था को समझने में मदद करता है.
सत्ता संघर्ष और नेकूसीयर का विद्रोह
रफ़ीउद्दौला के शासनकाल में आगरा में एक और चुनौती सामने आई. कुछ विरोधी सरदारों ने नेकूसीयर को बादशाह घोषित कर दिया. इस घटना से स्पष्ट हुआ कि मुगल सिंहासन पर बैठना अब पर्याप्त नहीं था. किसी भी शहजादे को कुछ अमीरों का समर्थन मिलते ही वह बादशाह बनने का दावा कर सकता था. सत्ता का केंद्र टूट चुका था. अलगअलग गुट अपनी पसंद के राजकुमार को आगे बढ़ा रहे थे. सैयद बंधुओं ने नेकूसीयर के विद्रोह को दबाने का प्रयास किया. लेकिन इस संघर्ष ने मुगल शासन की कमजोरी को सबके सामने ला दिया. दिल्ली का बादशाह अपने ही साम्राज्य में पूरी तरह सुरक्षित नहीं था. आगरा, राजपूताना और अन्य क्षेत्रों में अलगअलग शक्तियां सक्रिय हो चली थीं.
रफ़ीउद्दौला को शाहजहां द्वितीय के नाम से भी जाना गया.
रफ़ीउद्दौला की बीमारी और मृत्यु
रफ़ीउद्दौला लंबे समय तक शासन करने की स्थिति में नहीं था. उसके स्वास्थ्य को लेकर इतिहास में अलगअलग विवरण मिलते हैं. कुछ स्रोतों में उसकी मृत्यु पेचिश जैसी बीमारी से होने का उल्लेख मिलता है. कुछ इतिहासकार उसकी मृत्यु को संदिग्ध मानते हैं और हत्या की संभावना भी बताते हैं. इतिहास में यह बात पूरी निश्चितता से नहीं कही जा सकती कि उसकी मृत्यु बीमारी से हुई या किसी षड्यंत्र का परिणाम थी. इतना स्पष्ट है कि उसका शासन बमुश्किल तीनचार महीने ही रहा. वह राजनीतिक रूप से स्वतंत्र नहीं था. 19 सितंबर 1719 को फतेहपुर सीकरी में उसकी मृत्यु हुई. उसका जीवन मुगल साम्राज्य के उस दौर का प्रतीक बन गया, जब शाही परिवार की प्रतिष्ठा बनी हुई थी, लेकिन सत्ता का वास्तविक आधार कमजोर हो चुका था.
डेथ एनिवर्सरी और उसके संदेश
रफ़ीउद्दौला की डेथ एनिवर्सरी केवल एक बादशाह की मृत्यु को याद करने का अवसर नहीं है. यह मुगल साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया को समझने का दिन भी है. उसकी कहानी बताती है कि किसी साम्राज्य की शक्ति केवल महलों, खिताबों और राजसी परंपराओं से नहीं चलती. मजबूत प्रशासन, स्थिर उत्तराधिकार और विश्वसनीय सेना भी जरूरी होती है. जब शासक कमजोर हो जाता है और दरबार में गुटबाजी बढ़ जाती है, तब सत्ता धीरे धीरे दूसरों के हाथ में चली जाती है. रफ़ीउद्दौला के साथ यही हुआ. वह मुगल वंश का बादशाह था. लेकिन उसके पास स्वतंत्र शासन की शक्ति नहीं थी. उसके नाम पर शासन हुआ. उसके नाम से आदेश जारी हुए. पर निर्णय सैयद बंधु लेते रहे.
इतिहास का बड़ा सबक था रफ़ीउद्दौला का शासन
रफ़ीउद्दौला का जीवन बहुत छोटा था. उसका शासन उससे भी छोटा था. फिर भी उसका इतिहास महत्वपूर्ण है. वह उस समय का प्रतिनिधि था, जब मुगल बादशाहत अपने पुराने वैभव की छाया मात्र रह गई थी. सिंहासन मौजूद था. दरबार मौजूद था. शाही उपाधियां मौजूद थीं. लेकिन सत्ता का संतुलन बदल चुका था. सैयद बंधुओं ने यह साबित कर दिया था कि शक्तिशाली अमीर कमजोर बादशाह को नियंत्रित कर सकते हैं. मगर यह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चल सकती थी.
दरबार में विरोध बढ़ा. प्रांतों में स्वतंत्रता की भावना मजबूत हुई. मुगल शासन का केंद्रीय ढांचा और कमजोर होता गया. रफ़ीउद्दौला की मृत्यु के साथ 1719 का संकट समाप्त नहीं हुआ. इसके बाद भी मुगल सिंहासन पर कई दावेदार आए. लेकिन साम्राज्य की गिरती हुई नींव को कोई मजबूत नहीं कर सका. रफ़ीउद्दौला को याद करते हुए केवल यह नहीं कहना चाहिए कि वह सैयद बंधुओं की कठपुतली था. उसकी कहानी यह भी बताती है कि जब संस्थाएं कमजोर होती हैं, तब व्यक्ति सत्ता का प्रतीक तो बन सकता है, लेकिन सत्ता का वास्तविक मालिक नहीं.


