
लखनऊ, अमृत विचार। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि आर्य समाज मंदिर से जारी विवाह प्रमाण पत्र के एकमात्र आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैध विवाह हुआ है।
वैवाहिक संस्कारों का संपन्न होना भी प्रमाणित
वैध हिंदू विवाह सिद्ध करने के लिए अधिनियम में निर्धारित आवश्यक वैवाहिक संस्कारों का संपन्न होना भी प्रमाणित होना चाहिए। न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने यह टिप्पणी सशस्त्र सीमा बल के अधिकारी रोहित पांडेय की सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त करते हुए की।
क्या था पूरा मामला
याची को वैवाहिक स्थिति के संबंध में कथित रूप से गलत घोषणा करने के आरोप में सेवा से हटा दिया गया था। याची ने 28 अप्रैल 2022 के आदेश द्वारा उसे सेवा से हटाने को चुनौती दी थी। कार्यवाही की शुरुआत सुचेता तिवारी की शिकायत से हुई थी। उनका दावा था कि उन्होंने वर्ष 2007 में एक आर्य समाज मंदिर में याची से विवाह किया था। अधिकारियों ने इस विवाह को वैध मानते हुए निष्कर्ष निकाला था कि याची ने बाद में नियुक्ति के समय स्वयं को अविवाहित बताकर गलत घोषणा की थी।
याची ने कथित विवाह से इनकार करते हुए कहा था कि आवश्यक हिंदू वैवाहिक संस्कार, जिसमें सप्तपदी भी शामिल है, संपन्न होने का कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सुचेता तिवारी के बयान का भी हवाला दिया, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया था कि विवाह हिंदू रीतिरिवाजों के अनुसार संपन्न नहीं हुआ था।
अगस्त 2007 में आर्य समाज मंदिर में विवाह
हालांकि, विभागीय जांच में अधिकारियों ने तिवारी के उस बयान पर भरोसा किया जिसमें उन्होंने कहा था कि अगस्त 2007 में आर्य समाज मंदिर में विवाह हुआ था। मंदिर के पुजारी ने भी जांच में कहा था कि उनकी मौजूदगी में विवाह संपन्न हुआ था।
आदेश निरस्त करते हुए तुरंत नौकरी में लेने का आदेश
हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सिर्फ आर्य समाज मंदिर का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने मात्र से यह नहीं कहा जा सकता कि विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार संपन्न हुआ था। न्यायालय ने याची को सेवा से हटाने का आदेश निरस्त करते हुए संबंधित अधिकारियों को उन्हें तत्काल ड्यूटी पर वापस लेने का निर्देश दिया।



