भले ही इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम में करीब 2 फीसदी की तेजी देखने को मिल रही हो, लेकिन कीमतें अभी 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बनी हुई हैं. यही कारण है कि सरकार ने डीजल और एटीएफ के एक्सपोर्ट पर लगाए गए विंडफॉल टैक्स को कम कर दिया है. जोकि पेट्रोलियम कंपनियों के लिए एक बड़ी राहत है. वैसे पेट्रोल के एक्सपोर्ट पर लगाए जाने वाले टैक्स में कोई बदलाव नहीं किया गया है. ऐसे में जब पेट्रोलियम कंपनियों को घरेलू स्तर पर पेट्रोल, डीजल और एटीएफ बेचने पर प्रति लीटर नुकसान उठाना पड़ रहा हो, तो एक्सपोर्ट से कमाई का ही एक रास्ता बनता है. सरकार घरेलू सप्लाई में इजाफा करने के लिए कंपनियों पर विंडफॉल टैक्स लगाती है. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर सरकार की ओर से किस तरह का फैसला लिया गया है.

कितना कम किया विंडफॉल टैक्स
सरकार ने बुधवार को डीजल और एटीएफ के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स में कटौती की, जबकि 1 अक्टूबर से शुरू होने वाले पखवाड़े के लिए पेट्रोल के लिए इसे समान स्तर पर बरकरार रखा. डीजल के एक्सपोर्ट पर सड़क और बुनियादी ढांचा उपकर के साथ विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क की दर अब 20 रुपए प्रति लीटर से कम होकर 16 रुपए प्रति लीटर होगी. एटीएफ के निर्यात पर एसएईडी 10.5 रुपए प्रति लीटर निर्धारित की गई है, जो पहले 15 रुपए प्रति लीटर थी. अगले पखवाड़े के लिए पेट्रोल निर्यात पर शुल्क 0.5 रुपए प्रति लीटर बरकरार रखा गया है. वित्त मंत्रालय ने एक अधिसूचना में कहा कि शुल्क बढ़ोतरी 1 अक्टूबर से प्रभावी होगी.
क्यों लगाया जाता है विंडफॉल टैक्स?
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच, सरकार ने 27 मार्च को डीजल और एटीएफ पर निर्यात शुल्क लगाया और हर पखवाड़े दर में संशोधन किया. 16 मई से पेट्रोल निर्यात पर लेवी लगाई गई. मंत्रालय ने यह भी कहा कि घरेलू खपत के लिए स्वीकृत पेट्रोल और डीजल पर मौजूदा शुल्क दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है. पश्चिम एशिया में युद्ध के बीच ईंधन की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए अप्रत्याशित कर लगाया गया था. इसका उद्देश्य निर्यातकों को मूल्य अंतर के कारण अनुचित लाभ लेने से रोकना भी था क्योंकि युद्ध शुरू होने के बाद से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई थीं. अप्रत्याशित कर का उद्देश्य पश्चिम एशिया संकट के बीच निर्यात को हतोत्साहित करके पेट्रोलियम उत्पादों की घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करना था.



