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​Nana Patekar: क्या है सेना की मानद रैंक, नाना पाटेकर कैसे बने कैप्टन? जानें सैलरी-पेंशन का नियम

फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर नहीं रहे. उन्होंने 75 साल की उम्र में अंतिम सांस ली. फिल्मों में उनके चरित्र याद किए जा रहे हैं. नाटकों में उनके योगदान को भी लोग याद कर रहे हैं. निधन की सूचना के बाद उनकी सेना से जुड़ी भूमिका पर भी चर्चा हो रही है. वे टेरिटोरियल आर्मी से जुड़े थे. उन्हें मानद कैप्टन रैंक से सम्मानित किया गया था.

​Nana Patekar: क्या है सेना की मानद रैंक, नाना पाटेकर कैसे बने कैप्टन? जानें सैलरी-पेंशन का नियम

दावा किया गया है कि बाद में उन्हें प्रमोट करके मानद लेफ्टिनेंट कर्नल की रैंक दी गई. हालांकि, सेना में मानद रैंक वालों की प्रोन्नति की व्यवस्था नहीं है. हां, प्रादेशिक सेना में लंबी सेवा करने वाले अफसर को ब्रिगेडियर रैंक तक प्रोन्नति मिल सकती है.

मानद रैंक क्या होती है?

लेफ्टिनेंट जनरल रहे एमसी भण्डारी बताते हैं कि मानद रैंक सेना की ओर से दिया जाने वाला विशिष्ट सम्मान है. यह किसी व्यक्ति के योगदान, उपलब्धि या सेना से विशेष जुड़ाव को मान्यता देने के लिए दिया जाता है. कुछ मामलों में यह प्रतिष्ठित नागरिकों या खिलाड़ियों को भी देने के प्रमाण मिलते हैं. अलग स्थिति में, लंबे समय तक सेवा कर चुके सैनिकों को सेवानिवृत्ति के समय मानद पद दिया जा सकता है. इन दोनों स्थितियों को एक जैसा नहीं समझना चाहिए. किसी प्रसिद्ध नागरिक को दी गई मानद उपाधि अपने आप नियमित सैन्य सेवा, वेतन या पेंशन का अधिकार नहीं देती. जबकि सेवा पूरी कर रहे सैनिक को दिए जाने वाले मानद कमीशन के वित्तीय परिणाम उसके लागू सेवा नियमों और आदेशों पर निर्भर करते हैं.

मानद रैंक सेना की ओर से दिया जाने वाला विशिष्ट सम्मान है.

नाना पाटेकर को यह सम्मान क्यों मिला?

नाना पाटेकर ने फिल्म प्रहार: द फाइनल अटैक की तैयारी के लिए मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ सैन्य प्रशिक्षण लिया था. कुछ रिपोर्ट्स में उनके प्रादेशिक सेना से जुड़ने और बाद में मानद कैप्टन का दर्जा पाने का उल्लेख है. कारगिल युद्ध के समय वे सैनिकों के साथ भी रहे. उस समय नाना पाटेकर के अनुरोध पर कुछ समय के लिए उन्हें अनुमति मिली थी. उन्होंने सेना के जवानोंअफसरों के साथ कुछ समय बिताया और कुछ गतिविधियों में भाग लिया. उनके साथ सैनिकों के बीच बिताए समय और भूमिका के बारे में अलगअलग रिपोर्ट में कुछ विवरण भी मिलते हैं. इसलिए उनके काम को नियमित युद्धक सेवा या किसी खास सैन्य अभियान की कमान के रूप में पेश नहीं किया जा सकता. माना जाना चाहिए कि एक मशहूर चरित्र अभिनेता होने और सेना के प्रति उनके लगाव को देखते हुए उन्हें यह उपाधि दी गई होगी.

क्या वे लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से रिटायर हुए थे?

प्रादेशिक सेना की वेबसाइट पर नाना से जुड़ी कोई जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है. मीडिया रिपोर्ट्स में उन्हें साल 1990 में प्रादेशिक सेना से जुडने और साल 2013 में वहां से विदा लेने की जानकारी मिल रही है. भर्ती के समय उन्हें कैप्टन और हटने के समय लेफ्टिनेंट कर्नल बताया जा रहा है. लेकिन उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से रिटायर कहना नियमित सेना के अधिकारी की तरह सेवा पूरी करने का अर्थ देता है. उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं होता कि उनकी सेवा किस प्रशासनिक श्रेणी में दर्ज थी या उन्हें किस प्रकार का औपचारिक रिटायरमेंट आदेश मिला था. हां, उन्होंने 2013 में प्रादेशिक सेना से जुड़ी सेवा समाप्त की और उस समय वे मानद लेफ्टिनेंट कर्नल थे. संभव है कि जिसे मानद उपाधि के रूप में कहा जा रहा है, वह असल में प्रादेशिक सेना में पहले मानद कैप्टन रहे हों और बाद में प्रोन्नत होकर लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुंचे हों.

मानद रैंक के आधार पर नियमित मासिक वेतन या अन्य भत्ते मिलने का अधिकार नहीं माना जा सकता.

लेफ्टिनेंट जनरल रहे एमसी भण्डारी कहते हैं कि मानद उपाधि पाने वाले व्यक्ति और प्रादेशिक सेना में शामिल व्यक्ति को अलगअलग तरीके से देखना उचित होगा. वे कहते हैं कि प्रादेशिक सेना के लोगों को वेतन भी मिलता है और जरूरी भत्ते भी. अगर कोई व्यक्ति प्रादेशिक सेना में अफसर भर्ती हुआ है तो वह ब्रिगेडियर तक प्रोन्नति पा सकता है. लेकिन, मानद रैंक केवल और केवल सम्मान है.

वेतन और भत्ते कैसे मिलते हैं?

टेरिटोरियल आर्मी यानी प्रादेशिक सेना नियमित सेना से अलग व्यवस्था है. इसके कर्मचारी या अधिकारी सैन्य प्रशिक्षण, सक्रिय ड्यूटी या बुलाए जाने की अवधि में सेवा करते हैं. वास्तविक सेवा की अवधि में वेतन और लागू भत्ते मिल सकते हैं. राशि, रैंक, सेवा की स्थिति, तैनाती और लागू नियमों पर निर्भर करती है. लेकिन यह व्यवस्था किसी मानद उपाधि पाने वाले व्यक्ति पर अपने आप लागू नहीं होती.

मानद रैंक के आधार पर नियमित मासिक वेतन, फील्ड भत्ता, सैन्य सेवा वेतन या अन्य भत्ते मिलने का कोई सार्वभौमिक अधिकार नहीं माना जा सकता. यह बात व्यक्ति के कमीशन, वास्तविक सेवाअवधि और नियुक्ति के लिखित आदेश से तय होगी. लेफ्टिनेंट जनरल रहे एमसी भण्डारी इसकी पुष्टि करते हैं. नाना पाटेकर के मामले में कोई भी सार्वजनिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, जिससे यह पता चल सके कि उन्हें कितना वेतन या भत्ता मिलता रहा है?

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क्या मानद उपाधि वालों को पेंशन मिलती है?

पेंशन भी केवल मानद रैंक मिलने से तय नहीं होती. पात्रता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति नियमित या प्रादेशिक सेना का किस प्रकार का सदस्य था, कितनी अवधि की मान्य सेवा की, कितनी सेवा पेंशन के लिए गिनी गई और उसके सेवा आदेश में क्या शर्तें थीं. वरिष्ठ सैनिकों को सेवानिवृत्ति पर दिए जाने वाले कुछ मानद कमीशन पेंशन की गणना को प्रभावित कर सकते हैं. पर यह नियम हर मानद रैंकधारी पर लागू नहीं होता. नाना पाटेकर की पेंशन मिलने या न मिलने की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है. यही बात उनके वेतन और भत्तों के बारे में भी जरूरी है.

मानद पद के साथ क्या दायित्व होते हैं?

मानद उपाधि सम्मान और प्रतिनिधित्व से जुड़ी होती है. व्यक्ति को समारोहों, रेजिमेंटल कार्यक्रमों या नागरिकसैनिक संबंधों से जुड़े अवसरों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है. लेकिन मानद पद अपने आप सैन्य कमान, सैनिकों को आदेश देने का अधिकार या रोजमर्रा की सैन्य जिम्मेदारी नहीं देता. किसी खास व्यक्ति की भूमिका उसके नियुक्ति आदेश और सेवा की शर्तों से ही स्पष्ट होती है.

हाल के वर्षों में सम्मान पाने वाली हस्तियां

टेरिटोरियल आर्मी ने 2011 में क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी और निशानेबाज अभिनव बिंद्रा को मानद लेफ्टिनेंट कर्नल का दर्जा दिया था. उसी वर्ष डॉ. दीपक राव को मानद मेजर बनाया गया था. कपिल देव भी टेरिटोरियल आर्मी के मानद लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में जाने जाते हैं. सचिन तेंदुलकर को भारतीय वायुसेना में मानद ग्रुप कैप्टन का दर्जा मिला था, जो सेना से अलग सेवा है.

इस तरह कहा जा सकता है कि नाना पाटेकर का सेना से जुड़ाव वास्तविक था, लेकिन उनकी मानद रैंक को नियमित सैन्य नौकरी के बराबर मानना उचित नहीं होगा. उपलब्ध रिपोर्ट उन्हें शुरुआती दौर में मानद कैप्टन और बाद में मानद लेफ्टिनेंट कर्नल बताती हैं. लेफ्टिनेंट जनरल रहे एमसी भण्डारी कहते हैं कि मानद उपाधि के मामले में प्रोन्नति जैसा मामला नहीं सामने आता. यदि नाना को लेफ्टिनेंट कर्नल पद से रिटायर कहा जा रहा है तो संभव है कि वे प्रादेशिक सेना का हिस्सा रहे हों, क्योंकि वहां प्रोन्नति की व्यवस्था है.

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