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दुनिया में कब-कब ‘कहर’ बरपा चुका है प्लेग? इन महामारियों में गई थी करोड़ों लोगों की जान.

दुनिया में कब-कब ‘कहर’ बरपा चुका है प्लेग? इन महामारियों में गई थी करोड़ों लोगों की जान.

नई दिल्ली: प्लेग का नाम आते ही इतिहास की उन भयावह महामारियों की याद आती है, जिन्होंने अलग-अलग दौर में दुनिया की बड़ी आबादी को प्रभावित किया। यर्सिनिया पेस्टिस नामक बैक्टीरिया से होने वाली यह बीमारी मुख्य रूप से संक्रमित पिस्सुओं के जरिए फैलती है और इसके कुछ रूप बेहद गंभीर हो सकते हैं। हालांकि आज आधुनिक चिकित्सा के कारण प्लेग का इलाज संभव है, लेकिन दुनिया के कुछ हिस्सों में यह बीमारी अब भी मौजूद है।

हाल ही में रूस के साइबेरिया क्षेत्र में एक महिला लैब कर्मचारी की मौत के बाद गंभीर निमोनिया और प्लेग को लेकर चर्चा तेज हुई थी। हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रूस या विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उसकी मौत को प्लेग संक्रमण से होने की पुष्टि नहीं की थी। यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि महिला ऐसे संस्थान में काम करती थी जहां प्लेग से जुड़े बैक्टीरिया पर शोध किया जाता है।

इतिहास में प्लेग कई बार बड़े स्तर पर तबाही मचा चुका है।

जस्टिनियन प्लेग: छठी शताब्दी की भयावह महामारी

541 ईस्वी के आसपास शुरू हुई जस्टिनियन प्लेग महामारी बीजान्टिन साम्राज्य के बड़े हिस्से में फैल गई थी। कॉन्स्टेंटिनोपल समेत कई क्षेत्रों में इसका गंभीर असर देखने को मिला।

माना जाता है कि व्यापारिक मार्गों के जरिए यह संक्रमण अलग-अलग इलाकों तक पहुंचा। उस समय बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और महामारी की कई लहरों ने लंबे समय तक समाज को प्रभावित किया। मृतकों की संख्या को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग अनुमान हैं, इसलिए इसके आंकड़े निश्चित नहीं माने जाते।

इस महामारी ने बीजान्टिन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था, सैन्य क्षमता और सामाजिक व्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डाला।

ब्लैक डेथ: यूरोप की आबादी पर सबसे बड़ा असर

1347 से 1353 के बीच फैली ब्लैक डेथ यानी काली मौत को मानव इतिहास की सबसे विनाशकारी महामारियों में गिना जाता है। यह यूरोप के साथ एशिया और मध्य पूर्व के कई हिस्सों तक पहुंची।

व्यापारिक रास्तों के जरिए संक्रमण बंदरगाहों और फिर घनी आबादी वाले शहरों में फैल गया। अलग-अलग ऐतिहासिक अध्ययनों में मृतकों की संख्या के अलग-अलग अनुमान मिलते हैं, लेकिन माना जाता है कि करोड़ों लोगों की जान गई थी।

यूरोप के कई इलाकों में आबादी का बड़ा हिस्सा खत्म हो गया। इसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव कई दशकों तक महसूस किए गए।

तीसरी प्लेग महामारी: 1855 से शुरू हुआ लंबा दौर

1855 में चीन के युन्नान प्रांत से शुरू हुई तीसरी प्लेग महामारी धीरे-धीरे दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंची। उस समय अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार बढ़ रहा था, जिसके कारण संक्रमण चीन से हांगकांग और फिर भारत सहित दूसरे क्षेत्रों तक फैल गया।

इस महामारी के दौरान दुनिया भर में करोड़ों लोगों की मौत हुई। भारत भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ और कई शहरों में बड़े पैमाने पर संक्रमण और मौतें दर्ज की गईं।

इसी दौर में प्लेग को समझने में बड़ी वैज्ञानिक प्रगति हुई। 1894 में यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया की पहचान प्लेग के कारण के रूप में की गई। इसके बाद बीमारी और चूहों-पिस्सुओं के बीच संबंध को समझने में भी वैज्ञानिकों को मदद मिली।

लंदन का ग्रेट प्लेग

1665 में लंदन में प्लेग का एक बड़ा प्रकोप सामने आया, जिसे ग्रेट प्लेग ऑफ लंदन के नाम से जाना जाता है। करीब एक साल के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और शहर की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्रभावित हुआ।

बीमारी के फैलने के साथ शहर के अमीर और सक्षम लोग दूसरे इलाकों की ओर चले गए, जबकि गरीब आबादी के पास शहर छोड़ने के विकल्प सीमित थे। प्रशासन ने संक्रमण रोकने के लिए संक्रमित घरों को अलग रखने और आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदम उठाए।

1666 की लंदन की भीषण आग के बाद प्लेग के मामलों में कमी आई, लेकिन केवल आग को ही बीमारी के खत्म होने की वजह मानना सही नहीं होगा। बीमारी के प्रसार में स्वच्छता, मौसम, आबादी की स्थिति और अन्य कई कारकों की भूमिका थी।

क्या आज भी मौजूद है प्लेग?

प्लेग को अब केवल इतिहास की बीमारी नहीं माना जा सकता। दुनिया के कुछ हिस्सों में इसके मामले आज भी सामने आते हैं। यह मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में मौजूद रहता है जहां संक्रमित जंगली कृंतक और पिस्सू पाए जाते हैं।

हालांकि आधुनिक चिकित्सा ने स्थिति को काफी बदल दिया है। समय पर पहचान और उचित एंटीबायोटिक उपचार मिलने पर प्लेग का इलाज संभव है। इसके अलावा निगरानी, स्वच्छता, संक्रमित जानवरों और पिस्सुओं के संपर्क से बचाव जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय बीमारी के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्लेग का इतिहास यह दिखाता है कि किसी संक्रामक बीमारी की शुरुआती पहचान, वैज्ञानिक निगरानी और समय पर उपचार कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। सदियों पहले जहां इस बीमारी ने बड़े पैमाने पर जनहानि की, वहीं आज चिकित्सा विज्ञान के विकास ने इसके प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित करना संभव बनाया है।

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