
इंदौर: मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के सांवेर विकासखंड में शिक्षक भर्ती से जुड़ा एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। आरोप है कि फर्जी डीएड और बीएड की डिग्री व अंकसूचियों के आधार पर 51 शिक्षकों ने सरकारी नौकरी हासिल की और करीब 20 वर्षों तक सरकारी स्कूलों में सेवाएं देते रहे। इस दौरान उन्हें नियमित वेतन भी मिलता रहा। इनमें से कुछ शिक्षकों को पदोन्नति मिलने की बात भी सामने आई है। अब शिक्षा विभाग संबंधित शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने और नौकरी के दौरान दिए गए वेतन की वसूली की तैयारी कर रहा है। शुरुआती अनुमान के मुताबिक, वसूली की रकम करीब 100 करोड़ रुपये तक हो सकती है।
2006-07 की भर्ती में सामने आई गड़बड़ी
यह पूरा मामला वर्ष 2006-07 में सांवेर विकासखंड में हुई संविदा शाला शिक्षक भर्ती से जुड़ा है। उस समय नियुक्त किए गए शिक्षकों के शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच की गई तो गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। जांच के दौरान 51 शिक्षकों की डीएड और बीएड की डिग्रियों तथा अंकसूचियों को फर्जी पाया गया।
मामले की शिकायत वर्ष 2021 में की गई थी। इसके बाद शिक्षा विभाग ने नियुक्ति के समय जमा कराए गए दस्तावेजों का सत्यापन शुरू कराया। मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल से मिली जानकारी में पता चला कि कई अंकसूचियां मंडल की ओर से जारी ही नहीं की गई थीं। वहीं, कुछ दस्तावेजों में एक ही रोल नंबर पर किसी दूसरे परीक्षार्थी का रिकॉर्ड मिला।
जांच समिति की रिपोर्ट में भी खुलासा
दस्तावेजों की पड़ताल के लिए चार प्राचार्यों की एक समिति बनाई गई थी। समिति ने मई 2024 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके अलावा विशेष कार्य बल ने भी मामले की जांच की। जांच में संबंधित शिक्षकों के शैक्षणिक दस्तावेजों में फर्जीवाड़े की जानकारी सामने आई।
जिला शिक्षा अधिकारी शौर्य मल्होत्रा ने संबंधित संकुल प्राचार्यों और विकासखंड शिक्षा अधिकारी को 51 शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। बताया जा रहा है कि सितंबर 2024 में भी इस संबंध में कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे, लेकिन उस समय प्राथमिकी दर्ज नहीं हो सकी थी।
50 हजार से एक लाख रुपये तक बताया जा रहा वेतन
जांच में सामने आया है कि संबंधित शिक्षक लंबे समय से सरकारी विद्यालयों में काम कर रहे हैं। इनमें कुछ ऐसे शिक्षक भी हैं, जिन्हें सेवा के दौरान पदोन्नति मिली। फिलहाल उनका मासिक वेतन लगभग 50 हजार रुपये से एक लाख रुपये के बीच बताया जा रहा है।
अब शिक्षा विभाग यह गणना कर रहा है कि प्रत्येक शिक्षक ने नौकरी के दौरान कुल कितना वेतन प्राप्त किया। इसी आधार पर संभावित वसूली की राशि तय की जाएगी। शुरुआती अनुमान में यह रकम करीब 100 करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका जताई गई है। हालांकि, अभी यह अंतिम आंकड़ा नहीं है। वास्तविक राशि संबंधित शिक्षकों की सेवा अवधि और उन्हें मिले कुल वेतन की गणना के बाद ही स्पष्ट होगी।
लोकायुक्त की जांच भी जारी
इस मामले में लोकायुक्त भी जांच कर रहा है। जानकारी के अनुसार, लोकायुक्त ने शिक्षा विभाग से कुल 74 शिक्षकों का रिकॉर्ड मांगा है। इनमें से 51 शिक्षकों के दस्तावेज फर्जी पाए जाने की जानकारी सामने आई है, जबकि अन्य 23 संदिग्ध शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच जारी है।
करीब दो दशक पुरानी भर्ती में सामने आए इस मामले ने नियुक्ति प्रक्रिया और शैक्षणिक दस्तावेजों के सत्यापन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्तियां कैसे हुईं और संबंधित शिक्षक इतने वर्षों तक सरकारी सेवा में कैसे बने रहे।
फिलहाल शिक्षा विभाग एफआईआर दर्ज कराने और वेतन वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी में है। मामले में अंतिम वसूली राशि, कानूनी कार्रवाई और संबंधित शिक्षकों के खिलाफ होने वाले फैसले की स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।
डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध जानकारी और सामने आई रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है। मामले में अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।



