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ओडिशा के आदिवासी किसान ने 10 साल में बचाईं धान की 110 देशी किस्में, 80 किसानों को भी जोड़ा.

ओडिशा के आदिवासी किसान ने 10 साल में बचाईं धान की 110 देशी किस्में, 80 किसानों को भी जोड़ा.

सुंदरगढ़, ओडिशा: आधुनिक खेती में अधिक उत्पादन देने वाली धान की किस्मों का चलन बढ़ने के साथ कई पारंपरिक बीज धीरे-धीरे खेतों से गायब होने लगे। लेकिन ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के एक आदिवासी किसान ने इन देशी किस्मों को बचाने की जिम्मेदारी उठाई। करीब एक दशक की मेहनत से उन्होंने धान की 100 से ज्यादा पारंपरिक किस्मों को संरक्षित किया और आसपास के किसानों को भी इस मुहिम से जोड़ा।

सुंदरगढ़ जिले के धारूडीही गांव के किसान सुरथा किसान ने वर्ष 2014-15 में सिंग्हा बाहिनी सीड बैंक (SBSB) की स्थापना की। उनका मकसद उन पारंपरिक बीजों को बचाना था, जिनका इस्तेमाल स्थानीय किसान लंबे समय से करते आए थे, लेकिन जिनकी खेती धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।

35 किस्मों से शुरू हुआ सफर, अब 110 देशी धान के बीज

सुरथा ने संबलपुर स्थित गैर-सरकारी संगठन देसी बिहाना सुरक्षा मंच (DBSM) के सहयोग से बीज संरक्षण का काम शुरू किया। शुरुआत में उनके बीज बैंक में धान की 35 देशी किस्में थीं। समय के साथ यह संग्रह बढ़ता गया और अब इसमें धान की करीब 110 पारंपरिक किस्में संरक्षित हैं।

धान के अलावा बीज बैंक में छह देशी दलहन किस्मों, मोटे अनाज की 18 किस्मों, सब्जियों की 10 किस्मों और तिलहन की दो किस्मों के बीज भी रखे गए हैं। इस पहल से अब करीब 80 सक्रिय किसान जुड़े हुए हैं, जो देशी बीजों को बचाने और खेती में उनका इस्तेमाल बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।

काला जीरा से लाल जुईगुड़ा तक, कई पारंपरिक किस्में सुरक्षित

सुरथा के बीज बैंक में धान की कई पारंपरिक किस्में शामिल हैं। इनमें काला काला जीरा, बारीक सुनाकठी, लाल लुसुरी, काली कलाबती, बारीक मच्छकांता, लाल जुईगुड़ा और कटिया जैसी किस्में शामिल हैं। सुगंधित कर्पूर क्रांति भी इस संग्रह का हिस्सा है।

बीज बैंक में केवल धान ही नहीं, बल्कि लाल भिंडी, तुरई, खीरा, टमाटर, करेला और लोबिया जैसी सब्जियों के देशी बीज भी संरक्षित किए जाते हैं। इसका उद्देश्य खेती में फसलों की विविधता बनाए रखना और किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बीज उपलब्ध कराना है।

पिता ने भी बदली थी खेती की पद्धति

सुरथा के दिवंगत पिता बनेश्वर किसान करीब पांच एकड़ जमीन पर नीलमणि, भोस्का और बांसभोट्टा जैसी देशी धान की किस्में उगाते थे। हालांकि, वर्ष 1995 में अधिक उत्पादन पाने की उम्मीद में उन्होंने स्वर्णा और प्रतीक्षा जैसी अधिक उपज देने वाली किस्मों की खेती शुरू कर दी।

इस बारिश पर निर्भर क्षेत्र में अधिक उपज वाली किस्मों से प्रति एकड़ करीब 12 से 14 क्विंटल धान उत्पादन होता है, जबकि देशी किस्मों से लगभग 8 से 10 क्विंटल उपज मिलती है। हालांकि, खेती का परिणाम मौसम, मिट्टी, पानी और इस्तेमाल की गई किस्म पर भी निर्भर करता है।

देशी बीजों की खेती से लागत घटाने की कोशिश

वर्ष 2012 में DBSM से जुड़ने के बाद सुरथा ने प्राकृतिक खेती के तरीकों को समझना शुरू किया। उन्हें महसूस हुआ कि अधिक उपज वाली किस्मों की खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च उनकी खेती की लागत बढ़ा रहा था।

इसके बाद उन्होंने देशी धान की किस्मों और प्राकृतिक खेती पर अधिक ध्यान देना शुरू किया। वर्तमान में वह करीब पांच एकड़ जमीन पर देशी धान और लगभग 25 डिसमिल जमीन पर सब्जियों की खेती करते हैं।

सुरथा के अनुसार, पहले अधिक उपज वाली धान की खेती में उन्हें प्रति एकड़ सालाना करीब 6,000 से 8,000 रुपये खर्च करने पड़ते थे। देशी किस्मों की खेती में यह खर्च घटकर लगभग 3,000 से 4,000 रुपये प्रति एकड़ रह गया है।

कई पारंपरिक किस्में स्थानीय मौसम और खेती की परिस्थितियों के अनुकूल हो सकती हैं। कुछ किस्मों में सूखा सहने या कुछ कीटों के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोध की क्षमता भी होती है। हालांकि, ये गुण सभी किस्मों में समान नहीं होते और उनका प्रदर्शन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।

गांव के दूसरे किसान भी अपनाने लगे देशी किस्में

सुरथा केवल अपने खेतों में ही देशी बीजों का संरक्षण नहीं कर रहे, बल्कि दूसरे किसानों को भी प्राकृतिक खेती के तरीके अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उनके गांव में अब करीब 25 एकड़ जमीन पर देशी धान और लगभग पांच एकड़ में सब्जियों की खेती की जा रही है।

देशी बीजों को बचाने के प्रयासों के लिए उन्हें विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और मीडिया संस्थानों से सम्मान मिला है। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी भी उन्हें सम्मानित कर चुके हैं।

DBSM के संयोजक सरोज कुमार महंती के मुताबिक, संगठन ने सुरथा को प्राकृतिक खेती की दिशा में प्रशिक्षित किया। वर्ष 2013-14 के दौरान पद्मश्री प्रोफेसर राधामोहन, महाराष्ट्र के पद्मश्री सुभाष पालेकर और कृषि विशेषज्ञ नटबर सारंगी से मिली प्रेरणा ने भी उन्हें देशी किस्मों की खेती और बीज बैंक स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया।

कृषि विज्ञान केंद्र से सीखे बीज संरक्षण के तरीके

सुंदरगढ़ जिले के किरेई स्थित कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और DBSM की ओर से आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी सुरथा ने हिस्सा लिया। मृदा विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. मनोज कुमार जेना के अनुसार, उन्हें बीज उपचार, मिट्टी में पोषक तत्वों का आकलन, बीज संरक्षण, मल्चिंग और वर्मी-कम्पोस्ट तैयार करने जैसे विषयों पर प्रशिक्षण दिया गया।

उन्होंने बीजामृत और जीवामृत जैसे जैविक खेती में इस्तेमाल होने वाले घोल तैयार करने और उनका उपयोग करने की जानकारी हासिल की। इसके साथ ही नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, अग्निअस्त्र और दशपर्णी जैसे पारंपरिक जैव-कीट नियंत्रण उपायों के बारे में भी सीखा।

बीज बैंक से किसानों को मिलता है बीज, फसल के बाद लौटाना होता है ज्यादा

सुरथा का बीज बैंक आसपास के किसानों को देशी बीज उपलब्ध कराने के लिए एक खास व्यवस्था अपनाता है। किसान यहां से बीज उधार ले सकते हैं और फसल कटाई के बाद तय मात्रा से अधिक बीज वापस करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई किसान 10 किलोग्राम बीज लेता है, तो उसे फसल कटने के बाद 15 किलोग्राम बीज लौटाना होता है।

इस व्यवस्था से बीज बैंक का भंडार बनाए रखने और दूसरे किसानों तक बीज पहुंचाने में मदद मिलती है। बीज बैंक दूर-दराज के किसानों को बीज बेचता भी है। रिपोर्ट के अनुसार, कुसुमकली और मच्छकांता जैसी धान की किस्मों के बीज क्रमशः 30 रुपये और 40 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचे जाते हैं। संस्थानों या सरकारी परियोजनाओं के तहत होने वाली खरीद में कीमत अलग हो सकती है।

यदि बीज बैंक में किसी खास किस्म का बीज उपलब्ध नहीं होता, तो सुरथा पश्चिमी ओडिशा के दूसरे बीज बैंकों के साथ बीजों का आदान-प्रदान करते हैं। वह भंडार बनाए रखने के लिए खुद भी अलग-अलग फसलों के बीज उगाते हैं। आधे एकड़ में धान, मोटे अनाज और सब्जियों के बीज तैयार किए जाते हैं, जबकि अधिक मांग वाली मच्छकांता किस्म की खेती करीब डेढ़ एकड़ में की जाती है।

सुरथा किसान की यह पहल दिखाती है कि पारंपरिक बीजों को बचाने के लिए केवल उनका संग्रह करना ही पर्याप्त नहीं है। नियमित खेती, किसानों के बीच बीजों का आदान-प्रदान और पारंपरिक कृषि ज्ञान को आगे बढ़ाना भी जरूरी है। उनकी कोशिश स्थानीय फसल विविधता को सुरक्षित रखने और किसानों को खेती के अधिक विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध प्रकाशित जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें दिए गए आंकड़े, खेती की लागत और बीजों की संख्या संबंधित रिपोर्ट में बताए गए विवरण पर आधारित हैं। वास्तविक परिणाम स्थानीय मिट्टी, मौसम और खेती के तरीकों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

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