
नई दिल्ली: सरकार लंबे समय से गर्भवती महिलाओं को अस्पतालों में प्रसव कराने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, ताकि मां और नवजात शिशु को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल सके। इसके बावजूद ओडिशा और छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी इलाकों में पारंपरिक दाइयों की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। इसकी वजह केवल पुरानी परंपराएं नहीं, बल्कि गरीबी, अस्पतालों से दूरी, परिवहन की कमी और स्थानीय समुदायों का इन दाइयों पर भरोसा भी है।
दो अलग-अलग अध्ययनों से सामने आया है कि आदिवासी क्षेत्रों में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय संस्कृति को समझना, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान बनाना और समुदाय के भरोसेमंद लोगों को स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ना भी जरूरी है।
ओडिशा के गांवों में सामने आई क्या स्थिति?
ओडिशा के कालाहांडी जिले में किए गए एक अध्ययन में आदिवासी महिलाओं की गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद मिलने वाली देखभाल का विश्लेषण किया गया। यह शोध लांजीगढ़ प्रखंड के चार दूरदराज के गांवों में किया गया था।
नवंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच हुए क्षेत्रीय अध्ययन में 17 से 45 वर्ष की 100 महिलाओं के साथ-साथ पारंपरिक दाइयों, स्वास्थ्यकर्मियों और हाल ही में मां बनी महिलाओं से बातचीत की गई।
अध्ययन में सामने आया कि इन इलाकों में घर पर प्रसव की परंपरा अब भी काफी प्रचलित है। शोध में शामिल महिलाओं में 66 प्रतिशत के प्रसव घर पर होने की जानकारी दी गई, जबकि 34 प्रतिशत ने स्वास्थ्य संस्थानों में बच्चे को जन्म दिया था।
ये आंकड़े अध्ययन में शामिल महिलाओं और गांवों की स्थिति बताते हैं। इन्हें पूरे ओडिशा या देश के सभी आदिवासी समुदायों की स्थिति नहीं माना जाना चाहिए।
अस्पताल में प्रसव कराने से क्यों हिचकती हैं महिलाएं?
अध्ययन में अस्पताल में प्रसव कराने के रास्ते में कई सामाजिक और आर्थिक बाधाएं सामने आईं।
- खर्च की चिंता: 68 प्रतिशत महिलाओं ने अस्पताल में प्रसव को महंगा माना।
- घर पर प्रसव की प्राथमिकता: 71 प्रतिशत महिलाओं ने घर पर बच्चे को जन्म देना पसंद किया।
- परिवार का प्रभाव: 60 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उनकी सास ने अस्पताल में प्रसव कराने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया।
- परिवहन की समस्या: 45 प्रतिशत महिलाओं ने आने-जाने के लिए पैसे की कमी बताई।
- स्वास्थ्य केंद्रों से दूरी: 33 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि चिकित्सा सुविधा उनके घर से काफी दूर थी।
- झिझक और असहजता: 30 प्रतिशत महिलाओं ने स्वास्थ्य केंद्र जाने में शर्मिंदगी या झिझक महसूस करने की बात कही।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि संस्थागत प्रसव का निर्णय केवल महिला की पसंद पर निर्भर नहीं करता। परिवार की सोच, आर्थिक स्थिति, दूरी और स्वास्थ्य केंद्रों में मिलने वाली सुविधाएं भी इस फैसले को प्रभावित करती हैं।
गरीबी और शिक्षा की कमी भी बड़ी चुनौती
अध्ययन में शामिल परिवारों की आर्थिक स्थिति भी चिंता का विषय थी। करीब 87 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय 10,000 रुपये से कम बताई गई। महिलाओं में कई दिहाड़ी मजदूरी, खेती और जंगल पर आधारित आजीविका से जुड़ी थीं।
ऐसी स्थिति में गर्भावस्था के दौरान पौष्टिक भोजन, जांच, दवाइयों और अस्पताल तक पहुंचने का खर्च उठाना मुश्किल हो सकता है। रोज कमाकर खाने वाले परिवारों के लिए अस्पताल जाने का मतलब काम और आय का नुकसान भी हो सकता है।
शिक्षा के मामले में भी चुनौतियां सामने आईं। अध्ययन में लगभग एक-तिहाई महिलाएं निरक्षर थीं, जबकि विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाई करने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम थी। इससे गर्भावस्था की नियमित जांच, पोषण और प्रसव संबंधी स्वास्थ्य जानकारी तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।
पारंपरिक दाइयों पर क्यों कायम है भरोसा?
आदिवासी समुदायों में पारंपरिक दाइयां केवल प्रसव में मदद करने वाली महिलाएं नहीं होतीं। कई जगह वे पीढ़ियों से अर्जित अनुभव के आधार पर गर्भवती महिलाओं को भावनात्मक सहारा देती हैं और प्रसव के बाद भी उनकी देखभाल में मदद करती हैं।
उनकी भाषा, स्थानीय रीति-रिवाजों और परिवारों की परिस्थितियों की समझ उन्हें समुदाय के करीब लाती है। दूरदराज के गांवों में, जहां स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना कठिन हो सकता है, यह भरोसा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
पारंपरिक दाइयां स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कुछ औषधीय पौधों और पारंपरिक तरीकों का भी इस्तेमाल करती हैं। हालांकि, किसी पारंपरिक उपाय की सुरक्षा और प्रभावशीलता को चिकित्सकीय प्रमाण के आधार पर परखना जरूरी है।
छत्तीसगढ़ के बैगा समुदाय में भी सामने आई ऐसी तस्वीर
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में शामिल बैगा समुदाय पर 2024 में एक अलग अध्ययन किया गया था। इसमें चार पारंपरिक दाइयों, एक सरकारी मितानिन और 10 आदिवासी महिलाओं के अनुभव दर्ज किए गए।
इस अध्ययन में बताया गया कि पारंपरिक दाइयां गर्भावस्था से लेकर प्रसव और प्रसव के बाद की देखभाल तक महिलाओं का साथ देती हैं। उनका ज्ञान औपचारिक चिकित्सा शिक्षा के बजाय पीढ़ियों से परिवारों और समुदायों में मिले अनुभवों पर आधारित होता है।
शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि पारंपरिक दाइयों की संख्या, उनके कार्यक्षेत्र और उनके योगदान का व्यवस्थित राष्ट्रीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इससे स्वास्थ्य नीतियां बनाते समय उनकी वास्तविक भूमिका को समझना मुश्किल हो सकता है।
पारंपरिक दाइयों की अपनी सीमाएं भी हैं
पारंपरिक दाइयों पर समुदाय का भरोसा महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके अनुभव को प्रशिक्षित चिकित्सकीय देखभाल का विकल्प नहीं माना जा सकता।
प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, बच्चे की असामान्य स्थिति या अन्य गंभीर जटिलताएं मां और नवजात दोनों के लिए जानलेवा हो सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों, आवश्यक उपकरणों और समय पर अस्पताल पहुंचने की जरूरत होती है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि कुछ पारंपरिक दाइयां जटिल मामलों में महिलाओं को अस्पताल ले जाने में मदद करती हैं। कई स्थितियों में वे गर्भवती महिला के साथ जाकर उसे भावनात्मक सहारा भी देती हैं, जबकि चिकित्सा संबंधी जिम्मेदारी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी संभालते हैं।
क्या पारंपरिक दाइयों को सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है?
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि पारंपरिक दाइयों को पूरी तरह अलग करने के बजाय उन्हें सुरक्षित मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों से जोड़ा जा सकता है। इसके लिए उन्हें खतरे के संकेत पहचानने, गर्भवती महिलाओं को समय पर जांच के लिए प्रोत्साहित करने और जरूरत पड़ने पर अस्पताल भेजने के बारे में प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
इसके साथ ही कुछ जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं:
- दूरदराज के गांवों के लिए बेहतर परिवहन और आपातकालीन सहायता उपलब्ध कराना।
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रशिक्षित कर्मचारियों और जरूरी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाना।
- पारंपरिक दाइयों और सरकारी स्वास्थ्यकर्मियों के बीच सहयोग बढ़ाना।
- गर्भवती महिलाओं को जांच, पोषण और प्रसव के विकल्पों की सही जानकारी देना।
जननी सुरक्षा योजना और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम जैसी सरकारी पहल संस्थागत प्रसव तथा मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से चलाई जाती हैं। लेकिन इन योजनाओं का लाभ दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय समस्याओं का समाधान भी जरूरी है।
आदिवासी महिलाओं के लिए सुरक्षित प्रसव कैसे सुनिश्चित हो?
ओडिशा और छत्तीसगढ़ के इन अध्ययनों का मुख्य संदेश यह है कि मातृ स्वास्थ्य में सुधार के लिए आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और सामुदायिक भरोसे के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।
पारंपरिक दाइयों का स्थानीय ज्ञान और भावनात्मक सहयोग उपयोगी हो सकता है, लेकिन सुरक्षित प्रसव के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं तक समय पर पहुंच सुनिश्चित करना बेहद महत्वपूर्ण है।
जब तक गरीबी, दूरी, परिवहन की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर झिझक जैसी बाधाएं दूर नहीं होतीं, तब तक केवल अस्पताल में प्रसव कराने की अपील से अपेक्षित बदलाव लाना मुश्किल हो सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध शोध-विवरणों पर आधारित है। इसमें दिए गए प्रतिशत संबंधित अध्ययनों के नमूनों से जुड़े हैं और इन्हें सभी आदिवासी समुदायों पर लागू नहीं माना जाना चाहिए। गर्भावस्था और प्रसव संबंधी निर्णय योग्य स्वास्थ्यकर्मी की सलाह के अनुसार लेने चाहिए।



