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प्रेस की आजादी में कौन सा देश: दुनिया में नंबर-1? भारत की रैंकिंग जानकर होगी हैरानी, पाकिस्तान से भी पीछे.

प्रेस की आजादी में कौन सा देश: दुनिया में नंबर-1? भारत की रैंकिंग जानकर होगी हैरानी, पाकिस्तान से भी पीछे.

प्रेस की स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र का अहम हिस्सा है। पत्रकारों को बिना दबाव के खबरें सामने रखने और सरकार से सवाल पूछने की आजादी होनी चाहिए, ताकि आम लोगों तक सही जानकारी पहुंच सके। लेकिन दुनिया के अलग-अलग देशों में पत्रकारिता की स्वतंत्रता की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ देशों में मीडिया को काम करने की ज्यादा आजादी मिलती है, जबकि कुछ जगहों पर पत्रकारों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

दिल्ली में एक राजनीतिक प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और पुलिस कार्रवाई को लेकर उठे सवालों के बीच प्रेस की स्वतंत्रता पर भी चर्चा तेज हुई है। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में दुनिया के कौन से देश शीर्ष पर हैं और भारत की स्थिति क्या है।

प्रेस फ्रीडम में दुनिया में कौन सा देश नंबर-1?

रिपोर्ट में दिए गए 2026 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक के आंकड़ों के अनुसार, नॉर्वे को पहला स्थान दिया गया है। नीदरलैंड्स दूसरे, एस्टोनिया तीसरे, डेनमार्क चौथे और स्वीडन पांचवें स्थान पर बताए गए हैं। ये देश पत्रकारिता की स्वतंत्रता के मामले में बेहतर प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल हैं।

सूचकांक के निचले पायदान पर इरिट्रिया का नाम है, जिसे 180वां स्थान दिया गया है। इस तरह रैंकिंग में सबसे ऊपर और सबसे नीचे मौजूद देशों के बीच मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर बड़ा अंतर दिखाई देता है।

<WritingBlock id=”81643″ variant=”document”>## वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत किस स्थान पर है?

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) की 2026 की विश्व प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में भारत को 180 देशों में 157वां स्थान मिला है। वर्ष 2025 में भारत 151वें स्थान पर था। यानी एक साल में भारत की रैंकिंग छह पायदान नीचे आई है।

रिपोर्ट में भारत की स्थिति को प्रेस स्वतंत्रता के लिहाज से ‘बहुत गंभीर’ (Very Serious) श्रेणी में रखा गया है। यह रैंकिंग पत्रकारों के काम करने की परिस्थितियों, मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारिता से जुड़े राजनीतिक, आर्थिक, कानूनी, सामाजिक तथा सुरक्षा संबंधी पहलुओं के आकलन पर आधारित है।

पाकिस्तान और चीन से भारत की तुलना

2026 के सूचकांक में भारत अपने कई पड़ोसी देशों से नीचे है। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, इन देशों की स्थिति इस प्रकार है:

  • नेपाल: 87वां स्थान
  • श्रीलंका: 134वां स्थान
  • बांग्लादेश: 152वां स्थान
  • पाकिस्तान: 153वां स्थान
  • भारत: 157वां स्थान
  • रूस: 172वां स्थान
  • चीन: 178वां स्थान
  • इरिट्रिया: 180वां स्थान

इन आंकड़ों के मुताबिक, प्रेस स्वतंत्रता के मामले में भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह रैंकिंग पत्रकारिता की स्वतंत्रता से जुड़ी परिस्थितियों का तुलनात्मक आकलन है, न कि किसी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के हर पहलू का पूरा मूल्यांकन।

भारत की रैंकिंग में गिरावट के पीछे क्या कारण बताए गए?

RSF की रिपोर्ट में भारत में पत्रकारों के सामने मौजूद कई चुनौतियों का उल्लेख किया गया है। इनमें पत्रकारों के खिलाफ हिंसा, मीडिया संस्थानों के स्वामित्व का कुछ समूहों में केंद्रित होना और राजनीतिक दबाव से जुड़ी चिंताएं शामिल हैं।

रिपोर्ट में कानूनी प्रावधानों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कानूनों और अन्य कानूनी कार्रवाइयों के कारण स्वतंत्र पत्रकारों तथा मीडिया संस्थानों पर दबाव पड़ने की आशंका जताई गई है।

हालांकि, भारत की रैंकिंग को केवल एक कारण से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। सूचकांक में राजनीतिक, आर्थिक, कानूनी, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी कई मानकों का आकलन किया जाता है।

क्या पूरी दुनिया में प्रेस की स्वतंत्रता घट रही है?

रिपोर्ट के अनुसार, प्रेस स्वतंत्रता से जुड़ी चुनौतियां केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। दुनिया के कई देशों में पत्रकारों को कानूनी दबाव, आर्थिक मुश्किलों, राजनीतिक हस्तक्षेप और सुरक्षा संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।

अमेरिका भी 2026 के सूचकांक में सात पायदान नीचे खिसककर 64वें स्थान पर पहुंच गया। वहीं, रूस 172वें और चीन 178वें स्थान पर रहा। रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर पत्रकारिता की परिस्थितियों में गिरावट को लेकर चिंता जताई गई है।

प्रेस की आजादी लोकतंत्र के लिए क्यों जरूरी है?

स्वतंत्र मीडिया जनता तक जानकारी पहुंचाने, सत्ता और संस्थानों से जवाबदेही मांगने तथा महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्वजनिक चर्चा को मजबूत करने में भूमिका निभाता है। पत्रकारों को बिना अनुचित दबाव या डर के काम करने का अवसर मिलना जरूरी है।

दिल्ली में प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार की घटना भी इसी व्यापक बहस से जुड़ती है। हालांकि, किसी विशेष घटना में क्या हुआ, इसकी पुष्टि संबंधित पक्षों के बयान, उपलब्ध साक्ष्यों और स्वतंत्र जांच के आधार पर की जानी चाहिए।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों और 2026 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में प्रकाशित आंकड़ों पर आधारित है। दिल्ली में पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

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