अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार का ऐलान हो गया है. साल 2026 का इकोनॉमी का पुरस्कार अमेरिका के अर्थशास्त्रियों रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड को मिला है. इन दोनों को महंगाई और मंदी के कारणों को बताने और उनसे निपटने के लिए नीतियां बनाने वाले मॉडल के लिए यह सम्मान मिला है. इनकी रिसर्च बताती है कि दुनिया में महंगाई को रोकना मुश्किल क्यों होता है और जब किसी देश में मंदी की स्थिति बनती है, इकोनॉमी कमजोर होती है तो लोगों की नौकरियां क्यों जाती हैं या जॉब क्यों घटने लगती है.

ई. हॉल और वुडफोर्ड ने जो मैक्रोइकॉनॉमिक स्टेबलाइजेशन के लिए मेथेड दिया है, उसमें यह बताया गया है कि देश में खर्च और कंपनियों के फैसले कैसे इकोनॉमी को प्रभावित करते हैं. साथ ही जब देश में संकट की घड़ी आती है. इकोनॉमी क्राइसिस होता है तो बैंकों और सरकारों को क्या कदम उठाने चाहिए, उसके बारे में भी बताया गया है.
महंगाई को काबू करना मुश्किल क्यों होता है?
जब महंगाई बढ़ती है तो इसके पीछे कई सारे कारण होते हैं. कंपनियों के फैसले और भविष्य को लेकर उनकी सोच भी कीमतों पर असर डालती है. अगर कंपनियों को लगता है कि आने वाले समय में कच्चे माल, ऊर्जा और दूसरी चीजों की लागत बढ़ेगी, तो वे पहले ही अपने प्रोडेक्ट महंगे कर देती हैं. वहीं, बाजार में मांग घटने के बाद भी कंपनियां तुरंत कीमतें कम नहीं करतीं, क्योंकि बारबार दाम बदलने में समय और पैसा लगता है. अर्थशास्त्री माइकल वुडफोर्ड के मॉडल से यह समझने में मदद मिलती है कि कंपनियों के फैसले और उनकी भविष्य की उम्मीदें महंगाई को कैसे प्रभावित करती हैं. इससे केंद्रीय बैंक यह आकलन कर सकते हैं कि ब्याज दरों में बदलाव का कीमतों पर क्या असर होगा.
आर्थिक मंदी में नौकरियां क्यों कम होने लगती हैं?
दोनों अर्थशास्त्रियों की रिसर्च का दूसरा बड़ा एरिया मंदी के समय नौकियों की स्थिति का विश्लेषण करना भी है. आर्थिक मंदी के दौरान लोग खर्च घटाने लगते हैं, जिससे बाजार में सामान और सेवाओं की मांग कम हो जाती है. इसका असर कंपनियों के कारोबार पर पड़ता है और वे उत्पादन घटाने के साथ नई भर्तियां भी रोक सकती हैं. कई बार कर्मचारियों की छंटनी तक करनी पड़ती है.
अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स ने बताया था कि मांग में कमी आने पर सरकार खर्च बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकती है. इससे कारोबार और रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है. वहीं, रॉबर्ट हॉल के शोध से यह समझने में मदद मिली कि परिवार अपनी मौजूदा कमाई के साथ भविष्य की आमदनी को ध्यान में रखकर खर्च तय करते हैं. अगर लोगों को लगता है कि आगे उनकी कमाई कम हो सकती है, तो वे अभी से खर्च घटा देते हैं. जब बड़ी संख्या में परिवार ऐसा करते हैं, तो पूरी अर्थव्यवस्था में मांग कमजोर पड़ सकती है.
अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार बाकी पुरस्कारों से अलग क्यों है?
अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार अल्फ्रेड नोबेल की मूल वसीयत का हिस्सा नहीं था. इसकी शुरुआत 1968 में स्वीडन के केंद्रीय बैंक ने की थी. इसका आधिकारिक नाम अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में आर्थिक विज्ञान में स्वेरिग्स रिक्सबैंक पुरस्कार है. यह सम्मान ऐसे शोध के लिए दिया जाता है, जो अर्थव्यवस्था को समझने और उससे जुड़े फैसले लेने के तरीकों में अहम योगदान देता है. पुरस्कार के लिए शोध की उपयोगिता और आर्थिक सोच पर उसके प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाता है. यही वजह है कि अर्थशास्त्र का यह पुरस्कार मूल नोबेल पुरस्कारों से अलग होने के बावजूद दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित अकादमिक सम्मानों में शामिल है.
महंगाई बढ़ने के कारण क्या होते हैं?
जब भी ग्लोबल लेबल पर महंगाई बढ़ती है, तब उसका असर दुनिया के सभी देशों पर देखने को मिलता है. किसी देश पर ज्यादा तो कोई इसकी जद में कम आता है. मिसाल के तौर पर अभी के ग्लोबल सेनारियों को ध्यान में रखते हुए देखें तो यह समझ आता है कि कैसे रूसयूक्रेन युद्ध और उसके बाद ईरान, अमेरिका और इजराइल की जंग ने ग्लोबल इकोनॉमी को डेंट किया. क्रूड ऑयल के दाम 120 डॉलर बैरल के पार चले गए, जिससे भारत समेत पूरी दुनिया में तेल के दाम बढ़े और महंगाई पर भी असर हुआ.
महंगाई बढ़ने के 5 प्रमुख कारण हैं
- मांग बढ़ना: जब बाजार में सामान और सेवाओं की मांग बढ़ जाती है, लेकिन सप्लाई उतनी नहीं बढ़ती, तो कीमतें बढ़ने लगती हैं.
- उत्पादन लागत बढ़ना: कच्चे माल, बिजली, ईंधन, मजदूरी और परिवहन का खर्च बढ़ने पर कंपनियां अपने उत्पाद महंगे कर सकती हैं.
- सप्लाई में कमी: सूखा, बाढ़, युद्ध या सप्लाई चेन में रुकावट के कारण सामान की उपलब्धता घट सकती है. इससे खासकर खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं.
- कंपनियों के फैसले और भविष्य की उम्मीदें: अगर कंपनियों को लगता है कि आगे लागत बढ़ेगी, तो वे पहले ही कीमतें बढ़ा सकती हैं. कई बार मांग घटने के बावजूद कीमतें तुरंत कम नहीं होतीं.
- आयात महंगा होना: अगर रुपये के मुकाबले डॉलर मजबूत होता है, तो कच्चा तेल और विदेश से आने वाली दूसरी चीजें भारत के लिए महंगी हो सकती हैं. इससे घरेलू बाजार में भी कीमतें बढ़ सकती हैं.



