संसद में संख्याबल नहीं है, तो क्या सड़क से सत्ता बदलने का सपना देखा जाए? पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का गुस्सा था. शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग थी. अब मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे से लेकर रिजीम चेंज तक की बात है. नेहा बोरा को बांग्लादेश के छात्र रास्ता दिखाते हैं. प्रशांत भूषण सत्ता परिवर्तन की बात करते हैं. विपक्ष भी आंदोलन के साथ है. लेकिन सवाल है, छात्रों के भविष्य से शुरू हुई लड़ाई अब किसके एजेंडे पर आगे बढ़ रही है? और क्या सड़क का आंदोलन उस सत्ता परिवर्तन का विकल्प बन सकता है, जिसका फैसला लोकतंत्र में चुनाव से होता है?

छात्रों के भविष्य से जुड़ा पेपर लीक का सवाल मामूली नहीं है. भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठे. युवाओं का भविष्य अनिश्चित हो और मेहनत के बाद भी चयन की गारंटी न रहे, तो आक्रोश स्वाभाविक है. लेकिन अब लड़ाई का केंद्र बदलता दिखाई दे रहा है. चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग सामने है.
इन सवालों पर विपक्ष को सरकार से जवाब मांगने का अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं भी पहुंची हैं. लेकिन जब आंदोलन के मंच से रिजीम चेंज की बात होती है. तो उसका राजनीतिक अर्थ भी स्पष्ट होना चाहिए. नेहा बोरा का बांग्लादेश के युवाओं को रास्ता दिखाने वाला बयान और प्रशांत भूषण का सत्ता परिवर्तन का समर्थन महज अलगअलग टिप्पणियां नहीं हैं. इन्हें एक साथ रखने पर आंदोलन की दिशा का सवाल उठता है.
नई दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की तस्वीर.
सिर्फ संवैधानिक रास्ते से सत्ता परिवर्तन संभव
बांग्लादेश में 2024 का छात्र आंदोलन नौकरी में आरक्षण के सवाल से शुरू हुआ था. वह व्यापक राजनीतिक संघर्ष में बदला और शेख हसीना की सरकार के पतन तक पहुंचा. लेकिन भारत का संवैधानिक ढांचा अलग है. यहां सरकार की आलोचना, इस्तीफे की मांग और आंदोलन नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार हैं. लेकिन सरकार बदलने का संवैधानिक रास्ता संसद में सरकार का बहुमत खोना या चुनाव में जनादेश हासिल करना है. किसी सरकार को हटाने की राजनीतिक मांग और चुनाव से इतर सत्ता परिवर्तन की अवधारणा के बीच का फर्क भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है.
विपक्ष संसद और सड़क दोनों जगह सत्ता खिलाफ लड़ाई जारी रख सकता है. लेकिन उसका प्रभावी मंच संसद है. संसद में क्या चल रहा है? पिछले कई सत्रों से वहां नारेबाजी, बहिर्गमन और कार्यवाही बाधित होने के दृश्य आम रहे हैं. विपक्ष का आरोप है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचती है.
बांग्लादेश में भी GenZ ने प्रदर्शन किया था.
सरकार का कहना है कि विपक्ष सदन चलने नहीं देता. इस टकराव में संसदीय बहसें सिकुड़ती है. सवाल यह है कि क्या लगातार बहिष्कार से विपक्ष सरकार को घेरने के अवसर गंवाता है? सत्ता पक्ष के पास संख्याबल है. विपक्ष की ताकत उसके तथ्य, तर्क और जनता तक पहुंचने की क्षमता है. सदन से बाहर रहकर वह इस ताकत का कितना इस्तेमाल कर पाता है? संसद और सड़क एकदूसरे के विरोधी नहीं हैं. सड़क पर उठे सवाल संसद में पहुंचने चाहिए और संसद में उठे सवाल जनता के बीच. लेकिन जब सदन में राजनीतिक संघर्ष कमजोर पड़ता है, तब सड़क के आंदोलन से हासिल की उम्मीद बढ़ने लगती है. क्या मौजूदा आंदोलन भी इसी कोशिश का हिस्सा है?
1977 का परिवर्तन, सिर्फ आंदोलन वजह नहीं
1974 का गुजरात और बिहार छात्र आंदोलन याद आता है. महंगाई, भ्रष्टाचार और शासन से असंतोष ने छात्रों को सड़कों पर उतारा. बाद में जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व संभाला. संपूर्ण क्रांति का नारा दिया. इस आंदोलन ने विपक्षी दलों को एक मंच पर आने और 1977 में राजनीतिक बदलाव की जमीन तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. लेकिन उस दौर को केवल छात्र आक्रोश से नहीं समझा जा सकता.
1975 में आपातकाल की घोषणा. विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां. नागरिक अधिकारों का निलंबन. प्रशासनपुलिस की ज्यादतियों ने उस दौर की राजनीति पर गहरा असर डाला था. 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली से चुनाव अवैध ठहराया था. इस फैसले से राजनीतिक संकट गहरा गया. 25 जून को आपातकाल घोषित हुआ. आज की परिस्थिति उस दौर से अलग है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई अदालती मामला या फैसला नहीं है. उनकी सरकार की नीतियों की आलोचना और विरोध का अधिकार अपनी जगह है. लेकिन सरकार बदलने का जनादेश चुनाव और संवैधानिक प्रक्रिया से ही प्राप्त किया जा सकता है.
अन्ना आंदोलन की तस्वीर. फाइल फोटाे
अन्ना आंदोलन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बनाया
2011 का अन्ना आंदोलन भी मौजूदा घटनाक्रम को समझने की एक कड़ी है. टूजी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों ने तत्कालीन यूपीए सरकार को घेर रखा था. अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन ने देशव्यापी ध्यान खींचा. जंतरमंतर से रामलीला मैदान तक जुटी भीड़ ने इसे राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का बड़ा मुद्दा बना दिया. जन लोकपाल की मांग से शुरू हुआ आंदोलन धीरेधीरे सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने लगा. लेकिन अन्ना आंदोलन ने तत्काल सत्ता नहीं बदली. उसने राजनीतिक माहौल बनाया.
भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश को व्यापक अभिव्यक्ति दी. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय के पीछे अनेक कारण थे. उसे केवल अन्ना आंदोलन का परिणाम नहीं कहा जा सकता. टूजी और कॉमनवेल्थ से जुड़े मामलों ने सरकार को खासा बदनाम किया. बात दीगर है कि ये मामले अदालत में नहीं टिके. लेकिन अन्ना आंदोलन ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को चुनावी राजनीति के केंद्र में लाने और तत्कालीन सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ाने में भूमिका निभाई. आंदोलन की राजनीतिक परिणति और उसके मूल नेतृत्व की मंशा एक ही बात नहीं थीं. आंदोलन ने माहौल बनाया, राजनीतिक लाभ दूसरे पक्ष को मिला.
सोशल मीडिया पर धूम, लेकिन जनाधार कहां?
आज के आंदोलन में भी इसी तरह के सवाल उठ रहे हैं. काकरोच जनता पार्टी ऑनलाइन व्यंग्यात्मक अभियान से उभरी और पेपर लीक के खिलाफ युवाओं की लामबंदी का चेहरा बनी. आंदोलन के साथ वामपंथी छात्र संगठनों की सक्रियता भी बढ़ी है. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन यानी AISA, एसएफआई और दूसरे छात्र संगठन आंदोलन का अनुभव और संगठनात्मक ढांचा लेकर आते हैं. लेकिन इनसे जुड़े कम्युनिस्ट दलों का चुनावी जनाधार मामूली है.
सोशल मीडिया पर लोकप्रियता और व्यापक जनाधार अलगअलग चीजें हैं. आंदोलन की अगुवाई करने वाले चेहरे कम समय में चर्चा में आ सकते हैं. लेकिन चर्चा को देशव्यापी जनसमर्थन में बदलना अलग चुनौती है. काकरोच जनता पार्टी की फंडिंग पर भी सवाल उठे हैं. संगठन अपने मंच पर खुद को संस्थापक टीम से वित्तपोषित बताता है और पारदर्शी राजस्व मॉडल विकसित करने की बात करता है. दूसरी ओर सार्वजनिक रूप से फंडिंग को लेकर आरोप और सवाल सामने आए हैं.
Its a long night. But India will emerge victorious. Jai Hind! https://t.co/wxRApSzlOZ
— Cockroach Janta Party – CJP October 16, 2026
चुनावी पारदर्शिता को मुद्दा बनाने वाले आंदोलन के लिए अपने वित्तीय स्रोतों में पारदर्शिता भी महत्वपूर्ण है. आंदोलन का भौगोलिक विस्तार भी एक कसौटी है. मुंबई में प्रदर्शन हुआ. बेंगलुरु और पटना में भी विरोध की खबरें आईं. लेकिन कुछ बड़े शहरों में प्रदर्शन को देशव्यापी जनआंदोलन नहीं माना जा सकता. क्या दिल्ली के बाहर युवाओं को बड़े पैमाने पर आंदोलन से जोड़ा जा सका है? क्या पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं के सवालों से जुड़े युवा अब मतदाता सूची, मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और सत्ता परिवर्तन की मांगों से भी खुद को जोड़ रहे हैं? क्या वे अपने आंदोलन में विपक्षी राजनीतिक दलों की सीधी भागीदारी को स्वीकार करते हैं? इन सवालों के जवाब आंदोलन के भविष्य की दिशा तय करेंगे.
सुप्रीम कोर्ट में घटनाक्रम ने भी नया मोड़ लिया है. 15 अक्टूबर को अदालत ने SIR से संबंधित याचिकाओं पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा. साथ ही एक याचिकाकर्ता के आचरण पर भी जवाब लेने की बात कही. 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में तिरंगे के साथ प्रदर्शन के विरोध में व्यापारियों का सड़क पर उतरना एक दूसरा पहलू सामने लाता है. आंदोलन का जनजीवन पर असर पड़ता है. व्यापार प्रभावित होता है. आवागमन बाधित होता है. ऐसे में किसी आंदोलन के मुकाबिल विरोध की आवाजें उसके विस्तार के लिए चुनौती खड़ी करती हैं.
2029 का लोकसभा चुनाव अभी दूर है. उससे पहले 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सामने है. चूंकि रिज़ीम चेंज के नाम पर आंदोलन राजनीतिक रास्ते पर है. इसलिए उसके हासिल का पहला हिसाब संसद में सबसे ज्यादा 80 सीटें भेजने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में होगा. केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों की सत्ता भाजपा के पास है. राहुल गांधी इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं. क्या वे उत्तर प्रदेश में भाजपा को सत्ता से बेदखल कर पाएंगे? प्रदेश में कांग्रेस पार्टी काफी कमजोर हालत में है. उसकी उम्मीदें समाजवादी पार्टी से गठबंधन पर टिकी हैं. अकेले न सही! मजबूत सहयोगी के भरोसे अगर वे उत्तर प्रदेश में कोई करिश्मा दिखा सके, तो इसे आंदोलन की कुछ राजनीतिक उपलब्धि मान सकेंगे.



