समाजवादी पार्टी के गढ़ माने जाने वाले कन्नौज में इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल के PDA सम्मेलन में खाली कुर्सियां और उसके बाद जिला कार्यकारिणी भंग किए जाने के घटनाक्रम ने संगठन की अंदरूनी स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. फिलहाल, कन्नौज में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले टिकट की दावेदारी, गुटबाजी और नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई पार्टी के लिए चुनौती बनती जा रही है.

बीते शनिवार को प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल, अखिलेश यादव के संसदीय क्षेत्र कन्नौज में सम्मेलन करने पहुंचे थे. कार्यकर्ताओं ने उनका जोरदार स्वागत किया, लेकिन सम्मेलन के दौरान मंच भरा होने के बावजूद सामने की कई कुर्सियां खाली नजर आईं. इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष ने मामले की जानकारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को दी. बाद में कन्नौज की जिला कार्यकारिणी भंग कर दी गई. इसके साथ ही नेताओं को लखनऊ तलब भी किया गया है.
सदर सीट पर पुराने और नए चेहरों के बीच मुकाबले की चर्चा
सबसे ज्यादा खींचतान कन्नौज सदर सीट पर है. 2022 में भाजपा के असीम अरुण ने सपा के तत्कालीन विधायक अनिल दोहरे को हराया था. तीन बार विधायक रह चुके अनिल दोहरे का बीते साल निधन हो गया था. अब उनकी राजनीतिक विरासत बेटे यश दोहरे संभाल रहे हैं. हालांकि, संगठन में उनकी स्वीकार्यता और पहचान को लेकर चुनौतियों की चर्चा है. वहीं, पुराने सपा नेता कल्याण सिंह भी इस सीट से अपनी दावेदारी कर रहे हैं. यहां पार्टी कई धड़ों में बंटी हुई है.
तिर्वा में कई दावेदार, टिकट को लेकर असमंजस
तिर्वा क्षेत्र में भी सपा के भीतर कई दावेदारों के नाम चर्चा में हैं. पूर्व विधायक विजय बहादुर पाल के निधन के बाद 2022 में उनके बेटे अनिल पाल को टिकट मिला था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. अब हुकुम सिंह यादव और अखिलेश यादव के करीबी माने जाने वाले कुक्कू चौहान सहित अन्य नेताओं की दावेदारी की चर्चा है. एक सीट पर कई नेताओं की दावेदारी से कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस की स्थिति बन सकती है.
छिबरामऊ में पुरानी खींचतान फिर चर्चा में
छिबरामऊ विधानसभा क्षेत्र में भी सपा के भीतर लंबे समय से गुटबाजी की चर्चा होती रही है. पार्टी ने पिछले चुनावों में अरविंद यादव को उम्मीदवार बनाया, जबकि मुस्लिम नेता ताहिर हुसैन सिद्दीकी भी टिकट की उम्मीद लगाए रहे. 2022 में टिकट नहीं मिलने के बाद उनकी नाराजगी और बगावती तेवर चर्चा में आए थे. अब आगामी चुनाव को लेकर एक बार फिर दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक समीकरणों की चर्चा तेज है.
कन्नौज में सपा के भीतर सब ठीक नहीं?
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जब भी कन्नौज में कार्यकर्ताओं के बीच पहुंचते हैं, तो एकजुटता का संदेश देते हैं, लेकिन कन्नौज में गुटबाजी चरम पर है. कन्नौज की राजनीति में एक समय नवाब सिंह यादव का खास प्रभाव माना जाता था. उनके जेल जाने के बाद जिले में सपा का सियासी समीकरण बदल गया है. पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं की कार्यशैली और छोटे कार्यकर्ताओं को मिलने वाली तवज्जो को लेकर असंतोष की बातें सामने आ रही हैं.
छोटे कार्यकर्ताओं की अनदेखी का आरोप
सूत्रों के मुताबिक, विजय तिवारी उर्फ बउवन तिवारी और हसीब हसन की कार्यशैली को लेकर कुछ कार्यकर्ताओं में नाराजगी है. आरोप है कि पार्टी के छोटे कार्यकर्ताओं की शिकायतें और समस्याएं संगठन के वरिष्ठ नेतृत्व तक नहीं पहुंच पातीं. सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि जयकुमार तिवारी की सक्रियता और हसीब हसन की भूमिका को लेकर संगठन के भीतर असंतोष है. कुछ कार्यकर्ताओं का मानना है कि स्थानीय स्तर पर नेताओं के बीच सीमित दायरे में फैसले होने से पार्टी के व्यापक संगठन को नुकसान पहुंच सकता है.
कार्यकर्ताओं के अपमान की शिकायत
स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि जब समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता कन्नौज पहुंचते हैं, तो कुछ छोटे कार्यकर्ताओं को अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता. कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि उनकी बातों को नजरअंदाज किया जाता है और कई बार उन्हें अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ता है. कुछ कार्यकर्ताओं को लगता है कि संगठन में सभी वर्गों को समान अवसर और सम्मान नहीं मिल रहा है.
अखिलेश यादव के गढ़ में संगठन के सामने बड़ी चुनौती
कन्नौज कभी समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता था. 1998 से लेकर 2024 तक हुए 9 लोकसभा चुनाव के दौरान सपा 8 बार जीती है. अखिलेश यादव यहां से चौथी बार सांसद हैं. इसके बावजूद पिछले विधानसभा चुनाव में सपा यहां की तीनों सीट हार गई थी. इससे पहले 2017 में सपा सिर्फ कन्नौज सदर की सीट जीतने में कामयाब हुई थी. दोनों विधानसभा चुनाव में हार के पीछे गुटबाजी वजह बताई जा रही है. अब देखना होगा कि अखिलेश इस बार गुटबाजी रोक पाते हैं या नहीं?



