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​आंदोलन के सुपरहिट चेहरे वोटों की लड़ाई में कहां तक पहुंचे? नेहा वोरा की पॉपुलैरिटी से उठा सवाल

आंदोलन की ताकत भीड़ और उसके तेवर से आंकी जाती है. दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसान हों. भ्रष्टाचार के खिलाफ जंतरमंतर पर जुटे लोग. आरक्षण की मांग पर सड़कों पर उतरे नौजवान. भीड़ ने सरकारों को चुनौती दी. कुछ फैसले बदले. कुछ चेहरों को राष्ट्रीय पहचान मिली. अखबारों में तस्वीरें छपीं. टीवी की बहसों में जगह मिली. सोशल मीडिया में चर्चा के केंद्र बने. लेकिन आंदोलन की तपिश उतरने के बाद एक सवाल सामने आया? जो चेहरा लाखों लोगों की आवाज बन गया था, वह चुनावों में कितना कमाल दिखा पाया? इन दिनों नेहा बोरा काफी चर्चित हैं. राहुल गांधी उन्हें काफी तरजीह देते दिख रहे हैं. कन्हैया कुमार को भी याद कर सकते हैं. एक समय वे भी मीडिया की सुर्खियों में थे. लेकिन दो चुनाव लड़ने के बाद भी वे संसद तक नहीं पहुंच सके.

भारतीय राजनीति में ऐसे चेहरों की लंबी सूची है, जो किसी आंदोलन से निकले. रातोंरात राष्ट्रीय पहचान बनी. सरकारों को चुनौती दी. फिर चुनावी राजनीति में उतरे. कुछ मुख्यमंत्री बने, कुछ सांसद. कुछ ने अपनी पार्टी बनाई. कुछ स्थापित दलों में चले गए. कुछ की पहचान आंदोलन तक सिमट गई. आंदोलन की लोकप्रियता और चुनावी ताकत के बीच का फासला भारतीय राजनीति की दिलचस्प कहानी है. पढ़िए ऐसे ही कुछ चर्चित नामों का सफ़र.

जेपी आंदोलन: एक पीढ़ीअलग राजनीतिक रास्ते

1974 का बिहार आंदोलन इस कहानी का महत्वपूर्ण अध्याय है. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार और सत्ता के तौरतरीकों के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन देशव्यापी राजनीतिक चुनौती बन गया. आपातकाल आया. गिरफ्तारियां हुईं. 1977 में चुनाव हुए. आंदोलन से निकली एक पीढ़ी ने संसद और विधानसभाओं का रास्ता पकड़ा. लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी इसी पीढ़ी के प्रमुख चेहरे थे.

लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार.

रामविलास पासवान भी इसी दौर की आंदोलनकारी राजनीति से राष्ट्रीय स्तर पर उभरे. छात्र राजनीति और आंदोलन के दिनों में बने रिश्ते आगे चलकर अलगअलग दलों और विचारधाराओं में बंट गए. लालू प्रसाद यादव ने 1977 में छपरा से लोकसभा चुनाव जीता. बाद में बिहार के मुख्यमंत्री बने. राष्ट्रीय जनता दल बनाया. सामाजिक न्याय की राजनीति के जरिए उन्होंने अपना बड़ा चुनावी आधार तैयार किया. सत्ता से बाहर रहने पर भी बिहार की राजनीति में उनका अलग मुकाम है.

रामविलास पासवान.

नीतीश कुमार ने 1985 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीता. फिर लोकसभा पहुंचे. केंद्र में मंत्री बने. 2005 में बिहार की सत्ता में उनकी वापसी हुई. इसके बाद राज्य की राजनीति में उनकी केंद्रीय भूमिका बनी रही. भाजपा और राजद, दोनों के साथ गठबंधन की सरकारों का नेतृत्व किया. एक ही आंदोलन की राजनीतिक विरासत से निकले लालू और नीतीश आगे चलकर एकदूसरे के प्रतिद्वंद्वी बने. सुशील कुमार मोदी ने भाजपा की राजनीति में अपनी जगह बनाई. लालू के शासनकाल में विपक्ष के प्रमुख चेहरों में रहे. बाद में नीतीश कुमार के साथ उपमुख्यमंत्री बने.

रामविलास पासवान ने दलित राजनीति के स्वतंत्र आधार पर अपनी पहचान बनाई. 1977 में हाजीपुर से लोकसभा चुनाव जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे. बाद में लोक जनशक्ति पार्टी बनाई. केंद्र की अलगअलग सरकारों में मंत्री रहे.

जेपी आंदोलन ने इन नेताओं को एक साझा राजनीतिक अनुभव दिया था. लेकिन आगे का रास्ता किसी एक आंदोलन ने तय नहीं किया. लालू ने अपना दल बनाया. नीतीश ने गठबंधन की राजनीति की. सुशील मोदी भाजपा के संगठन और सरकार में आगे बढ़े. पासवान ने अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार की.

शरद जोशी.

दत्ता सामंत और शरद जोशी संसद में पहुंचे

1982 की मुंबई कपड़ा मिल हड़ताल ने दत्ता सामंत को देश के सबसे चर्चित मजदूर नेताओं में शामिल कर दिया. बड़ी संख्या में मिल मजदूर उनके नेतृत्व में हड़ताल पर गए. संघर्ष लंबा चला. मुंबई के कपड़ा उद्योग पर इसका गहरा असर पड़ा. हड़ताल अपने प्रमुख उद्देश्यों को हासिल नहीं कर सकी. उद्योग का संकट गहराता गया. दत्ता सामंत ने चुनावी राजनीति में भी प्रवेश किया.

1984 में दक्षिणमध्य मुंबई से निर्दलीय सांसद चुने गए. मजदूरों के बीच उनकी पकड़ चुनावी जीत में बदली. लेकिन इस ताकत को स्थायी राजनीतिक संगठन में बदलना आसान नहीं रहा. बदलते औद्योगिक हालात ने उनके आंदोलन और मजदूरों पर उनकी पकड़ को कमजोर किया. बेशक आंदोलन की पहचान ने उन्हें संसद तक पहुंचा दिया लेकिन उसके प्रभाव की सीमाएं थीं.

महाराष्ट्र के किसान नेता शरद जोशी ने शेतकरी संघटन के जरिए कृषि उत्पादों के उचित मूल्य और किसानों की आर्थिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी. उन्होंने किसान संगठन को चुनावी राजनीति में उतारने की कोशिश की. 2004 में महाराष्ट्र से राज्यसभा पहुंचे. लेकिन संगठन को राजनीतिक ताकत में नहीं बदल सके. बेशक कृषि बाजार, कीमतों और किसान की आय पर उनकी बहसें लंबे समय तक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रही.

अन्ना आंदोलन: एक मंच, अलगअलग मंजिलें

2011 का भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन भी इसी तरह का मोड़ था. अन्ना हजारे के अनशन और जन लोकपाल की मांग ने देशभर में राजनीतिक माहौल बनाया. अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और किरण बेदी जैसे चेहरे राष्ट्रीय चर्चा में आए. केजरीवाल ने 2012 में आम आदमी पार्टी बनाई.

अरविंद केजरीवाल

2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 70 में से 28 सीटें जीतीं. 2015 में 67 सीटों के साथ सरकार बनाई. 2020 में भी 62 सीटें मिलीं. आंदोलन से निकली राजनीतिक ताकत ने दिल्ली में लगातार तीन विधानसभा चुनावों में अपनी जगह बनाए रखी. लेकिन 2025 में आम आदमी पार्टी 22 सीटों पर सिमट गई. केजरीवाल अपनी नई दिल्ली सीट भी हार गए. पार्टी ने सत्ता गंवा दी. आंदोलन से निकले नेता की राजनीतिक यात्रा में सत्ता तक पहुंचने और फिर चुनाव हारने, दोनों के अध्याय दर्ज हुए.

कई अन्य राज्यों में केजरीवाल ने अपनी पार्टी के विस्तार की कोशिश की. पंजाब में सफलता मिली. वहां उनकी पार्टी की सरकार है. अन्ना हजारे ने खुद चुनावी राजनीति का रास्ता नहीं चुना. उनके आंदोलन से जुड़े योगेंद्र यादव ने स्वराज अभियान और स्वराज इंडिया के जरिए वैकल्पिक राजनीति की कोशिश की. आजकल राहुल गांधी के इर्द गिर्द हैं. प्रशांत भूषण को केजरीवाल ने पार्टी से बाहर कर दिया. किरण बेदी बाद में भाजपा में शामिल हुईं. दिल्ली के मुख्यमंत्री की दौड़ में असफल रहीं. बाद में पुडुचेरी की उपराज्यपाल बनीं. एक ही आंदोलन के मंच पर साथ दिखे चेहरों की मंजिलें अलगअलग रहीं.

हार्दिक पटेल.

गुजरात: हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर

गुजरात में 2015 का पाटीदार आरक्षण आंदोलन हार्दिक पटेल के राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ बना. आंदोलन के दौरान उन्हें व्यापक पहचान मिली. 2017 के विधानसभा चुनाव के समय उनका कांग्रेस से जुड़ाव चर्चा में रहा. बाद में वह कांग्रेस में शामिल हुए. फिर भाजपा में चले गए. 2022 में भाजपा के टिकट पर विरमगाम से विधायक चुने गए.

अल्पेश ठाकोर ने ओबीसी समुदाय के मुद्दों और सामाजिक लामबंदी से पहचान बनाई. 2017 में कांग्रेस के टिकट पर राधनपुर से विधायक बने. बाद में भाजपा में शामिल हुए. 2022 में गांधीनगर दक्षिण से चुनाव जीता. दोनों ने आंदोलन से मिली पहचान को चुनावी राजनीति में बदला. लेकिन उनकी सफलता अपने बूते मुमकिन नहीं हुई. स्थापित राजनीतिक दलों का सहारा लेना पड़ा. दलित अधिकारों की राजनीति से उभरे जिग्नेश मेवाणी ने 2017 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में वडगाम से विधानसभा चुनाव जीता. 2022 में फिर इसी सीट से जीते. उन्होंने आंदोलन से मिली पहचान को विधानसभा की राजनीति में बदला.

कन्हैया कुमार.

कन्हैया कुमार: दो चुनाव, दो हार

जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार 2016 में विश्वविद्यालय से जुड़े विवाद के बाद राष्ट्रीय सुर्खियों में आए. उनके भाषण और राजनीतिक विचार छात्र राजनीति के दायरे से बाहर पहुंचे. 2019 में सीपीआई ने उन्हें बेगूसराय से लोकसभा चुनाव लड़ाया. उन्हें 2,69,976 वोट मिले.

भाजपा के गिरिराज सिंह 6,92,193 वोट लेकर जीते. वोट की राजनीति में कन्हैया कुमार को सीपीआई से उम्मीद नहीं दिखी. 2021 में कांग्रेस में शामिल हो गए. 2023 में उन्हें कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI का प्रभारी बनाया गया. 2024 में कांग्रेस ने उन्हें उत्तरपूर्वी दिल्ली से टिकट दिया. इस बार उन्हें 6,85,673 वोट मिले. लेकिन भाजपा के मनोज तिवारी के 8,24,451 वोटों ने उनका रास्ता रोक दिया. स्थापित दलों के झंडे तले भी दो चुनावों में कन्हैया कुमार की हार से साफ है कि आंदोलन से मिली व्यापक पहचान, वोट की राजनीति में कामयाबी की गारंटी नहीं है.

किसान आंदोलन: कानून वापस, लेकिन वोट कहां गए?

202021 का किसान आंदोलन केंद्र सरकार के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभरा. दिल्ली की सीमाओं पर महीनों तक किसान डटे रहे. तीन कृषि कानूनों की वापसी प्रमुख मांग थी. नवंबर 2021 में केंद्र सरकार ने कानून वापस लेने की घोषणा की.

भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे. उनके भाषणों और किसान महापंचायतों को व्यापक मीडिया कवरेज मिली. पिता महेंद्र सिंह टिकैत की बड़ी विरासत भी उनके पास है. किसान नेता की बड़ी पहचान के साथ 2007 में खतौली से वे भारतीय किसान दल के टिकट पर चुनाव लड़े.

राकेश टिकैत.

कांग्रेस का भी समर्थन था. सिर्फ 9,095 वोट मिले. 2014 के लोकसभा चुनाव में अमरोहा से राष्ट्रीय लोक दल के उम्मीदवार के तौर पर 9,539 वोट मिले और एक बार फिर जमानत जब्त हो गई. हरियाणा के किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने किसान आंदोलन की कामयाबी को वोटों में भुनाना चाहा. संयुक्त संघर्ष पार्टी बनाई. 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में पेहोवा से उम्मीदवार बने. उन्हें सिर्फ 1,170 वोट मिले और जमानत जब्त हो गई.

This was genuinely so heartwarming to see.

Neha Bora was one of the main faces of the protests and was present on both days, yet she stood behind the politicians out of respect. And Rahul Gandhi made sure to call her to the front, giving her the recognition she deserved. ​आंदोलन के सुपरहिट चेहरे वोटों की लड़ाई में कहां तक पहुंचे? नेहा वोरा की पॉपुलैरिटी से उठा सवाल🩹 https://t.co/GqYT2fzwLV

— U’ October 13, 2026

आंदोलन का चेहरा, चुनावी राजनीति में सफलता की गारंटी नहीं

आंदोलनों के जरिए चर्चित चेहरों के आगे के सफ़र और उनके हासिल की कहानियां अलगअलग हैं. कुछ की अलग पहचान स्थापित दलों का हिस्सा बन कहीं खो गई. कुछ पहचान बनाए रखने की जद्दोजहद में किनारे लग गए. लालू और नीतीश जैसे अलग पार्टियां बना अपना महत्व बनाए रखने में सफल रहे.

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज केजरीवाल जब राजनीति में उतरे तो परंपरागत राजनीति में कामयाबी के लिए जरूरी नुस्खे अपनाने में उन्होंने परहेज नहीं किया. एक बात साफ है. आंदोलन के दौरान के नारेआदर्श और चुनावी राजनीति दो जुदा चीजें हैं. आंदोलन का चेहरा बने लोग जब चुनाव के मैदान में उतरते हैं, तो स्थानीय समीकरण, सोशल इंजीनियरिंग और प्रतिद्वंदी पार्टी का वोट बैंक उनकी शोहरत पर आमतौर पर भारी पड़ते हैं.

कामयाब वही रहे जिन्होंने वक्त रहते नब्ज़ को परखा और उसके अनुकूल खुद को ढाल लिया. आंदोलनों में मीडिया में सुर्खियां बटोर चुके चेहरे, इसी मजबूरी में स्थापित दलों का पल्लू थामने के लिए मजबूर होते हैं.

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