भारत में चीनी स्मार्टफोन ब्रांड्स की पकड़ कमजोर हो रही है. वहीं, मेमोरी चिप की बढ़ती कीमतों के कारण बजट फोन को मुनाफे के साथ बेचना मुश्किल होता जा रहा है. उनके पीछे हटने से लावा और आई+ जैसी भारतीय कंपनियों के लिए एक मौका बन गया है. इन कंपनियों का कुल मार्केट शेयर पिछले आठ सालों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है.

कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री की नई कंपनियां भी 15,000 रुपए से कम कीमत वाले सेगमेंट पर नजर गड़ाए हुए हैं. हालांकि, यह मौका ऐसे समय में मिला है जब मार्केट सिकुड़ रहा है, ग्राहक खरीदारी टाल रहे हैं, और पहले से मौजूद बड़ी कंपनियों के पास टेक्नोलॉजी और डिस्ट्रीब्यूशन के मामले में बहुत बड़ा फायदा है. भारत की घरेलू स्मार्टफोन कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि क्या कम कीमत वाला यह मौका आगे चलकर एक स्थाई प्रतिस्पर्धी फायदा बन पाएगा?
मार्केट के निचले हिस्से में एक बड़ा अवसर
ईटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, रिसर्च फर्म ‘ओम्डिया’ का कहना है कि जुलाईसितंबर तिमाही में भारत की स्मार्टफोन शिपमेंट में चीनी ब्रांड्स की हिस्सेदारी 6768% रही. ओम्डिया के मुताबिक, यह हिस्सेदारी 68% थी, जो पिछली तिमाही में 71% और एक साल पहले 75% थी. काउंटरपॉइंट के अनुमान के अनुसार यह आंकड़ा 67% है, जो 2019 की पहली तिमाही के बाद से सबसे कम है.
इसकी मुख्य वजह मेमोरी चिप की कीमतों में भारी उछाल है. एक बजट स्मार्टफोन की कुल लागत में मेमोरी कंपोनेंट्स का हिस्सा लगभग 40 फीसदी तक हो सकता है, जिससे कंपनियों के पास लागत बढ़ने पर उसे खुद सहने की बहुत कम गुंजाइश बचती है. चीनी कंपनियों ने भारत में अपना कारोबार किफायती डिवाइस और अच्छे स्पेसिफिकेशन्स के दम पर खड़ा किया था, इसलिए वे इस स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं.
वीवो , ओप्पो और शाओमी जैसी कंपनियों ने कॉस्ट को कंट्रोल करने के लिए अपने एंट्रीलेवल मॉडल्स कम कर दिए हैं, सस्ते प्राइस बैंड में डिवाइस की संख्या घटा दी है, और स्पेसिफिकेशन्स में भी कटौती की है. वे अब मिडरेंज और प्रीमियम हैंडसेट्स पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, जहां मुनाफा बेहतर होता है. ऐसे में, कम बजट वाले ग्राहकों के पास अब चुनने के लिए बहुत कम अच्छे विकल्प बचे हैं, जबकि वे वैसे भी ज्यादा खर्च करने से कतरा रहे हैं.
भारतीय ब्रांड्स अपनी प्रोडक्ट लाइनअप को बंद करने के बजाय, इस खाली जगह को भरने की कोशिश कर रहे हैं. काउंटरपॉइंट के अनुमान के अनुसार, सितंबर तिमाही में इनका संयुक्त मार्केट शेयर बढ़कर 7% हो गया, जो एक साल पहले 2% था. यह दिसंबर 2018 की तिमाही के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. काउंटरपॉइंट के रिसर्च डायरेक्टर तरुण पाठक के मुताबिक, भारतीय ब्रांडों के कुल योगदान में लावा और एआई+ की हिस्सेदारी लगभग 95% रही.
यह बढ़त काफी अहम है, लेकिन इसे सही संदर्भ में समझने की जरूरत है. इस तिमाही में भारत में स्मार्टफोन की शिपमेंट सालाना आधार पर 2026% गिरकर 35.8 मिलियन यूनिट रह गई, जो पिछले एक दशक का सबसे निचला स्तर है. बढ़ती लागत के कारण ग्राहकों ने अपने फोन अपग्रेड करने का फैसला टाल दिया. इसलिए, भारतीय ब्रांडों का मार्केट शेयर तो बढ़ रहा है, लेकिन यह एक सुस्त बाजार में हो रहा है. ऐसा नहीं है कि बाजार में खर्च करने की कोई बड़ी लहर चल रही है.
Ai+ और लावा बाजार को परख रहे हैं
जुलाई 2025 में लॉन्च हुआ Ai+, सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाली कंपनियों में से एक बनकर उभरा है. कंपनी के फाउंडर और चीफ एग्जीक्यूटिव माधव सेठ ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि कंपनी ने मौजूदा तिमाही में उतने ही हैंडसेट बेचे हैं, जितने उसने पिछले पूरे साल में बेचे थे. इनके डिवाइस की कीमत 10,000 रुपए से 25,000 रुपए के बीच है. ओम्डिया के ताजा अनुमानों के मुताबिक, सितंबर तिमाही में शिपमेंट में सालदरसाल चार गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है.
वहीं, लावा सिर्फ कम कीमत के भरोसे रहने के बजाय, किफायती दाम पर मुकाबला करने की कोशिश कर रही है. कंपनी का एंट्रीलेवल 5G स्मार्टफोन, जिसकी शुरुआती कीमत 7,999 रुपए थी, अब कंपोनेंट की लागत बढ़ने के कारण 14,499 रुपए का हो गया है. कंपनी का कहना है कि वह कॉस्ट को कंट्रोल करने के लिए कंपोनेंट के चुनाव में सुधार कर रही है, सॉफ्टवेयर को बेहतर बना रही है और रणनीतिक तरीके से सोर्सिंग कर रही है. कंपनी ने बताया है कि चालू वित्त वर्ष में उसकी बिक्री दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है.
कीमतों में यह बढ़ोतरी घरेलू ब्रांडों के सामने आ रही चुनौतियों को दिखाती है. मेमोरी की कॉस्ट बढ़ना अपने आप में कोई फायदा नहीं है. यह मौका तभी बन सकता है, जब भारतीय कंपनियां कीमत, परफॉरमेंस और भरोसेमंदता के बीच एक सही संतुलन बनाए रखें, जबकि बड़ी प्रतिस्पर्धी कंपनियां पीछे हट रही हों.
अन्य कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां भी इसी रणनीति को आजमाने की तैयारी कर रही हैं. सितंबर तिमाही में, Mivi और Boltt ने फ्लिपकार्ट के जरिए 15,000 रुपए से कम कीमत वाले स्मार्टफोन सेगमेंट में कदम रखा है. Noise और boAt भी इस बाजार में उतरने पर विचार कर रही हैं, जबकि Karbonn त्योहारी सीजन में फिर से वापसी की योजना बना रही है और Micromax भी स्मार्टफोन बाजार में लौटने पर विचार कर रही है. इन कदमों से कस्टमर्स के पास चुनने के लिए ज्यादा विकल्प हो सकते हैं, हालांकि अभी चल रही चर्चाओं और योजनाओं को पूरी तरह से स्थापित कारोबार नहीं मान लेना चाहिए.
यह अवसर पिछली बार से अलग क्यों है?
2015 के आसपास, भारतीय ब्रांड्स का घरेलू हैंडसेट बाजार में लगभग 35% हिस्सा था, जिसमें माइक्रोमैक्स, लावा, इंटेक्स और कार्बन जैसी कंपनियां सैमसंग को टक्कर दे रही थीं. बाद में इनके पिछड़ने का कारण केवल चीनी कंपनियों की बहुत आक्रामक प्राइस पॉलिसी नहीं थी.
शाओमी, वीवो, ओप्पो और रियलमी ने बड़े पैमाने पर खरीद, तेजी से नए उत्पाद लॉन्च करने, भारी मार्केटिंग और व्यापक रिटेल डिस्ट्रीब्यूशन का सहारा लिया. उन्होंने ग्राहकों को उनके पैसे के बदले मिलने वाले हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में लगातार सुधार किया. भारतीय कंपनियां उत्पाद विकास की इस रफ्तार के साथ कदम मिलाने में संघर्ष करती रहीं. साथ ही, वे इतना बड़ा पैमाना भी नहीं बना पाईं जिससे रिसर्च और डेवलपमेंट की कॉस्ट को लाखों डिवाइसों में बांटा जा सके. 2020 के दशक की शुरुआत तक, इन भारतीय कंपनियों का कुल बाजार हिस्सा गिरकर 1 फीसदी से भी कम हो गया.
तब से हालात बदल गए हैं. भारत अब मोबाइल फोन निर्माण के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र बन गया है, जहां घरेलू उत्पादन से स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय, दोनों तरह के ब्रांडों की जरूरतें पूरी हो रही हैं. 201415 में मोबाइल फोन का उत्पादन 18,000 करोड़ रुपए का था, जो 202526 में बढ़कर 6.27 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया. इसी तरह, एक दशक पहले लगभग 1,500 करोड़ रुपए का निर्यात होता था, जो अब बढ़कर करीब 2.59 लाख करोड़ रुपए हो गया है.
‘प्रोडक्शनलिंक्ड इंसेंटिव’ जैसी योजनाओं की मदद से हुए इस विस्तार ने देश में कई कारखानों, सप्लायर्स और मैन्युफैक्चरिंग विशेषज्ञता को आकर्षित किया है. डिक्सन टेक्नोलॉजीज जैसी कॉन्ट्रैक्ट निर्माता कंपनियां पहले से ही अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के लिए फोन बना रही हैं. यह पूरा इकोसिस्टम भारतीय कंपनियों को एक मजबूत औद्योगिक आधार देता है, जो पिछली कंपनियों के पास नहीं था. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें अपने आप ही बेहतरीन उत्पाद या ग्राहकों की वफादारी मिल जाएगी.
एक ‘इंडियन चैंपियन’ बनाने की कोशिश
अगस्त में घोषित सरकार की 62,500 करोड़ रुपये की ‘मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम’ का मकसद भारत में स्मार्टफोन बनाने और उनके पीछे के ब्रांड व तकनीक के मालिकाना हक के बीच के अंतर को कम करना है.
इस स्कीम के ‘ब्रांडकेंद्रित’ हिस्से के तहत, योग्य भारतीय कंपनियों को अपनी बिक्री पर 5 फीसदी का इंसेंटिव मिल सकता है. इसके अलावा, भारतीय डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए 3 फीसदी का अतिरिक्त इंसेंटिव, और मुख्य पुर्जों व सबअसेंबली की घरेलू सोर्सिंग के लिए 1.5 फीसदी तक का इंसेंटिव दिया जा सकता है. यह प्रोग्राम वित्त वर्ष 202627 से वित्त वर्ष 203031 तक चलेगा.
इसकी पात्रता शर्तें इस तरह बनाई गई हैं कि भारतीय स्वामित्व वाले ब्रांडों को उन कंपनियों से अलग किया जा सके जो केवल स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग करती हैं. योग्य कंपनियों को भारतीय स्वामित्व, मैनेजमेंट कंट्रोल, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी, ट्रेडमार्क, और इनहाउस डिजाइन व R&D क्षमताओं से जुड़ी शर्तों को पूरा करना होगा.
भारत में मैन्युफैक्चरिंग के विस्तार से एपल और सैमसंग जैसे विदेशी ब्रांडों के साथसाथ चीनी स्मार्टफोन निर्माताओं को भी फायदा हुआ है. अब अगली नीतिगत चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि प्रोडक्ट डिजाइन, सॉफ्टवेयर, पेटेंट और ब्रांड के मालिकाना हक से बनने वाली वैल्यू का बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियों को मिले.
लावा इस योजना से फायदा उठाने वाली एक प्रमुख कंपनी हो सकती है. यह कंपनी पिछले कठिन दौर से उबरने में सफल रही है और अब केवल असेंबली से आगे बढ़कर निवेश कर रही है. इसकी योजना अगले पांच वर्षों में डिस्प्ले मॉड्यूल, कैमरा मॉड्यूल, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड और एनक्लोजर के क्षेत्र में लगभग 1,100 करोड़ रुपए निवेश करने की है.
माइक्रोमैक्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, ‘भगवती प्रोडक्ट्स’ भी इस पूरे इकोसिस्टम का हिस्सा बनी हुई है. यह कंपनी ग्रेटर नोएडा में चीनी ओरिजिनल डिजाइन मैन्युफैक्चरर ‘हुआकिन’ के साथ मिलकर नई सुविधाएं स्थापित करने की योजना बना रही है.
ग्राहकों को जीतना कहीं अधिक कठिन
सबसे बड़ा जोखिम यह है कि अभी जो बढ़त मिली है, वह केवल कुछ समय के लिए ही हो. ओम्डिया के अनुमान के अनुसार, छोटे घरेलू ब्रांड हर तिमाही में लगभग 300,000 से 500,000 यूनिट ही बेच पा रहे हैं. इस स्तर से आगे बढ़ने के लिए भरोसेमंद इन्वेंट्री, व्यापक डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, बेहतर रिटेल इकोनॉमिक्स और ऐसी आफ्टरसेल्स सर्विस की जरूरत होगी, जिस पर ग्राहक भरोसा कर सकें.
कई नई कंपनियों द्वारा अपनाई गई ‘ऑनलाइनफर्स्ट’ रणनीति लागत को कम रखने में मदद कर सकती है. लेकिन स्मार्टफोन एक ऐसा उत्पाद है, जिसमें खरीदार इसकी मजबूती, कैमरे की परफॉरमेंस, सॉफ्टवेयर अपडेट और सर्विस की उपलब्धता पर बहुत ध्यान देते हैं. कम कीमत पर शायद ग्राहक पहली बार तो उत्पाद खरीद लें, लेकिन जरूरी नहीं कि वे दोबारा भी इसे ही खरीदें.
इसलिए, इस योजना के तहत मिलने वाले R&D इंसेंटिव, तुरंत मिलने वाली सेल्स सब्सिडी से कहीं अधिक महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. भारतीय ब्रांडों को बेहतर इंडस्ट्रियल डिजाइन, कैमरा प्रोसेसिंग, सॉफ्टवेयर और कंपोनेंट इंटीग्रेशन पर काम करने के साथसाथ क्वालिटी कंट्रोल में भी सुधार करने की जरूरत है. साथ ही, जब ग्लोबल लेवल पर सप्लाई की स्थिति मुश्किल हो जाए, तब भी उन्हें कंपोनेंट्स की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी.
मौका तो है, लेकिन चीनी ब्रांड पूरी तरह से खत्म नहीं होने वाले हैं. उनका मार्केट शेयर कम होने के पीछे कुछ हद तक लागत का अस्थायी दबाव है. अगर मेमोरी की कीमतें कम होती हैं या वे अपनी प्रोडक्ट रणनीति में बदलाव करते हैं, तो वे फिर से अपनी स्थिति मजबूत कर सकते हैं. वहीं, सैमसंग और एपल को अपनी मजबूत प्रीमियम पोजिशनिंग का फायदा मिल रहा है. इससे यह साफ होता है कि एक स्पष्ट प्रोडक्ट प्रपोजिशन के बिना प्रतिस्पर्धा करना कितना मुश्किल है.
भारत ने एक ऐसा मैन्युफैक्चरिंग बेस तैयार कर लिया है, जो किसी घरेलू स्मार्टफोन ब्रांड को बड़ी सफलता दिलाने में मदद कर सकता है. अब अगली चुनौती यह है कि क्या लावा , Ai+ या कोई नई कंपनी इस मौके का फायदा उठाकर ऐसे उत्पाद बना पाएगी, जिन्हें ग्राहक बारबार चुनना चाहें. चीनी कंपनियों के कुछ समय के लिए पीछे हटने से बाजार में जगह तो बन सकती है, लेकिन उस जगह को बनाए रखने के लिए बेहतरीन तकनीक, मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन और ग्राहकों का भरोसा होना बहुत जरूरी है.



