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​अर्नब चक्रवात…तूफान की लोकेशन और रफ्तार का कैसे पता लगाते हैं?

बंगाल की खाड़ी से उठे अर्नब तूफान की रफ्तार बढ़ रही है. बुधवार को यह आंध्र प्रदेश के तट से टकराएगा. इस बीच कई राज्यों में भारी बारिश का रेड अलर्ट भी जारी किया गया है. आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में तेज हवाओं के कारण नुकसान होने की खबरें भी आई हैं. यह 28 अक्टूबर की सुबह आंध्र प्रदेश तट में बापटला और विशाखापत्तनम के बीच, यनम से टकराएगा. अब सवाल उठता है कि समुद्र में सैकड़ों किलोमीटर दूर घूमते तूफान की लोकेशन, रफ्तार और आने का समय पहले कैसे बता दिया जाता है.

​अर्नब चक्रवात…तूफान की लोकेशन और रफ्तार का कैसे पता लगाते हैं?

तूफान की शुरुआती निगरानी अंतरिक्ष से होती है. भारत के पास INSAT3D और INSAT3DR जैसे अपने मौसम उपग्रह हैं और सैटेलाइट डेटा सबसे ज्यादा तब काम आता है जब चक्रवात बनने की शुरुआती अवस्था में होता है. ये उपग्रह लगातार बादलों की तस्वीरें भेजते हैं. इन्हीं तस्वीरों से पता चलता है कि बादलों का गुच्छा कहां घूमना शुरू हुआ है और कितनी तेजी से बन रहा है.

तीव्रता कैसे नापी जाती है?

समुद्र में हवा की रफ्तार नापने के लिए हर जगह मशीनें नहीं लगी होतीं, इसलिए तीव्रता का अनुमान बादलों के पैटर्न से लगाया जाता है. इसके लिए ड्वोरेक तकनीक इस्तेमाल होती है, जिसे वर्नन ड्वोरेक ने सैटेलाइट तस्वीरों से बादलों का आकार पढ़कर विकसित किया था.

आसान भाषा में समझें तो इसमें तूफान वाले बादलों को चार बुनियादी श्रेणियों में बांटा जाता है. मुड़ी हुई पट्टी, शीयर, घना केंद्रीय बादल और आंख. फिर हर पैटर्न को एक अंक यानी Tनंबर दिया जाता है, जो तूफान की ताकत बताता है. Tनंबर जितना ऊंचा, तूफान उतना ताकतवर.

आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में समुद्र की ऊंची लहरें तट से टकराईं. फाेटो:PTI

उत्तर हिंद महासागर के चक्रवातों पर हुए एक अध्ययन के अनुसार एडवांस्ड ड्वोरेक तकनीक तेज तूफानों में अच्छा नतीजा देती है, लेकिन कमजोर तूफानों में तीव्रता को कुछ बढ़ाकर आंक सकती है. इसीलिए अंतिम फैसला सिर्फ एक तरीके पर नहीं छोड़ा जाता, कई अनुमानों को मिलाकर लिया जाता है.

तमिलनाडु के थूथुकुडी में चक्रवात की चेतावनी के बाद मछली पकड़ने वाली नावें एक मछली पकड़ने वाले बंदरगाह पर लंगर डाले खड़ी रहीं. फोटो: PTI

जब तूफान तट के करीब आता है

तट के पास पहुंचते ही जमीन पर लगे डॉप्लर वेदर रडार काम संभाल लेते हैं. इनसे चक्रवात की रेडियल वेलोसिटी, परावर्तन और यहां तक कि बारिश की तीव्रता तक मॉनिटर की जा सकती है. विशाखापत्तनम के लिए यह कहानी खास है. देश का पहला साइक्लोन डिटेक्शन रडार 1970 में विशाखापत्तनम में ही लगा था. वही तट आज अर्नब के लैंडफॉल के संभावित इलाके में है.

IMD की 2014 के हुदहुद तूफान की रिपोर्ट बताती है कि जब सिस्टम डॉप्लर रडार की रेंज में आया, तब सैटेलाइट के साथ रडार और तटीय केंद्रों के आंकड़े भी इस्तेमाल हुए.

तूफान की शुरुआती निगरानी अंतरिक्ष से होती है. फोटो: PTI

कंप्यूटर मॉडल से कैसे रास्ता तय करता है?

रास्ते और लैंडफॉल का पूर्वानुमान संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान मॉडलों से बनता है. इनमें वायुमंडल और समुद्र के ताजा आंकड़े डालकर भौतिकी के समीकरण हल किए जाते हैं. MoES की एक रिपोर्ट के अनुसार IMD का सिस्टम अत्याधुनिक NWP मॉडल, मल्टीमॉडल एनसेंबल, उन्नत डेटा असिमिलेशन और सैटेलाइटरडारबॉय जैसी लगातार निगरानी के साथसाथ अपने डिसीजन सपोर्ट सिस्टम पर टिका है. ये मॉडल IMD के मिहिर और प्रत्यूष हाईपरफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम पर चलते हैं. ट्रैक के पूर्वानुमान की सटीकता में 20 से 25 फीसदी तक सुधार हुआ है.

ओडिशा के पुरी में अलर्ट के तौर पर समुद्र तट पर लाल झंडा लगाया गया. फोटो: PTI

इंसानों की कितनी भूमिका?

मशीनें अकेली फैसला नहीं करतीं. IMD के महानिदेशक के हवाले से कहा गया है कि ‘कोर्स करेक्शन’ में इंसान शामिल रहते हैं. देशभर में 29 फोरकास्टिंग ऑफिस हैं. हर बुलेटिन के पीछे मॉडल के नतीजों और सैटेलाइटरडार विश्लेषण को परखते वाले अनुभवी मौसम वैज्ञानिक होते हैं. MoES की रिपोर्ट के अनुसार, चक्रवात दित्वाह के दौरान अवदाब की स्थिति में हर 6 घंटे और चक्रवात की स्थिति में हर 3 घंटे पर बुलेटिन जारी हुए.

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