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चित्तौड़गढ़​​​ किले का इतिहास, जहां तीन बार हुआ जौहर! जानिए 700 एकड़ में फैले इस विशाल दुर्ग के 15 रोचक तथ्य

चित्तौड़गढ़​​​ किले का इतिहास, जहां तीन बार हुआ जौहर! जानिए 700 एकड़ में फैले इस विशाल दुर्ग के 15 रोचक तथ्य

राजस्थान की धरती पर कई ऐसे ऐतिहासिक किले मौजूद हैं, जिनकी दीवारें आज भी वीरता, संघर्ष और बलिदान की कहानियां सुनाती हैं। इन्हीं में सबसे प्रसिद्ध नाम चित्तौड़गढ़ किले का है। यह किला केवल पत्थरों से बनी एक विशाल इमारत नहीं, बल्कि मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास, राजपूत शौर्य और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है।

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ शहर में स्थित यह विशाल दुर्ग लगभग 700 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। करीब 180 मीटर ऊंची पहाड़ी पर बने इस किले में महल, मंदिर, विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, जलाशय और कई ऐतिहासिक इमारतें मौजूद हैं।

इस किले ने अपने इतिहास में तीन बड़े आक्रमण और तीन जौहर की घटनाएं देखी हैं। रानी पद्मिनी, रानी कर्णावती और अन्य वीरांगनाओं की कहानियां आज भी चित्तौड़गढ़ के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

आइए जानते हैं चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास, यहां हुए तीन बड़े आक्रमण, जौहर की घटनाएं और इस विशाल दुर्ग से जुड़े 15 रोचक तथ्य।

चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास और निर्माण

चित्तौड़गढ़ किले का प्राचीन इतिहास मौर्य या मोरी वंश से जुड़ा माना जाता है। प्रचलित ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, सातवीं शताब्दी में मोरी वंश के शासक चित्रांगद मौर्य ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया था। हालांकि, इसके शुरुआती निर्माण और विकास को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक मान्यताएं भी मिलती हैं।

बाद के समय में यह किला मेवाड़ के शासकों का प्रमुख सत्ता केंद्र बना। 14वीं शताब्दी में सिसोदिया राजपूतों का प्रभाव बढ़ने के बाद चित्तौड़गढ़ ने मेवाड़ की राजधानी के रूप में विशेष पहचान बनाई।

महाराणा कुंभा के शासनकाल (1433 से 1468) में किले का काफी विकास हुआ। इसी दौर में विजय स्तंभ जैसी शानदार ऐतिहासिक इमारत का निर्माण करवाया गया। किले के भीतर मौजूद कई महल और मंदिर भी मेवाड़ की समृद्ध स्थापत्य कला की गवाही देते हैं।

चित्तौड़गढ़ किले पर हुए तीन बड़े आक्रमण

चित्तौड़गढ़ के इतिहास में तीन बड़े आक्रमणों का विशेष उल्लेख मिलता है। इन आक्रमणों ने मेवाड़ की राजनीति और इतिहास को गहराई से प्रभावित किया।

1. अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण (1303)

साल 1303 में दिल्ली सल्तनत के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया था। लंबे संघर्ष के बाद खिलजी की सेना ने किले पर अधिकार कर लिया।

इस युद्ध से जुड़ी सबसे चर्चित कहानी रानी पद्मिनी की है। लोककथाओं और बाद के साहित्यिक वर्णनों के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी रानी पद्मिनी की सुंदरता से प्रभावित था और उन्हें पाने की इच्छा रखता था।

कहानी के अनुसार, रानी पद्मिनी के पति रावल रतन सिंह युद्ध में मारे गए और किले की महिलाओं ने जौहर किया। हालांकि, रानी पद्मिनी से जुड़ी कथा के कई विवरणों को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। इस घटना का लोकप्रिय साहित्यिक वर्णन बाद के समय में मिलता है।

2. बहादुर शाह का आक्रमण (1535)

चित्तौड़गढ़ पर दूसरा बड़ा हमला गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने 1535 में किया था।

उस समय मेवाड़ की जिम्मेदारी रानी कर्णावती के हाथों में थी। बहादुर शाह की सेना ने किले को घेर लिया और भीषण युद्ध शुरू हो गया।

लोकप्रिय ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, रानी कर्णावती ने मुगल शासक हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी थी। लेकिन सहायता पहुंचने से पहले ही परिस्थितियां बेहद गंभीर हो गईं।

आखिरकार किले की महिलाओं ने जौहर किया और राजपूत सैनिकों ने अंतिम समय तक संघर्ष किया। यह घटना चित्तौड़गढ़ के इतिहास में दूसरे बड़े जौहर के रूप में याद की जाती है।

3. अकबर का आक्रमण (1567-1568)

चित्तौड़गढ़ पर तीसरा बड़ा आक्रमण मुगल सम्राट अकबर ने किया था। साल 1567 में मुगल सेना ने किले को घेर लिया। लंबे संघर्ष के बाद फरवरी 1568 में अकबर की सेना ने किले पर अधिकार कर लिया।

उस समय मेवाड़ के शासक महाराणा उदय सिंह थे। उन्होंने किले की रक्षा की जिम्मेदारी जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया जैसे वीर योद्धाओं को सौंपी और स्वयं सुरक्षित स्थान की ओर चले गए।

युद्ध के दौरान जयमल और पत्ता ने अद्भुत साहस दिखाया। दोनों की वीरता की याद में किले में उनके स्मारक भी बनाए गए हैं।

इस आक्रमण के दौरान किले में तीसरे जौहर की घटना का भी उल्लेख मिलता है। लोकपरंपरा में इस जौहर को रानी फूल कंवर से जोड़ा जाता है।

चित्तौड़गढ़ में हुए तीन जौहर की ऐतिहासिक कहानियां

चित्तौड़गढ़ का इतिहास केवल युद्धों और विजय तक सीमित नहीं है। यहां हुए तीन जौहर की घटनाएं भी इसकी ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

1. रानी पद्मिनी का जौहर (1303)

चित्तौड़गढ़ के पहले जौहर की कहानी रानी पद्मिनी से जुड़ी है। प्रचलित कथा के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण और रावल रतन सिंह की मृत्यु के बाद रानी पद्मिनी ने अन्य महिलाओं के साथ जौहर किया था।

इस घटना को राजपूत इतिहास की सबसे चर्चित बलिदान गाथाओं में गिना जाता है। हालांकि, रानी पद्मिनी के जीवन और जौहर से जुड़े कई विवरणों का ऐतिहासिक प्रमाण सीमित है।

2. रानी कर्णावती का जौहर (1535)

दूसरा जौहर गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के समय हुआ था। इस घटना को रानी कर्णावती से जोड़ा जाता है।

किले की स्थिति बेहद गंभीर होने पर महिलाओं ने जौहर किया और राजपूत सैनिकों ने शत्रु सेना का सामना किया। यह घटना मेवाड़ के इतिहास में आज भी याद की जाती है।

3. तीसरा जौहर (1568)

अकबर के आक्रमण के दौरान चित्तौड़गढ़ में तीसरे जौहर का उल्लेख मिलता है। स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा में इस घटना को रानी फूल कंवर मेड़तनी से जोड़ा जाता है।

इस युद्ध में जयमल और पत्ता सहित कई राजपूत योद्धाओं ने किले की रक्षा करते हुए अपने प्राण गंवाए।

चित्तौड़गढ़ किले की प्रमुख ऐतिहासिक इमारतें

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अंदर कई ऐसी इमारतें मौजूद हैं, जो इसकी स्थापत्य कला और गौरवशाली इतिहास को दर्शाती हैं।

1. विजय स्तंभ

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विजय स्तंभ चित्तौड़गढ़ किले की सबसे प्रसिद्ध इमारतों में से एक है। इसका निर्माण महाराणा कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय की स्मृति में करवाया था।

इसका निर्माण लगभग 1440 से 1448 के बीच हुआ माना जाता है। यह नौ मंजिला स्तंभ है और इसकी दीवारों पर देवी-देवताओं, मूर्तियों तथा सुंदर नक्काशी का काम किया गया है।

2. राणा कुंभा महल

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राणा कुंभा महल किले की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संरचनाओं में शामिल है। इसके अवशेषों से उस समय की राजसी वास्तुकला का अंदाजा लगाया जा सकता है।

मान्यता है कि इसी महल परिसर में महाराणा उदय सिंह का जन्म हुआ था। यह महल मीरा बाई और मेवाड़ के राजपरिवार से जुड़ी ऐतिहासिक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है।

3. रानी पद्मिनी महल

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रानी पद्मिनी महल किले के अंदर एक सुंदर जलाशय के बीच स्थित ऐतिहासिक संरचना है। पानी से घिरा होने के कारण इसका दृश्य बेहद आकर्षक दिखाई देता है।

इस महल को रानी पद्मिनी की लोकप्रिय कथा से जोड़ा जाता है। यहां आने वाले पर्यटक इसकी वास्तुकला और आसपास के प्राकृतिक वातावरण को देखने के लिए पहुंचते हैं।

4. कीर्ति स्तंभ

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कीर्ति स्तंभ चित्तौड़गढ़ किले में स्थित एक प्राचीन जैन स्मारक है। यह लगभग 12वीं शताब्दी का माना जाता है और इसका निर्माण जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को समर्पित है।

इसकी दीवारों पर जैन तीर्थंकरों और धार्मिक आकृतियों की सुंदर नक्काशी देखने को मिलती है।

5. गौमुख कुंड

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गौमुख कुंड किले के प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक जलस्रोतों में शामिल है। यहां चट्टान से बनी गाय के मुख जैसी आकृति से लगातार पानी कुंड में गिरता दिखाई देता है।

यह स्थान पर्यटकों और श्रद्धालुओं दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

6. कुंभश्याम मंदिर और मीरा मंदिर

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चित्तौड़गढ़ किले में स्थित कुंभश्याम मंदिर भगवान विष्णु के वराह अवतार को समर्पित है। इसका निर्माण महाराणा कुंभा के शासनकाल में करवाया गया था।

इसके पास ही मीरा मंदिर स्थित है। यह मंदिर भक्त कवयित्री मीराबाई की कृष्ण भक्ति से जुड़ा हुआ है। यहां की स्थापत्य कला और धार्मिक वातावरण इसे खास बनाते हैं।

7. सात प्रवेश द्वार

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चित्तौड़गढ़ किले तक पहुंचने के लिए पहाड़ी पर चढ़ने वाले मार्ग में सात प्रमुख ऐतिहासिक द्वार आते हैं। इनका निर्माण किले की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया गया था।

इन द्वारों के नाम हैं:

  • पाडन पोल
  • भैरव पोल
  • हनुमान पोल
  • गणेश पोल
  • जोड़ला पोल
  • लक्ष्मण पोल
  • राम पोल

इनमें राम पोल किले का प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाता है।

चित्तौड़गढ़ किले के बारे में 15 रोचक तथ्य

1. भारत के विशालतम दुर्गों में शामिल: चित्तौड़गढ़ किला लगभग 700 एकड़ में फैला हुआ है। इसे भारत के सबसे बड़े किला परिसरों में गिना जाता है।

2. यूनेस्को विश्व धरोहर का हिस्सा: साल 2013 में चित्तौड़गढ़ सहित राजस्थान के छह पहाड़ी किलों को UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था।

3. करीब 180 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित: यह विशाल दुर्ग जमीन से लगभग 180 मीटर ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है।

4. 65 से अधिक ऐतिहासिक संरचनाएं: किले में महल, मंदिर, स्मारक, विजय स्तंभ और अन्य ऐतिहासिक इमारतें मौजूद हैं।

5. जल संरक्षण की शानदार व्यवस्था: किले में प्राचीन समय में पानी जमा करने के लिए बड़ी संख्या में तालाब, कुंड और जलाशय बनाए गए थे। ऐतिहासिक दस्तावेजों में यहां 84 जल संरचनाओं का उल्लेख मिलता है।

6. विजय स्तंभ की नौ मंजिलें: महाराणा कुंभा द्वारा बनवाया गया विजय स्तंभ अपनी नौ मंजिला संरचना और बारीक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।

7. मीरा बाई की भक्ति से जुड़ा किला: चित्तौड़गढ़ का मीरा मंदिर भक्त कवयित्री मीराबाई की कृष्ण भक्ति की याद दिलाता है।

8. किले में कई प्राचीन मंदिर: यहां कुंभश्याम मंदिर, कालिका माता मंदिर, समिद्धेश्वर मंदिर और जैन मंदिर जैसे कई धार्मिक स्थल मौजूद हैं।

9. किले का निर्माण कई चरणों में हुआ: चित्तौड़गढ़ दुर्ग किसी एक शासक द्वारा एक ही समय में नहीं बनाया गया था। अलग-अलग शासकों ने सदियों तक इसका विस्तार और विकास करवाया।

10. मिडिल में नहीं, पहाड़ी पर बसा विशाल दुर्ग: यह किला एक लंबी और ऊंची चट्टानी पहाड़ी पर बना है, जिससे इसकी प्राकृतिक सुरक्षा मजबूत होती थी।

11. तीन बड़े ऐतिहासिक आक्रमण: अलाउद्दीन खिलजी, गुजरात के बहादुर शाह और मुगल सम्राट अकबर ने अलग-अलग समय पर इस किले पर आक्रमण किया था।

12. जयमल और पत्ता की वीरता: अकबर के आक्रमण के दौरान जयमल और पत्ता ने किले की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनकी वीरता के प्रतीक स्मारक आज भी मौजूद हैं।

13. किले का संबंध महाभारत की कथा से भी है: एक स्थानीय मान्यता के अनुसार, पांडव भीम ने इस किले का निर्माण किया था। हालांकि, यह धार्मिक लोककथा है, प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं।

14. मौर्य शासक से जुड़ी पहचान: प्रचलित मान्यता के अनुसार, चित्तौड़गढ़ के शुरुआती निर्माण का संबंध चित्रांगद मौर्य से है।

15. सात दरवाजों से होकर पहुंचते हैं मुख्य दुर्ग तक: पहाड़ी पर बने घुमावदार रास्ते में सुरक्षा के लिए कई प्रवेश द्वार बनाए गए थे। इनकी बनावट किले की सैन्य सुरक्षा व्यवस्था को दर्शाती है।

चित्तौड़गढ़ किला क्यों है इतना खास?

चित्तौड़गढ़ किला मेवाड़ की ऐतिहासिक राजधानी और राजपूत स्थापत्य कला का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां मौजूद महल, मंदिर, जलाशय और विजय स्तंभ उस समय की कला, संस्कृति और निर्माण कौशल को दर्शाते हैं।

यह किला केवल युद्धों और जौहर की घटनाओं के लिए ही नहीं, बल्कि मीराबाई की भक्ति, महाराणा कुंभा के कला प्रेम और मेवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाता है।

निष्कर्ष: चित्तौड़गढ़ किला राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की ऐतिहासिक धरोहरों में विशेष स्थान रखता है। इसकी विशालता, स्थापत्य कला और सदियों पुराने इतिहास को करीब से देखने पर पता चलता है कि यह दुर्ग अपने समय में कितना महत्वपूर्ण रहा होगा।

डिस्क्लेमर: इस लेख में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कुछ प्रचलित लोककथाओं और परंपरागत मान्यताओं का भी उल्लेख किया गया है। रानी पद्मिनी और जौहर से जुड़ी कुछ घटनाओं के विवरणों को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं।

— Satya Report

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