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डायबिटीज​​​ शरीर के इन 5 अंगों को पहुंचा सकती है चुपचाप नुकसान, समय रहते कराएं ये जरूरी जांच

डायबिटीज​​​ शरीर के इन 5 अंगों को पहुंचा सकती है चुपचाप नुकसान, समय रहते कराएं ये जरूरी जांच

नई दिल्ली: डायबिटीज यानी शुगर की बीमारी को अक्सर लोग सिर्फ ब्लड शुगर बढ़ने की समस्या समझते हैं, लेकिन लंबे समय तक रक्त में ग्लूकोज का स्तर नियंत्रित न रहने पर इसका असर शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों पर पड़ सकता है। आंखों की रोशनी से लेकर किडनी की कार्यक्षमता और नसों तक को नुकसान पहुंच सकता है। चिंता की बात यह है कि शुरुआती दौर में कई बार इसके स्पष्ट लक्षण भी दिखाई नहीं देते।

अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डायबिटीज एंड डाइजेस्टिव एंड किडनी डिजीज (NIDDK) के मुताबिक, डायबिटीज से आंखों, किडनी और पैरों से जुड़ी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में नियमित जांच और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है।

1. आंखों को पहुंच सकता है नुकसान

लंबे समय तक ब्लड शुगर बढ़ा रहने से आंखों की छोटी रक्त वाहिकाएं प्रभावित हो सकती हैं। इससे डायबिटिक रेटिनोपैथी नाम की समस्या हो सकती है, जिसमें आंखों के पर्दे यानी रेटिना को नुकसान पहुंचता है। समय पर पहचान और उपचार न मिलने पर नजर कमजोर होने या गंभीर स्थिति में आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है।

कौन-सी जांच जरूरी है?

डायबिटीज से पीड़ित लोगों को आंखों की पुतलियां फैलाकर कराई जाने वाली डाइलेटेड आई एग्जामिनेशन जांच करवानी चाहिए। इसमें डॉक्टर रेटिना की स्थिति की जांच करते हैं। टाइप-2 डायबिटीज में आमतौर पर बीमारी का पता चलते ही आंखों की जांच जरूरी होती है।

2. किडनी की कार्यक्षमता हो सकती है प्रभावित

डायबिटीज किडनी की छोटी रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है। इससे किडनी की खून साफ करने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। इस समस्या को डायबिटिक किडनी डिजीज कहा जाता है। शुरुआती अवस्था में इसके लक्षण अक्सर दिखाई नहीं देते, इसलिए नियमित जांच महत्वपूर्ण है।

कौन-सी जांच जरूरी है?

किडनी की सेहत जानने के लिए दो प्रमुख जांच की जाती हैं:

  • यूरिन एल्ब्यूमिन-टू-क्रिएटिनिन रेशियो (UACR): इससे पेशाब में एल्ब्यूमिन नामक प्रोटीन की मात्रा का पता चलता है। इसकी मौजूदगी किडनी को नुकसान पहुंचने का संकेत हो सकती है।
  • सीरम क्रिएटिनिन और eGFR: खून की जांच से क्रिएटिनिन का स्तर पता किया जाता है और eGFR के जरिए किडनी की फिल्टर करने की क्षमता का आकलन होता है।

3. नसों को हो सकता है नुकसान

लंबे समय तक शुगर बढ़ी रहने से नसों को नुकसान पहुंच सकता है। इसे डायबिटिक न्यूरोपैथी कहते हैं। इसमें पैरों और हाथों में झनझनाहट, सुन्नपन, जलन या दर्द महसूस हो सकता है। कुछ लोगों में पैरों की संवेदना इतनी कम हो जाती है कि चोट लगने पर भी पता नहीं चलता।

कौन-सी जांच जरूरी है?

डॉक्टर नसों की कार्यक्षमता जांचने के लिए पैरों में संवेदना, तापमान और कंपन महसूस करने की क्षमता की जांच कर सकते हैं। इसके अलावा 10 ग्राम मोनोफिलामेंट टेस्ट से यह पता लगाया जाता है कि पैरों में दबाव महसूस करने की क्षमता प्रभावित तो नहीं हुई है।

4. दिल और रक्त वाहिकाओं पर पड़ सकता है असर

डायबिटीज के साथ हाई ब्लड प्रेशर और खराब कोलेस्ट्रॉल की समस्या होने पर दिल की बीमारी और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। लंबे समय तक अनियंत्रित ब्लड शुगर रक्त वाहिकाओं को भी नुकसान पहुंचा सकती है।

कौन-सी जांच जरूरी है?

दिल और रक्त वाहिकाओं से जुड़े जोखिम का आकलन करने के लिए ब्लड प्रेशर और लिपिड प्रोफाइल की जांच महत्वपूर्ण है। इसमें कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर देखा जाता है। डॉक्टर जरूरत और लक्षणों के आधार पर ECG या दूसरी जांच की सलाह भी दे सकते हैं।

5. पैरों में घाव और संक्रमण का खतरा

डायबिटीज के कारण नसों को नुकसान और पैरों में रक्त प्रवाह की कमी हो सकती है। ऐसे में छोटी चोट, छाला या घाव भी गंभीर संक्रमण का कारण बन सकता है। कई बार संवेदना कम होने के कारण मरीज को चोट का पता देर से चलता है।

कौन-सी जांच जरूरी है?

डॉक्टर पैरों की त्वचा, नाखून, घाव, सूजन और रक्त प्रवाह की जांच करते हैं। मोनोफिलामेंट टेस्ट से संवेदना की स्थिति भी देखी जाती है। डायबिटीज से पीड़ित लोगों को नियमित रूप से अपने पैरों की जांच करवानी चाहिए।

डायबिटीज में ये जांच भी हैं जरूरी

अंगों को नुकसान पहुंचने के जोखिम के साथ ब्लड शुगर के नियंत्रण पर नजर रखना भी जरूरी है। इसके लिए कुछ जांच महत्वपूर्ण हैं:

  • HbA1c टेस्ट: पिछले करीब 2 से 3 महीनों के औसत ब्लड शुगर स्तर का अनुमान देता है।
  • फास्टिंग ब्लड शुगर: खाली पेट रक्त में ग्लूकोज का स्तर बताता है।
  • लिपिड प्रोफाइल: कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स की स्थिति बताता है।
  • ब्लड प्रेशर: उच्च रक्तचाप की पहचान और निगरानी में मदद करता है।

कितनी बार करानी चाहिए जांच?

जांच की समय-सीमा डायबिटीज के प्रकार, बीमारी कितने समय से है और मरीज की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करती है। टाइप-2 डायबिटीज में आमतौर पर बीमारी का पता चलते ही आंखों और किडनी की जांच शुरू की जाती है। टाइप-1 डायबिटीज में इन जांचों का समय अलग हो सकता है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित फॉलोअप कराना चाहिए।

Satya Report नोट: डायबिटीज का असर हमेशा शुरुआती लक्षणों के रूप में सामने नहीं आता। इसलिए शुगर नियंत्रित होने पर भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार आंखों, किडनी, नसों और पैरों की नियमित जांच करवाते रहें। दवाएं या इंसुलिन अपनी मर्जी से बंद न करें।

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