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सौरभ​​​ हत्याकांड में फांसी की सजा को साहिल-मुस्कान ने दी चुनौती, हाईकोर्ट में गिनाईं 15 कथित कानूनी खामियां; DNA से लेकर सबूतों तक पर उठाए सवाल

सौरभ​​​ हत्याकांड में फांसी की सजा को साहिल-मुस्कान ने दी चुनौती, हाईकोर्ट में गिनाईं 15 कथित कानूनी खामियां; DNA से लेकर सबूतों तक पर उठाए सवाल

मेरठ, उत्तर प्रदेश: चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में मौत की सजा पाए साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तोगी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी है। दोनों की ओर से दाखिल अपील में दोषसिद्धि और फांसी की सजा को गलत बताते हुए जांच प्रक्रिया से लेकर फोरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों तक पर सवाल उठाए गए हैं। अपील में करीब 15 बिंदुओं पर कानूनी खामियां होने का दावा किया गया है।

अपीलकर्ताओं का कहना है कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। उनके अधिवक्ता के मुताबिक, ट्रायल कोर्ट ने ठोस साक्ष्यों के बजाय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और अनुमानों के आधार पर दोषी ठहराया। हालांकि, ये सभी दलीलें फिलहाल अपील में आरोपित की गई हैं, जिन पर हाईकोर्ट को सुनवाई करनी है।

परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल

साहिल और मुस्कान की अपील में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले ‘शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य’ का हवाला दिया गया है। दलील दी गई है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी इतनी मजबूत होनी चाहिए कि आरोपितों की बेगुनाही की कोई दूसरी संभावना न बचे।

अपील में कहा गया है कि अभियोजन की ओर से पेश किए गए साक्ष्य इस कानूनी कसौटी पर खरे नहीं उतरते। दोनों ने जांच की प्रक्रिया और बरामदगी से जुड़े दस्तावेजों पर भी आपत्ति जताई है।

हथियार, सीमेंट और ड्रम की खरीद पर उठाए सवाल

अपीलकर्ताओं ने हथियार, सीमेंट और ड्रम की खरीद से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होने की बात कही है। उनका तर्क है कि इन सामानों की खरीद के समर्थन में न तो सीसीटीवी फुटेज पेश किए गए और न ही बिल उपलब्ध कराए गए।

इसके अलावा एफआईआर में दर्ज समय और तारीख को लेकर विसंगतियों का दावा किया गया है। बरामदगी मेमो पर स्वतंत्र सरकारी गवाहों के हस्ताक्षर और जांच के दौरान वीडियोग्राफी से जुड़े नियमों के पालन पर भी सवाल उठाए गए हैं।

DNA जांच और फोरेंसिक रिपोर्ट पर भी आपत्ति

अपील में फोरेंसिक जांच को लेकर कई गंभीर सवाल रखे गए हैं। साहिल और मुस्कान की ओर से दावा किया गया है कि हथियारों, चादरों, हड्डियों और टिश्यू के नमूनों की डीएनए प्रोफाइलिंग तथा ब्लड ग्रुप का मिलान नहीं कराया गया।

यह भी कहा गया है कि ड्रम से बरामद अवशेषों की पहचान के लिए डीएनए जांच नहीं कराई गई और पोस्टमार्टम के दौरान बिसरा सुरक्षित नहीं रखा गया। इन दलीलों के जरिए अपीलकर्ताओं ने जांच की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं।

इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की वैधानिकता को चुनौती

अपील में कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), मोबाइल टावर लोकेशन और ई-साक्ष्य एप पर अपलोड रिकॉर्डिंग को भी चुनौती दी गई है। अधिवक्ता के मुताबिक, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63(4)(सी) के तहत जरूरी प्रमाणपत्र पेश नहीं किए गए। इसी आधार पर इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया गया है।

फांसी की सजा को भी बताया गलत

साहिल और मुस्कान ने केवल दोषसिद्धि ही नहीं, बल्कि मौत की सजा को भी चुनौती दी है। अपील में कहा गया है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी विरलतम से विरलतम श्रेणी के सिद्धांत के अंतर्गत नहीं आता।

उनकी ओर से दलील दी गई है कि ट्रायल कोर्ट ने अपराध की गंभीरता पर ध्यान दिया, लेकिन सजा तय करते समय कुछ अन्य परिस्थितियों पर पर्याप्त विचार नहीं किया। इनमें दोनों की उम्र, पहले कोई आपराधिक इतिहास नहीं होना, जेल में आचरण और बच्चों के आश्रित होने जैसे बिंदु शामिल हैं।

अब हाईकोर्ट में होगी अपील पर सुनवाई

इस मामले में हाईकोर्ट के सामने अब ट्रायल कोर्ट के फैसले, अभियोजन के साक्ष्यों और बचाव पक्ष की कानूनी दलीलों पर विचार का सवाल है। अपील में लगाए गए आरोपों और आपत्तियों पर अंतिम निर्णय अदालत की सुनवाई के बाद ही होगा। फिलहाल ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई मृत्युदंड की सजा को चुनौती दी गई है।

Satya Report नोट: अपील में बताई गई 15 कथित खामियां साहिल और मुस्कान की ओर से पेश की गई दलीलें हैं। इन्हें अदालत द्वारा स्वीकार किया जाना अभी बाकी है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद ही दोषसिद्धि और सजा को लेकर आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।

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