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मृत्यु​​​ के बाद शव को जमीन पर क्यों लिटाया जाता है? गरुड़ पुराण से जुड़ी हैं ये धार्मिक मान्यताएं

मृत्यु​​​ के बाद शव को जमीन पर क्यों लिटाया जाता है? गरुड़ पुराण से जुड़ी हैं ये धार्मिक मान्यताएं

सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कई संस्कार और परंपराएं निभाई जाती हैं। किसी व्यक्ति के निधन के बाद अंतिम संस्कार से पहले उसके शरीर को स्नान कराया जाता है, नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और फिर कुछ समय के लिए जमीन पर लिटाया जाता है। आमतौर पर लोग इस परंपरा का पालन तो करते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपे धार्मिक और आध्यात्मिक अर्थों के बारे में कम ही जानते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शव को जमीन पर लिटाने की परंपरा का संबंध पंचतत्व, प्रकृति, जीवन की नश्वरता और आत्मा की आगे की यात्रा से जोड़ा जाता है। गरुड़ पुराण में भी मृत्यु, आत्मा की गति और अंतिम संस्कार से संबंधित अनेक मान्यताओं का वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं कि इस परंपरा के पीछे कौन-कौन से धार्मिक कारण बताए जाते हैं।

पंचतत्वों में विलीन होने का प्रतीक है यह परंपरा

सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार, मनुष्य का शरीर पांच महाभूतों से मिलकर बना है। ये पांच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। जीवन समाप्त होने के बाद शरीर का इन्हीं तत्वों में वापस मिलना प्रकृति के चक्र का हिस्सा माना जाता है।

मृत्यु के बाद शव को धरती पर लिटाना इसी प्राकृतिक संबंध का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह शरीर के उस सफर की याद दिलाता है, जिसमें वह प्रकृति से उत्पन्न होकर अंततः उसी में विलीन हो जाता है।

धरती की गोद में लौटने का भाव

मनुष्य अपने पूरे जीवन में पृथ्वी से अन्न, जल और जीवन के लिए जरूरी संसाधन प्राप्त करता है। इसी कारण धरती को मां का स्वरूप भी दिया गया है। मृत्यु के बाद शरीर को जमीन पर रखने की परंपरा को धरती की गोद में लौटने के भाव से जोड़कर देखा जाता है।

यह मान्यता मनुष्य को प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहने का संदेश भी देती है। जीवन में व्यक्ति चाहे कितनी भी उपलब्धियां हासिल कर ले, उसका शरीर अंततः प्रकृति का ही हिस्सा बन जाता है।

अहंकार और घमंड छोड़ने की सीख

मनुष्य जीवनभर धन, संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा जुटाने में लगा रहता है। कई बार इन चीजों के कारण उसके भीतर अहंकार भी पैदा हो जाता है। लेकिन मृत्यु के बाद ये सभी सांसारिक उपलब्धियां यहीं रह जाती हैं।

शव को जमीन पर लिटाने की परंपरा इसी सच्चाई का प्रतीक मानी जाती है। यह याद दिलाती है कि धनवान हो या गरीब, शक्तिशाली हो या सामान्य व्यक्ति, मृत्यु के सामने सभी समान हैं। इसलिए जीवन में अहंकार करने के बजाय विनम्रता, प्रेम और अच्छे व्यवहार को महत्व देना चाहिए।

जीवन की नश्वरता का कराती है एहसास

मृत्यु के बाद शरीर को जमीन पर रखने की रस्म केवल मृत व्यक्ति से जुड़ी परंपरा नहीं है, बल्कि यह परिवार और आसपास मौजूद लोगों को भी जीवन की सच्चाई का एहसास कराती है।

यह संदेश देती है कि संसार में कोई भी चीज स्थायी नहीं है। धन, प्रसिद्धि, पद और सांसारिक रिश्ते एक दिन पीछे छूट जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं में अच्छे कर्म, दया, सेवा और दूसरों के प्रति सद्भाव को मनुष्य के जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियां माना गया है।

आत्मा की नई यात्रा से जुड़ी मान्यता

हिंदू धर्म में मृत्यु को केवल शरीर का अंत माना जाता है, आत्मा का नहीं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा अमर है। मृत्यु के बाद आत्मा अपनी आगे की यात्रा पर निकलती है।

इसी विचार से अंतिम संस्कार की विभिन्न परंपराएं जुड़ी हुई हैं। शव को जमीन पर लिटाना सांसारिक जीवन की समाप्ति और शरीर के प्रकृति को समर्पित करने का प्रतीक माना जाता है।

गरुड़ पुराण में मृत्यु और अंतिम संस्कार का महत्व

गरुड़ पुराण में मृत्यु, आत्मा की गति, कर्मों के फल और अंतिम संस्कार से संबंधित विषयों का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसकी धार्मिक शिक्षाओं में मनुष्य को अच्छे कर्म करने, दूसरों की सहायता करने और जीवन में धर्म तथा सदाचार का पालन करने की प्रेरणा दी गई है।

इस तरह मृत्यु के बाद शव को जमीन पर लिटाने की परंपरा को पंचतत्वों में वापसी, धरती से जुड़ाव, अहंकार के त्याग और जीवन की नश्वरता के प्रतीक के रूप में समझा जाता है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अंतिम संस्कार की रीति-रिवाजों में अंतर हो सकता है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में बताई गई बातें धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक व्याख्याओं पर आधारित हैं। इनकी सभी व्याख्याओं को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। Satya Report इन मान्यताओं की पूर्ण सत्यता का दावा नहीं करता।

— Satya Report

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