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​अनारकली सलीम की प्रेमिका थी या सौतेली मां, अंग्रेज व्यापारी ने संस्मरण में क्या लिखा?

अकबर के दरबार से निकली एक दास्तान. एक अंग्रेज व्यापारी ने चार सौ साल पहले इसे दर्ज किया. मुगल इतिहास की किताबें खामोश रहीं. फिर भी यह कहानी इतनी मशहूर हुई कि आज भी दोहराई जाती है. वो कहानी अनारकली की है. बला की खूबसूरत. शहजादे सलीम से इश्क की पींगें. प्यार किया तो डरना क्या! पर जिल्लेइलाही शहंशाह अकबर को सख़्त एतराज था. सलीम फिर भी नहीं माने. कीमत अनारकली ने जान देकर चुकाई. महल की दीवार में जिंदा चुनवा दी गई. उसकी याद में लाहौर में एक शानदार मकबरा अभी कायम है.

​अनारकली सलीम की प्रेमिका थी या सौतेली मां, अंग्रेज व्यापारी ने संस्मरण में क्या लिखा?

के. आसिफ ने इसी पर मुगले आज़म फिल्म बनाई. यह फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल है. इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है. इसमें अनारकली को सलीम की प्रेमिका नहीं, बल्कि उसके पिता अकबर की पत्नी और शहजादे दानियाल की मां बताया गया है. क्या अकबर का अनारकली पर कहर सौतेले बेटे से इश्क के चलते टूटा?

ब्रिटिश व्यापारी के यात्रा संस्मरणों में अनारकली

यह कहानी किसी लेखक की कल्पना की उपज नहीं है. करीब चार सौ साल पहले भारत आए एक अंग्रेज व्यापारी ने लाहौर में सुनी इस कहानी को अपने यात्रावृत्तांत में दर्ज किया था. व्यापारी का नाम था विलियम फिंच. वह भारत में 1608 से 1611 के बीच रहा. भारत यात्रा के दौरान विलयम लाहौर भी पहुंचा. वहां उसने एक मकबरा देखा. मकबरा किसी साधारण महिला का नहीं बताया गया था. स्थानीय लोगों के मुताबिक यह अकबर की एक बेगम का मकबरा था. फिंच ने अपने यात्राविवरण में लिखा कि यह मकबरा शहजादे दानियाल की मां का था. वह अकबर की पत्नियों में से एक थी. उसका नाम अनारकली था. इसका अर्थ था अनार का दाना या अनार की कली.

अनारकली.

फिंच के मुताबिक शहजादे सलीम के उसके साथ संबंध थे. जब अकबर को इसकी जानकारी हुई तो उसने गुस्से में अनारकली को महल की दीवार में जिंदा चुनवा देने का हुक्म दिया. सलीम जब जहांगीर के नाम से बादशाह बना तो उसने अनारकली की याद में लाहौर में एक आलीशान मकबरा बनवाया. हालांकि विलयम चश्मदीद नहीं था. उसने लाहौर में सुनी हुई बातों को दर्ज किया था. फिंच के बाद एक अन्य यात्री एडवर्ड टेरी ने भी इस दास्तान को अपने यात्रा वर्णन में शामिल किया.

अनारकली को लेकर अलगअलग दावे

लोकप्रिय दास्तान में अनारकली अकबर की बेगम नहीं, बल्कि शाही महल की एक खूबसूरत नर्तकी थी. उसका असली नाम क्या था, इसे लेकर भी अलगअलग दावे हैं. कहीं उसे नादिरा बेगम कहा गया तो कहीं शरीफउननिसा. अकबर के महल में एक महफिल में नृत्य कर रही अनारकली पर शहजादे सलीम की नजर पड़ी. पहली ही नजर में सलीम उसे दिल दे बैठा. धीरेधीरे दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं. इश्क परवान चढ़ा तो इसकी खबर महल तक पहुंच गई. सलीम बादशाह का बड़ा बेटा था. उसे ही मुगल सल्तनत का अगला वारिस बनना था. अकबर को यह रिश्ता मंजूर नहीं था.

एक बांदी या नर्तकी से शहजादे का निकाह उसे अपनी शान और सल्तनत के लिहाज से नागवार और नामंजूर था. उधर इश्क के जुनून में सलीम ने पिता की रोकटोक की परवाह नहीं की. बात इतनी बढ़ी कि बापबेटे के बीच टकराव की नौबत आ गई. सलीम ने अनारकली के लिए अकबर से बगावत कर दी. बापबेटे की फौज की जंग में बेटे की हार हुई. अकबर ने अनारकली को महल की दीवार में जिंदा चुनवा दिया. अनारकली को बचाने की नाकामी का ग़म सलीम को ताउम्र कायम रहा. एक दूसरी प्रचलित कहानी में अकबर ने आखिर में अनारकली को गुप्त रास्ते से महल से निकल जाने दिया. लेकिन उसे सलीम से हमेशा के लिए अलग होना पड़ा.

सलीम.

नाटक ने कहानी को किया मशहूर

बीसवीं सदी आतेआते अनारकली की कहानी साहित्य और रंगमंच तक पहुंच गई. 1922 में इम्तियाज अली ताज ने उर्दू नाटक अनारकली लिखा. इस नाटक ने सलीम और अनारकली की प्रेमकथा को नई पहचान दी. नाटककार ने ऐतिहासिक पात्रों के बीच एक ऐसी प्रेमकहानी बुनी, जिसमें मोहब्बत, सत्ता, बगावत और कुर्बानी सब कुछ था. इससे पहले भी लाहौर के इतिहास और स्थानीय परंपराओं में अनारकली का जिक्र मिलता है. 1884 में कन्हैया लाल की तारीखएलाहौर में इसका उल्लेख हुआ. बाद में एस. एम. लतीफ की किताब “लाहौर” में भी इस दास्तान को जगह मिली. वक्त के साथ अनारकली की प्रेम और कुर्बानी का प्रतीक बन गई.

प्यार किया तो डरना क्या?

1960 में के. आसिफ की फिल्म मुगले आजम रिलीज हुई. पृथ्वीराज कपूर ने अकबर, दिलीप कुमार ने सलीम और मधुबाला ने अनारकली का किरदार निभाया. फिल्म में इस प्रेमकथा को जिस भव्यता से पर्दे पर उतारा गया उसने इतिहास और कल्पना के बीच की दूरी लगभग खत्म कर दी. फिल्म में अनारकली एक बांदी है. खूबसूरत है. बेखौफ है. शहजादे सलीम से मोहब्बत करती है और अपने प्यार के लिए बादशाह अकबर के सामने भी झुकने को तैयार नहीं. फिल्म का सबसे यादगार दृश्य शीशमहल में आता है. अनारकली दरबार में नृत्य करते हुए गाती है

प्यार किया तो डरना क्या,

प्यार किया तो कोई चोरी नहीं,

छुपछुप आहें भरना क्या,

आज कहेंगे दिल का फसाना,

जान भी ले ले चाहे जमाना,

मौत वही जो दुनिया देखे,

घुटघुट कर यूं मरना क्या,

इश्क में जीना इश्क में मरना,

और हमें अब करना क्या…

यह सिर्फ एक गीत नहीं था. यह अकबर की सत्ता को आशिकमाशूक की खुली चुनौती थी. मधुबाला के चेहरे के भाव, नौशाद का संगीत और लच्छू महाराज की नृत्य संरचना ने इस दृश्य को भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया.फिल्म में अकबर और सलीम के बीच संघर्ष सिर्फ एक प्रेमिका को लेकर नहीं था. यह सत्ता और व्यक्तिगत इच्छा के बीच टकराव भी था. अकबर के लिए सल्तनत की इज्जत सबकुछ थी.

सलीम के लिए मोहब्बत.फिल्म का अंत भी लोकप्रिय दास्तान से थोड़ा अलग है. अकबर आखिरकार अनारकली को मौत से बचने का रास्ता देता है. वह उसे सलीम से हमेशा के लिए दूर भेज देता है. इस तरह फिल्म प्रेमिका को जिंदा रखती है. लेकिन प्रेमियों को मिलन का मौका नहीं देती. मुगले आजम फिल्म ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है. यह इम्तियाज अली ताज के नाटक और प्रचलित लोककथा से प्रेरित सिनेमाई रचना है. लेकिन उसने अनारकली को ऐसी पहचान दी, जो इतिहास की किसी किताब के जरिए शायद ही मिलती.

मुगल बादशाह अकबर. फोटो: Getty Images

मुगल इतिहास की किताबें खामोश क्यों ?

अनारकली की कहानी में सबसे बड़ा पेंच यही है. अकबर के शासनकाल की दास्तान अबुल फजल ने अकबरनामा में दर्ज की. दरबार की घटनाएं, शाही परिवार, युद्ध, राजनीतिक फैसले और बादशाह की निजी जिंदगी तक का इसमें जिक्र है. लेकिन अनारकली की कोई चर्चा नहीं है. सलीम जब जहांगीर के नाम से बादशाह बना तो उसने अपनी आत्मकथा तुजुकएजहांगीरी लिखी. उसमें अपने जीवन, प्रेम, शिकार, शराब, दरबार और निजी अनुभवों का खुलकर जिक्र किया. नूरजहां के साथ अपने रिश्ते को भी नहीं छिपाया. मगर उस किताब में अनारकली के बारे में एक भी शब्द नहीं है.

यह खामोशी क्यों? जिस महिला की याद में कथित तौर पर उसने एक शानदार मकबरा बनवाया, उसके बारे में अपनी आत्मकथा में कुछ न लिखना सवाल पैदा करता है. इतिहासकारों के सामने एक और मुश्किल है. दानियाल की मां की मृत्यु 1596 में दर्ज है, जबकि अनारकली से जुड़े मकबरे पर 1599 की तारीख का उल्लेख मिलता है. इस कहानी की पड़ताल करने वालों में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की इतिहासकार शिरीन मूसवी का नाम खास है.

मूसवी के रिसर्च के मुताबिक अनारकली की दास्तान शायद कुछ व्यक्तियों के आपसी भ्रम और मुगल हरम की किसी घटना की गलत व्याख्या से बनी. मुमकिन है कि अकबर के हरम में किसी महिला से जुड़ी वास्तविक घटना हुई हो. समय के साथ उसके पात्र बदलते गए. एक नाम दूसरे से जुड़ गया. फिर उसमें सलीम का प्रेम, अकबर का गुस्सा और दीवार में जिंदा चुनवा देने जैसी बातें जुड़ती चली गईं.

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