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नाबालिग पत्नी के मां बनने पर पति पर नहीं चलेगा POCSO केस? हिमाचल हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

नाबालिग पत्नी के मां बनने पर पति पर नहीं चलेगा POCSO केस? हिमाचल हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

शिमला, हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने नाबालिग पत्नी के बच्चे को जन्म देने से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि कोई विवाहित नाबालिग लड़की अस्पताल में बच्चे को जन्म देती है, उसके पति के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने पति और उसके परिजनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर तथा संबंधित कानूनी कार्यवाही रद्द कर दी।

न्यायमूर्ति चिराग भानु सिंह ने जितेंद्र कुमार और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया। अदालत ने कहा कि मामले की परिस्थितियों में POCSO एक्ट के प्रावधान लागू करना उचित नहीं था। हालांकि, नाबालिग से विवाह के मामले में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत कार्रवाई का रास्ता अलग हो सकता है।

अस्पताल से मिली सूचना के बाद दर्ज हुई थी FIR

मामला दिसंबर 2024 का है। चंबा के महिला पुलिस थाने में चाइल्ड वेलफेयर हेल्पलाइन के समन्वयक की सूचना पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी। सूचना में बताया गया था कि एक नाबालिग लड़की को प्रसव के लिए चंबा के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

इसके बाद पुलिस ने लड़की के पति और ससुराल पक्ष के अन्य लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, भारतीय दंड संहिता और POCSO एक्ट की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर लिया था।

पति-पत्नी ने अदालत में रखी अपनी बात

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट को बताया कि लड़की ने अपनी इच्छा और माता-पिता की सहमति से वर्ष 2024 में जितेंद्र कुमार से शादी की थी। इसके बाद से दोनों साथ रह रहे थे और उनका एक बच्चा भी है।

सुनवाई के दौरान पत्नी और पति दोनों ने अदालत में बयान दिया कि वे अपनी वैवाहिक जिंदगी से खुश हैं और आपसी समझौते के बाद मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि डॉक्टर ने पुलिस को केवल नाबालिग के बच्चे को जन्म देने की जानकारी दी थी। लड़की ने अस्पताल में किसी तरह के यौन उत्पीड़न की शिकायत नहीं की थी। ऐसे में केवल प्रसव की सूचना के आधार पर POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किए जाने पर कोर्ट ने सवाल उठाए।

निचली अदालतों को लेकर भी जताई चिंता

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में परिस्थितियों और पीड़िता के बयान को ध्यान में रखते हुए निचली अदालतों को कानून के तहत उचित निर्णय लेना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि मुकदमा जारी रखने से एक वैवाहिक जीवन में अनावश्यक तनाव पैदा होता है और न्यायिक प्रक्रिया का कोई सार्थक उद्देश्य पूरा नहीं होता, तो कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में निचली अदालतों द्वारा समय पर उचित निर्णय नहीं लेने के कारण हाईकोर्ट में याचिकाओं का बोझ बढ़ता है।

अंततः हाईकोर्ट ने जितेंद्र कुमार और अन्य के खिलाफ दर्ज एफआईआर तथा उससे जुड़ी कानूनी कार्यवाही रद्द करने का आदेश दिया।

Satya Report Disclaimer: यह खबर अदालत के आदेश और उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित है। फैसले का प्रभाव संबंधित मामले की परिस्थितियों और कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

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