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​काजू कतली, सोन पापड़ी, बालूशाही… दिवाली की ये 8 मिठाई कितनी भारतीय, कितनी विदेशी?

दिवाली का त्योहार और मिठाइयों की बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. कुछ मिठाइयां ऐसी हैं, जो सीधे त्योहारों से जुड़ गई हैं. ठेकुआ छठ से तो गुझिया होली से जुड़ी हुई है. काजू कतली, सोन पापड़ी जैसी मिठाइयां सदाबहार मानी जाती हैं. बालूशाही, गुलाब जामुन का भी वही हाल है. इन मिठाइयों की यात्रा कैसे शुरू हुई, कब हुई, कहां से शुरू हुई, कोई नहीं जानता. केवल चर्चाएं और कुछ आधारभूत तथ्यों के आधार पर जानकार निष्कर्ष निकालते आ रहे हैं. कई व्यंजन व्यापार, यात्राओं, राजदरबारों और स्थानीय रसोई के मेल से बने. कई गांवकस्बों के छोटेछोटे हलवाइयों ने पहले तैयार कर दिया, जो बाद में लोकप्रिय हुए और पूरे देशदुनिया में छा गए.

​काजू कतली, सोन पापड़ी, बालूशाही… दिवाली की ये 8 मिठाई कितनी भारतीय, कितनी विदेशी?

आइए, इस दीवाली ऐसी ही कुछ प्रचलित, मशहूर मिठाइयों और उनके इतिहास के बारे में जानने का प्रयास करते हैं. कौन सी मिठाई भारतीय है और कौन विदेशी, यह भी जानने का प्रयास करेंगे.

काजू कतली: मराठा या मुगलों की मिठाई?

काजू कतली को आम तौर पर भारतीय मिठाई माना जाता है. इसकी शुरुआती कहानी पर एकमत प्रमाण नहीं हैं. कुछ लोकप्रिय कथाएं इसे मुगल दरबार से जोड़ती हैं, तो कुछ मराठा रसोई से. एक कथा के अनुसार, मराठा रसोइए ने बादाम से बनने वाली एक पारसी मिठाई से प्रेरणा लेकर काजू का इस्तेमाल किया. दूसरी कथा इसे गुरु हरगोबिंद की मुक्ति और मुगल दरबार से जोड़ती है. काजू भारत में पुर्तगालियों के जरिए आया था, इसलिए काजू से बनी मिठाई का विकास भी बाद के दौर में हुआ होगा. आज काजू, चीनी और कभीकभी घी से बनी पतली कतली दिवाली की सबसे पहचानी जाने वाली मिठाइयों में है.

काजू कतली

मोतीचूर के लड्डू: राजस्थान या यूपी के?

मोतीचूर के लड्डू भारत की अपनी मिठाई परंपरा का हिस्सा हैं. इनका संबंध खास तौर पर राजस्थान और उत्तर प्रदेश से जोड़ा जाता है. बेसन के बहुत छोटे बूंदीजैसे दानों को घी या तेल में तलकर चाशनी में मिलाया जाता है. फिर उन्हें दबाकर गोल लड्डू बनाया जाता है. मोतीचूर के लड्डू का ठीकठीक जन्मस्थान और समय तय करना मुश्किल है. खाद्य इतिहासकार के. टी. आचार्य के हवाले से इनके पुराने साहित्यिक उल्लेखों की चर्चा हुई है. चाशनी और तलने की विधि ने इन्हें लंबे समय तक रखने और यात्रा में ले जाने लायक बनाया. आज ये पूजा, शादी और त्योहारों में प्रसाद और उपहार, दोनों रूपों में दिए जाते हैं.

मोतीचूर के लड्डू.

रसगुल्ला: आज भी बहस का विषय

रसगुल्ले की जड़ें भारत में हैं, लेकिन इसका जन्म बंगाल में हुआ या ओडिशा में, इस पर लंबे समय से बहस है. बंगाल का दावा है कि उन्नीसवीं सदी में कोलकाता के मिठाईकारों ने छेने के रसगुल्ले को लोकप्रिय बनाया. ओडिशा की परंपरा इसे जगन्नाथ मंदिर और रथयात्रा के बाद होने वाले नीलाद्रि बिजे उत्सव से जोड़ती है. वहां मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए उन्हें रसगुल्ला अर्पित करते हैं. कुछ जानकार इस परंपरा को कई सदियों पुराना बताते हैं, जबकि बंगाल की आधुनिक मिठाई का इतिहास अलग ढंग से दर्ज किया जाता है. इसलिए इसे किसी एक जगह की निर्विवाद खोज कहना ठीक नहीं होगा. छेने की गोलियों को चाशनी में पकाने की कला ने इसे पूरे देश की पसंद बना दिया.

बालूशाही: दक्षिण भारत के बादुशा जैसी

बालूशाही को भारतीय उपमहाद्वीप की पारंपरिक मिठाई माना जाता है. इसके किसी एक आविष्कारक या निश्चित जन्मस्थान का पक्का प्रमाण नहीं मिलता. कुछ खाद्य लेख इसे उत्तर भारत, खासकर दिल्ली, बिहार और उत्तर प्रदेश से जोड़ते हैं. दक्षिण भारत में इससे मिलताजुलता रूप बादुशा कहलाता है. मैदे में घी मिलाकर बनी लोई को धीमी आंच पर तला जाता है और फिर चाशनी में डुबोया जाता है. इसकी बाहरी परत हल्की कुरकुरी और अंदर का हिस्सा परतदार या नरम होता है. अलगअलग इलाकों में नाम, आकार और बनावट बदलती है. यह बदलाव बताता है कि मिठाई स्थानीय हलवाई परंपराओं के साथ विकसित हुई. इसे किसी विदेशी मिठाई की सीधी नकल कहना मुश्किल है, भले ही इसका गोल आकार कुछ पश्चिमी मिठाइयों की याद दिलाए.

गुलाब जामुन.

गुलाब जामुन: एक मिठाई, कई कनेक्शन

गुलाब जामुन का आज का रूप भारतीय मिठाई की दुनिया में बहुत अपना लगता है, लेकिन इसकी जड़ें मिश्रित मानी जाती हैं. एक प्रचलित धारणा इसे मध्य एशिया और फारसीअरबी परंपराओं की तली हुई मिठाइयों से जोड़ती है. माना जाता है कि ऐसी पकवान परंपराएं यात्रियों, व्यापारियों और मुगल दौर की रसोइयों के साथ भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुंचीं. भारत में खोया या मावा, आटा और चाशनी के इस्तेमाल से इसका स्थानीय रूप बना. इसके नाम में गुलाब चाशनी की गुलाबजल जैसी खुशबू की ओर संकेत करता है, जबकि जामुन इसके गोल आकार और गहरे रंग का वर्णन करता है. इसे शाहजहां के रसोइए से भी जोड़ा जाता है. बंगाल का पंतुआ इससे मिलताजुलता क्षेत्रीय रूप है.

सोन पापड़ी.

सोन पापड़ी: फारसी मिठाई जैसी

सोन पापड़ी भारतीय मिठाई है, लेकिन इसकी कहानी में फारसी मिठाइयों से जुड़ाव की संभावना भी बताई जाती है. कुछ खाद्य इतिहासकार इसकी तुलना फारस की रेशेदार मिठाई पश्मक से करते हैं. पश्मक का अर्थ ऊन जैसा बताया जाता है, जो उसकी महीन रेशेदार बनावट का संकेत है. माना जाता है कि यह मिठाई व्यापार और सांस्कृतिक मेलजोल के रास्ते भारतीय रसोई तक पहुंची है. दूसरी ओर, कुछ भारतीय विशेषज्ञ सोन पापड़ी को पंजाब के पतीसे से निकला हुआ रूप मानते हैं. समय के साथ बेसन, घी और चीनी से बनने वाली इसकी हल्की, परतदार बनावट लोकप्रिय हुई. अवध और उत्तर भारत में इसके पुराने रूपों का भी उल्लेख मिलता है. इसकी असली जड़ को लेकर एक मत नहीं है, इसलिए इसे भारतीय विकास और बाहरी प्रभावों के मेल के रूप में देखना बेहतर है.

पेड़ा.

पेड़ा: मथुरा से कनेक्शन कितना मजबूत?

पेड़ा को भारतीय मिठाई परंपरा का पुराना हिस्सा माना जाता है. इसका संबंध उत्तर भारत के मंदिरों और धार्मिक भोग से खास तौर पर जोड़ा जाता है. मथुरा का पेड़ा सबसे प्रसिद्ध क्षेत्रीय रूपों में है, हालांकि यह कहना कठिन है कि पेड़ा सबसे पहले वहीं बना. खोया या मावा को धीमी आंच पर पकाकर, उसमें चीनी और इलायची मिलाकर इसकी गोल या चपटी टिकिया बनाई जाती है. दूध को लंबे समय तक पकाकर गाढ़ा करने की विधि भारतीय घरों और हलवाई की दुकानों में पुरानी है. पेड़ा मंदिरों में प्रसाद के रूप में चढ़ता है और जन्माष्टमी जैसे अवसरों पर भी खूब बनता है. हर क्षेत्र ने इसमें अपने स्वाद जोड़े हैं. कहीं केसर या मेवे मिलते हैं, तो कहीं पेड़ा अधिक भूरा और दानेदार होता है. किसी विदेशी मिठाई से इसका सीधा संबंध उपलब्ध नहीं है. इसलिए इसे मुख्य रूप से भारतीय दूधमिठाई परंपरा का व्यंजन कहना उचित है.

इमरती.

इमरती: मुगल रसोई से कनेक्शन

इमरती भारतीय मिठाई है, और इसकी लोकप्रियता उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक फैली है. दक्षिण में इसे अक्सर जांगरी कहा जाता है. उड़द की दाल को पीसकर घोल बनाया जाता है. फिर उसे फूल या गोल जाल जैसी आकृति में गर्म तेल या घी में तला जाता है और चाशनी में डुबोया जाता है. इतिहास में इसकी शुरुआत मुगल रसोई से भी जोड़ी जाती है. लोग इसे जहांगीर के नाम से जुड़ी जांगिरी कहानी के जरिए समझाते हैं. इमरती को जलेबी से अलग पहचान उसकी दाल वाली सामग्री, मोटी बनावट और फूल जैसी आकृति देती है. अलगअलग इलाकों में इसका नाम और आकार बदलता है. इस तरह यह भारतीय हलवाई कला की स्थानीय विविधता का अच्छा उदाहरण है.

इन मिठाइयों की कहानी बताती है कि भारतीय और विदेशी के बीच की रेखा हमेशा एकदम सीधी नहीं है. कुछ मिठाइयों का आधार स्थानीय सामग्री और पुरानी भारतीय विधियां हैं. कुछ में व्यापार, दरबारी रसोई या पड़ोसी क्षेत्रों का असर दिखता है. कई बार एक मिठाई अलगअलग जगहों पर नए नाम और नए रूप के साथ अपनाई गई. दिवाली की थाली में वे सभी भारत की साझा खाद्यसंस्कृति का हिस्सा बन चुकी हैं.

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