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खामेनेई की हत्या से हिल गया पूरा मिडिल ईस्ट, भारत पर क्या होगा असर? पढ़िए पूर्व भारतीय राजदूत का इंटरव्यू

 

Iran-US War: खामेनेई ने भारत के साथ रणनीतिक संबंधों के बजाय धार्मिक नजरिये को ज्यादा महत्व दिया। कश्मीर और मुस्लिमों के ऊपर उनके कई बयान नई दिल्ली को पसंद नहीं आए। लेकिन, वह स्टेट हेड थे और उनको मारने का मतलब है पूरे क्षेत्र को अस्थिर करना। इसका सीधा असर भारत पर पड़ता है।
Iran-US War
खामेनेई की हत्या से पूरा मिडिल ईस्ट प्रभावित
नई दिल्ली: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर भारत ने दुख जताया है, पर इसमें देरी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि रूस, अमेरिका समेत कई देशों में भारतीय राजदूत रहे और अभी विवेकानंद इंटरनैशनल फाउंडेशन में विशिष्ट फेलो अनिल त्रिगुणायत इसे दूसरी तरह देखते हैं। शैलेंद्र पांडेय के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि यह संघर्ष किस तरह पश्चिम एशिया को बदल सकता है और भारत पर क्या असर पड़ने की संभावना है।

अमेरिका-इस्राइल जिन लक्ष्यों को लेकर इस संघर्ष में उतरे हैं, उन्हें पाना कितना संभव है?
वे बड़े कन्फ्यूज हैं, अपने लक्ष्य को बार-बार बदल रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के बयानों से पहले लगा कि उनका मुख्य अजेंडा ईरान में रेजीम चेंज करना है, यानी उन्हें ऐसी सत्ता चाहिए जो उनकी बात माने। हालांकि एक हकीकत यह है कि अयातुल्लाह अली खामेनेई ने ईरान को हमेशा परमाणु हथियारों से दूर रखा। फिर दोनों पक्षों के बीच ऐतिहासिक रूप से बातचीत चल रही थी और इसी बीच में हमला कर दिया गया। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि इस्राइल हमला करना चाहता था, इसलिए करना पड़ा। उन्हें लगा कि खामेनेई को मारने से संकट हल हो जाएगा। कुल मिलाकर ये सारे कदम बहुत कंफ्यूज्ड हैं। केवल ताकत के दम पर दुनिया को नहीं चलाया जा सकता। एक बार जब पावर इस्तेमाल हो जाती है, तब वह पहले जैसी नहीं रहती।

इस लड़ाई में चीन और रूस की चुप्पी उनके लिए भी घातक होगी। चीन की साख कम होगी। इलाके के सारे देश अब Transactional Relationships बढ़ाएंगे। रणनीतिक रूप से महाशक्तियों को नुकसान हुआ है।
विवेकानंद इंटरनैशनल फाउंडेशन में विशिष्ट फेलो अनिल त्रिगुणायत

लड़ाई पूरे पश्चिम एशिया में फैल चुकी है और ईरान मुस्लिम वर्ल्ड में ही अलग-थलग दिख रहा है। इस संघर्ष के बाद जियो-पॉलिटिकल सिचुएशन क्या रूप ले सकती है?
ईरान ने शुरू से कहा है कि अगर हमारे ऊपर अटैक होता है, तो रीजन में जितने अमेरिकी असेट मौजूद हैं, वह उन पर हमला करेगा। उनके हिसाब से यह जायज है, पर क्या रणनीतिक रूप से सही है? मेरे हिसाब से यह विपदा है और गलत निर्णय है। ईरान को लगता है कि इन अमेरिकी बेसों से उसे निशाना बनाया जा सकता है, तो वह उनको न्यूट्रलाइज करना चाहता है। हालांकि देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर ही अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा टिकी है। फिर, ईरान और सऊदी अरब या शिया-सुन्नी देशों के बीच अच्छी बात चल रही थी। लेकिन, ईरान ने हमला करते वक्त किसी खाड़ी देश को नहीं छोड़ा और उन सभी को ऐसे ग्रुप में खड़ा कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उनका फिर इस्तेमाल कर सकता है। हमें याद रखना होगा कि आज का जमाना ग्रे जोन वॉरफेयर का है यानी करेगा कोई और भुगतेगा कोई। मसलन- ब्रिटेन ने कहा है कि साइप्रस में हमला करने वाला ड्रोन ईरान का नहीं था। इसी तरह सऊदी अरब और कतर की गैस फील्ड पर हुए अटैक से ईरान ने इनकार किया है, जबकि बाकियों को वह मान रहा है। अब यहां रीजन में सबसे ज्यादा इंट्रेस्ट है अमेरिका और इस्राइल का। तो उनकी एजेंसियां भी इस तरह के ऑपरेशन कर सकती हैं। इस बारे में जांच चल रही है। इन सब चीजों से सऊदी अरब मजबूर हो जाएगा कि ईरान के खिलाफ गठबंधन का हिस्सा बने।

भारत ने वर्षों तक ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं। आगे क्या असर पड़ेगा?
खामेनेई ने भारत के साथ रणनीतिक संबंधों के बजाय धार्मिक नजरिये को ज्यादा महत्व दिया। कश्मीर और मुस्लिमों के ऊपर उनके कई बयान नई दिल्ली को पसंद नहीं आए। लेकिन, वह स्टेट हेड थे और उनको मारने का मतलब है पूरे क्षेत्र को अस्थिर करना। इसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। मुझे खुशी है कि भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ईरानी दूतावास जाकर कंडोलेंस बुक पर साइन किया। भारत ने शुरू में संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर जो बयान दिया, वह भी अच्छा था, पर लोग थोड़ी और स्पष्टता चाहते थे।

अमेरिका के साथ बढ़ती साझेदारी यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत को दुविधा में डाल चुकी है। अब फिर वैसे ही हालात हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि न चाहते हुए भी देश को रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करना पड़ रहा है?
विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य हर परिस्थिति में राष्ट्रीय हितों की रक्षा है। ऐसे हालात आते रहते हैं। 1971 की जंग में जब अमेरिका हमें दबा रहा था, तब सोवियत संघ के साथ एग्रीमेंट करना पड़ा। रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब है कि हम किसी से अलायंस नहीं करते, मल्टी-अलाइनमेंट में यकीन रखते हैं। लेकिन, कई बार देशहित में इसे रिकैलिब्रेट करना पड़ता है।

भारत से निकले ईरान के एक जहाज को श्रीलंका के पास अमेरिका ने डुबो दिया। इस तरह के कूटनीतिक संकट किस तरह हल किए जाते हैं, क्योंकि इसमें बिना किसी बात के भारत का भी जिक्र आ गया।
मिलन एक्सरसाइज में कई देशों ने हिस्सा लिया था, जिसमें ईरान भी था। इस घटना को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं, जैसे कि क्या भारत को जानकारी थी, क्यों अमेरिका इस क्षेत्र में आया? इन सबके बावजूद इस समय अमेरिका और ईरान युद्ध की स्थिति में हैं और कहते हैं कि युद्ध में हर चीज जायज होती है। कुछ लोग इसमें ऐसी अटकलें लगा रहे हैं, जिसका कोई सिर-पैर नहीं। यहां बस एक ही पॉइंट देखने वाला है कि भारत रीजनल पावर है, हिंद महासागर को हम अपना बैकयार्ड मानते हैं और अमेरिका ने यहां आकर कार्रवाई की।

खामेनेई के बाद के ईरान में क्या भारत के लिए ज्यादा जगह होगी, चीन को काउंटर करने में किस तरह मदद मिल सकती है?
मुझे लगता है कि इस लड़ाई में चीन और रूस की चुप्पी उनके लिए भी घातक होगी। चीन की साख कम होगी। इलाके के सारे देश अब Transactional Relationships बढ़ाएंगे। रणनीतिक रूप से महाशक्तियों को नुकसान हुआ है। हालांकि चीन का आर्थिक महत्व बना रहेगा, क्योंकि वह बड़ी इकॉनमी है। भारत की बात करें तो अगर खामेनेई के बेटे आते हैं और यही रिजीम रहती है, तब नई दिल्ली-तेहरान के द्विपक्षीय रिश्ते पहले जैसे ही रहेंगे। अगर युद्ध के बाद अमेरिकी प्रतिबंध हट जाते हैं, तो ईरान के साथ भारत पूरी तरह व्यापार कर सकता है।

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