हर कोई ध्रुव तारा के बारे में तो जानता ही है। आसमान में सबसे तेज चमकता तारा। लेकिन शायद आप ये बात नहीं जानते होंगे कि धुव्र नाम के एक राजकुमार थे, जिन्होंने मात्र 5 वर्ष की आयु में कठोर तपस्या, भक्ति और अटल संकल्प के कारण श्री हरि विष्णु को प्रसन्न करके धुव्र लोक के स्वामी का वरदान पाया था। आज हम ‘धर्म गाथा’ की श्रृंखला में जानेंगे कैसे बालक तपस्या के बल पर धुव्र तारा बन गए। इस कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के स्कंध 4, अध्याय 8 से 12 में वर्णित है।। ध्रुव का संकल्प आज भी पौराणिक कथाओं में ‘ध्रुव संकल्प’ के नाम से काफी प्रसिद्ध है। ये कहानी आपको अटूट संकल्प, असंभव को संभव कर पाना और ईश्वर में प्रति आस्था को बताती है। आइए जानते हैं ‘धर्म गाथा‘ श्रृंखला में कैसे 5 वर्षीय ध्रुव ने राजमहल की शान-शौकत को छोड़कर भगवान की राह चुनी…

कौन थे राजकुमार धुव्र?

श्रीमद्भागवत महापुराण के स्कंध 4, अध्याय 8 से 12 में वर्णित ध्रुव की कथा भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में से एक मानी जाती है। यह कथा बताती है कि भक्ति, दृढ़ संकल्प और तपस्या से असंभव भी संभव हो सकता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, सनकादि, नारद, ऋभु, हंस, अरुणि और यति ब्रह्मा जी के इन नैष्ठिक ब्रह्मचारी पुत्रों ने गृहस्थाश्रम में प्रवेश नहीं किया। ऐसे में इनमें से किसी को संतान नहीं हुई। अथर्व भी ब्राह्मण जाति का ही पुत्र था, उसकी पत्नी का नाम मृषा था। उसके दम्भ पुत्र नामक और माया नाम की कन्या हुई। उन दोनों को निर्ऋति ले गया, क्योंकि उसके कोई संतान न थी। दम्भ और माया से लोभ और निकृति (शठता) का जन्म हुआ। फिर इनसे क्रोध और हिंसा तथा उनसे कलि (कलह) और उसकी बहन दुरुक्ति (गाली) उत्पन्न हुई।

फिर दुरुक्ति से कलिने भय और मृत्यु का उत्पन्न किया तथा उन दोनों के संयोग से यातना और नरक का जोड़ा उत्पन्न हुआ।

निष्पाप विदुरजी! इस प्रकार मैंने संक्षेप में तुम्हें प्रजापति के वंश का वर्णन सुनाया है। यह अध्याय का सार है।

सौतेली मां के द्वारा हुआ अपमान, थोड़ा पिता का घर

ब्रह्मा जी की मानसपुत्री महारानी शतरूपा और उनके पुत्र स्वायम्भुव मनु से प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक पुत्र हुए। कला से उत्पन्न होने के कारण ये दोनों संसार की रक्षा में लगे थे। उत्तानपाद के सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्तियां थी। उनमें से सुरुचि राजा को अति प्रिय थी। उन दोनों की उत्तम नाम की संतान थी। वहीं दूसरी ओर अन्य पत्नी सुनीति से एक पुत्र हुआ जिसका नाम ध्रुव था।

एक दिन की बात कि राजा उत्तानपाद सुरुचि के पुत्र उत्तम को अपनी गोद में बिठाकर प्यार कर रहे थे। उसी समय धुव्र ने भी गोद में बैठना चाहा। लेकिन राजा ने उसका स्वागत नहीं किया। उसी समय घमंड से भरी सुरुचि ने अपनी सौतन के पुत्र धुव्र को महाराज की गोद में आते देख उससे बहुत ही डाहभरे शब्दों में कहा कि बच्चे तू राज सिंहासन में बैठने का अधिकारी नहीं है। तू भी राजा का बेटा है, इससे क्या हुआ तुझको मैने तो अपनी कोख में धारण नहीं किया था। तू अभी नादान है। तूझे पता नहीं है कि तूने किसी दूसरी स्त्री के गर्भ से जन्म लिया है। तभी तो ऐसे दुर्लभ विषय की इच्छा कर रहा है। अगर तुम्हें राज सिंहासन की इच्छा है, तो तपस्या करके परम पुरुष श्री नारायण की आराधना कर और उनकी कृपा से मेरे गर्भ में आकर जन्म लें।

सौतेली माता द्वारा अपमानित किया गया, तो उनका बाल मन आहत हो गया। उस समय धुव्र की उम्र मात्र पांच वर्ष थी। धुव्र क्रोध के कारण लंबी-लंबी सांसे लेने लगे और उनके पिता ये सब चुपचाप देखते रहें। ऐसे में धुव्र रोता हुआ अपनी माता के पास आया और खूब रोने लगा। ऐसे में सुनीति ने अपने बेटे को गोद में उठा लिया और दूसरे लोगों से पहले हुई घटना के बारे में जान कर वह बहुत दुखी हुई और खूब रोने लगी।

मां ने दी श्री विष्णु की आराधना करनी की सीख

सुनीति ने अपने बेटे धुव्र से कहा कि बेटा तू दूसरों के लिए किसी प्रकार के अमंगल की कामना मन करना। जो मनुष्य दूसरों को दुख देता है, तो स्वयं वह फल भोगता है। सुरुचि ने जो भी तुमसे कहा है, वो ठीक ही है, क्योंकि महाराज को मुझे पत्नी क्या दासी के रूप में भी स्वीकार करने में लज्जा आती है। मैं तुम्हें जन्म दिया है। सुरुचि तेरी सौतेली मां होने के कारण ऐसा व्यवहार किया है। लेकिन तुम द्वेष भाव को छोड़कर उसी का पालन करे। बस, भगवान के चरणों की आराधना शुरू कर दें।

श्री हरि की आराधना करने से तेरे परदादा ब्रह्माजी को सर्वश्रेष्ठ पद की प्राप्ति हुई थी। इसलिए तुम भी उनकी आराधना में लग जाए। इसके बाद धुव्र ने अपनी बुद्धि द्वारा अपने चित्त का समाधान किया और पिता के नगर से निकल पड़े।

नारद जी ने बताया श्री विष्णु के दर्शन का मार्ग

जब नारद जी को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने धुव्र को समझाने की काफी कोशिश की। लेकिन धुव्र अडिग रहें। धुव्र की बात सुनकर नारद जी अति प्रसन्न हुए है उन पर कृपा करके कुछ उपदेश दिए। इसके बाद नारद जी से श्री विष्णु के स्वरूप से लेकर उनकी करुणा के बारे में हर एक बात बताई।

नारद जी से धुव्र से कहा कि मैं तुम्हें एक ऐसा मंत्र बताता हूं जिसका उच्चारण करके तुम श्री हरि विष्णु दर्शन कर सकते हैं। वह मंत्र है ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’

इस मंत्र के साथ किसी भी व्यक्ति किसी भी देश, काल से इस मंत्र के साथ पूजा कर सकता है। इसके बाद नारद जी से पूरी पूजा विधि बतला दी। फिर धुव्र ने नारद जी को प्रणाम करके आगे चल दिया। धुव्र के तपोवन की ओर चले गए। वहां दूसरी ओर नारद जी राजा उत्तानपाद के राज्य पहुंचे और उन्हें धुव्र के साथ हुए अन्याय के बारे में बता कर उनकी आंख खोली।

धुव्र की तपस्या से कांप उठा त्रिलोक

उपदेशानुसार एकाग्रचित्त होकर धुव्र ने श्री विष्णु की उपासना आरंभ की। उन्होंने तीन-तीन रात्रि के अंतर से शरीर निर्वाह के लिए केवल बेर और कैथ के फल खाएं। 5 साल की उम्र में धुव्र ने ये कठोर तपस्या आरंभ कर दी थी। दूसरे महीने में उन्होंने छह-छह दिन के पीछे सूखे घास और पत्ते खाकर भगवान का भजन किया। तीसरा महीना नौ-नौ दिन पर केवल जल पीकर समाधि योग के द्वारा श्री हरी की आराधना की। चौथे महीने उन्होंने श्वास को जीकर बारह-बारह दिन केवल वायु पीकर ध्यान किया। इसी तरह पांचवां महीने अपनी श्वास को जीतकर एक पैर में खड़े होकर साधना की। वह निरंतर समस्या करते गए। जिस समय उन्होंने संपूर्ण तत्वों के आधार और प्रकृति और पुरुष के भी अधीश्वर परब्रह्म धारणा की। उस समय तीनों लोक कांप गए थे। जब राजकुमार धुव्र एक पैर में खड़े हुए, तब उनके अंगूठे से दबकर प्रथ्वी एक प्रकार से झुक गई। ऐसे में पृथ्वी में काफी हलचल होने लगी। ऐसे नें पृथ्वी में काफी नुकसान होने लगा। तब सभी लोक और लोकपाल श्री हरि विष्णु के पास पहुंचे।

इसके बाद श्री हरी ने देवताओं से कहा कि डरने की बात नहीं है। उत्तानपाद के पुत्र धुव्र ने अपने चित्त को मुझ विश्वात्मा में लीन कर लिया था। इसके कारण प्राण निरोध से तुम सबका प्राण रुक गया है। अब तुम अपने-अपने लोकों को जाओं और मैं उस बालक को इसे दुष्कर तप से निकलता हूं।

श्री विष्णु ने दिया धुव्र लोक का वरदान

अंततः भगवान विष्णु स्वयं उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें दर्शन दिए। यह क्षण ध्रुव के जीवन का सबसे दिव्य और परिवर्तनकारी क्षण था। ऐसे में बालक ने श्री हरि की स्तुति की। फिर श्री विष्णु ने कहा कि व्रत का पालन करने वाले राजकुमार, मैं तेरे हद्य का संकल्प जानता हूं। लेकिन उस पद का प्राप्त होना काफी कठिन है। लेकिन मैं तुम्हें ऐसा कुछ दूंगा, जिससे तुम्हारा कल्याण हो। ऐसा तेजोमय अविनाशी लोक आज तक किसी ने नहीं पाया है। जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र, तारागण रूप में ज्योतिष चक्र उसी प्रकार चक्कर काटता है। तारा गण सहित धर्म, अग्नि, कश्यप और शुक्र आदि नक्षत्र, सप्त ऋषि जिसकी प्रदक्षिणा कर रहे हैं। वह धुव्र लोक मैं तुझे दे रहा हूं।

विष्णु जी ने आगे कहा कि जब तेरे पिता तुझे राजसिंहासन देकर वन को चले जाएं। तब तुम छत्तीस हजार वर्ष तक धर्म पूर्वक पृथ्वी का पालन करोंगे। इसके साथ ही तेरी सौतेली मां और भाई की भी उनके कर्मों के हिसाब से मृत्यु हो जाएगी। इसके बाद कई उत्तम भोग को पाकर अंत में तुम्हें मेरा ही स्नरण आएगा। इससे तुम अंत में संपूर्ण लोगों के वन्दनीय और सप्तऋषि से भी ऊपर निज धाम को जाओंगे। जहां पहुंच जाने पर किसी संसार में दोबारा लौटकर नहीं आना होता है।

डिस्क्लेमर: “यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है/सत्‍य रिपोर्ट एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।