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AI में मक्खी का ‘दिमाग’ फिट! 95% सटीकता के साथ किया काम; क्या अब इंसानों को भी बनाया जाएगा रोबोट?

नामक कंपनी ने एक मक्खी के दिमाग के न्यूरॉन्स को AI के जरिए डिजिटल रूप में सफलतापूर्वक सिम्युलेट किया है. वैज्ञानिकों का अंतिम लक्ष्य इंसानी दिमाग को चिप पर अपलोड करना है, जिससे यादों और भावनाओं को डिजिटल रूप में हमेशा के लिए सुरक्षित रखा जा सके.
AI में मक्खी का 'दिमाग' फिट! 95% सटीकता के साथ किया काम; क्या अब इंसानों को भी बनाया जाएगा रोबोट?

टेक्नोलॉजी की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI इन दिनों सबसे बड़ा ट्रेंड बना हुआ है. आमतौर पर AI सिस्टम डेटा के आधार पर अगला शब्द या जवाब प्रेडिक्ट करता है, लेकिन अब वैज्ञानिक इससे कहीं आगे सोच रहे हैं. एक नया सवाल सामने आ रहा है- क्या इंसान का पूरा दिमाग, उसकी सोच और व्यवहार को एक चिप में डाला जा सकता है? यह सवाल पहले सिर्फ साइंस फिक्शन तक सीमित था, लेकिन अब इसे हकीकत में बदलने की कोशिश शुरू हो चुकी है. इसी दिशा में काम करते हुए Eon Systems नाम की कंपनी ने दावा किया है कि उन्होंने एक जीव के पूरे दिमाग का सफल सिमुलेशन किया है और वह जीव है एक छोटी सी फल मक्खी.

वर्चुअल दुनिया में असली जैसी मक्खी

कंपनी ने एक वीडियो शेयर किया, जिसमें एक डिजिटल यानी वर्चुअल मक्खी दिखाई देती है. यह मक्खी एक सिमुलेशन वाले माहौल में घूमती है, बीच-बीच में अपने एंटीना साफ करती है और फिर केले के टुकड़ों तक पहुंचकर उन्हें खा भी लेती है.

इस वीडियो ने लोगों को हैरान कर दिया, क्योंकि मक्खी का यह व्यवहार बिल्कुल असली जैसा लग रहा था. कंपनी के अनुसार, इस मक्खी के बिहेवियर को एक AI एल्गोरिद्म कंट्रोल कर रहा था, जो उसके वर्चुअल न्यूरॉन्स को उसी तरह एक्टिव करता है जैसे असली मक्खी के दिमाग में होता है. इसकी सटीकता लगभग 95 प्रतिशत बताई जा रही है.

कैसे हुआ ये कमाल?

इस उपलब्धि को हासिल करने के लिए वैज्ञानिकों ने फल मक्खी के दिमाग को बहुत करीब से समझा. इसके लिए इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की मदद से मक्खी के ब्रेन की एक्टिविटी को ट्रैक किया गया. इसके बाद इस डेटा को AI एल्गोरिद्म के साथ जोड़ा गया, जिससे वर्चुअल ब्रेन में वही न्यूरल एक्टिविटी पैदा की जा सके जो असली मक्खी में होती है. आसान शब्दों में कहें तो, यह एक डिजिटल दिमाग है जो असली दिमाग की तरह काम करता है.

माइंड अपलोडिंग की ओर पहला कदम

कंपनी का मानना है कि यह प्रयोग “माइंड अपलोडिंग” की दिशा में एक शुरुआती कदम है. माइंड अपलोडिंग का मतलब है—किसी इंसान के दिमाग की पूरी जानकारी, उसकी यादें और सोच को डिजिटल फॉर्म में सेव करना. कंपनी के को-फाउंडर का कहना है कि अभी इस तकनीक में कुछ कमियां हैं, लेकिन भविष्य में इसे और बेहतर बनाया जा सकता है. उनका अंतिम लक्ष्य इंसानी दिमाग का भी इसी तरह सटीक सिमुलेशन तैयार करना है.

क्या डिजिटल दिमाग सच में ‘जिंदा’ होगा?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर इंसान का दिमाग पूरी तरह से डिजिटल रूप में कॉपी हो जाए, तो क्या वह सच में “जिंदा” या “सचेत” होगा? कंपनी का मानना है कि अगर दिमाग के हर सिग्नल को पूरी तरह से कॉपी कर लिया जाए, तो डिजिटल वर्जन में भी वही यादें, भावनाएं और अनुभव होंगे जो असली इंसान में होते हैं. यानी एक तरह से आपका डिजिटल क्लोन तैयार हो सकता है.

एक्सपर्ट्स की चिंता भी जरूरी

हालांकि, सभी वैज्ञानिक इस विचार से सहमत नहीं हैं. कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि सिर्फ दिमाग की एक्टिविटी को कॉपी करने से असली भावनाएं या अनुभव नहीं बन जाते. उदाहरण के तौर पर, अगर आप कंप्यूटर में बारिश का सिमुलेशन देखते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि कंप्यूटर अंदर से गीला हो रहा है. उसी तरह, डिजिटल दिमाग असली “फीलिंग्स” को महसूस कर पाएगा या नहीं, यह अभी भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है.

AI का भविष्य बदल सकता है

अगर यह तकनीक सफल होती है, तो यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दिशा पूरी तरह बदल सकती है. अभी तक AI सिर्फ डेटा पर आधारित है और उसमें खुद की कोई समझ या चेतना नहीं होती. लेकिन अगर इंसानी दिमाग का सिमुलेशन संभव हो गया, तो AI सिर्फ स्मार्ट ही नहीं, बल्कि “सोचने” और “महसूस करने” वाली मशीन बन सकता है. और यही वह मोड़ होगा, जहां टेक्नोलॉजी और इंसान के बीच की सीमा लगभग खत्म हो सकती है.

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