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मां बनना चाहती हैं 53-55 साल की दो महिलाएं, पहुंच गईं हाईकोर्ट; जीत जाएंगी कानूनी लड़ाई?

Satya Report: दो महिलाओं ने ART Act के तहत IVF के लिए 50 वर्ष की आयु सीमा को चुनौती दी है। कोर्ट ने उन्हें मेडिकल टेस्ट की अनुमति देकर एक बड़ी अंतरिम राहत दी है। जानें क्या है भारत में मां बनने की कानूनी उम्र सीमा और पूरा मामला।

मां बनना चाहती हैं 53-55 साल की दो महिलाएं, पहुंच गईं हाईकोर्ट; जीत जाएंगी कानूनी लड़ाई?

53 और 55 साल की दो विवाहित महिलाओं ने भारत में फर्टिलिटी (प्रजनन) ट्रीटमेंट से जुड़े एक कानून को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी है। इस कानून के तहत 50 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को बच्चा पैदा करने के लिए फर्टिलिटी ट्रीटमेंट लेने पर रोक है। इस मामले में सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने इन महिलाओं को एक बड़ी और अहम राहत दी है, जिसके तहत उन्हें कम से कम अपना मेडिकल फिटनेस टेस्ट शुरू करने की अनुमति मिल गई है। आइए इस पूरी खबर और इसके कानूनी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं। .

क्या भारत में बच्चा पैदा करने (फर्टिलिटी ट्रीटमेंट) की कोई उम्र सीमा है?

हां। भारत के सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) अधिनियम, 2021 के तहत फर्टिलिटी उपचार प्राप्त करने के लिए अधिकतम आयु सीमा तय की गई है। महिलाओं के लिए 50 वर्ष और पुरुषों के लिए 55 वर्ष आयु सीमा तय है। इस उम्र के बाद, कोई भी कानूनी रूप से फर्टिलिटी उपचार जैसे आईवीएफ या डोनर एग/स्पर्म का इस्तेमाल नहीं ले सकता है।

ART क्या है?

आसान शब्दों में समझें तो, जब प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करना संभव नहीं होता है, तो मेडिकल साइंस की मदद से लोगों को बच्चा पैदा करने में सहायता की जाती है। इसमें IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं, जहां महिला को गर्भधारण करने और बच्चे को जन्म देने में मदद करने के लिए डोनर (दाता) के अंडे या शुक्राणु का इस्तेमाल किया जाता है।

महिलाओं की दलील क्या है?

इन दोनों याचिकाकर्ता महिलाओं का तर्क है कि ART कानून के तहत तय की गई यह उम्र सीमा मनमानी और असंवैधानिक है। यह उनके मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

बॉम्बे हाई कोर्ट में क्या हुआ?

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार को जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस अभय मंत्री की बॉम्बे हाई कोर्ट की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने महिलाओं को अंतरिम राहत देते हुए उन्हें अपना मेडिकल फिटनेस टेस्ट कराने की अनुमति दे दी है। यह इस दिशा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहला कदम है।

इससे पहले, अदालत ने शोध-आधारित डेटा मांगा था जो यह साबित कर सके कि इस उम्र में एक महिला सुरक्षित रूप से गर्भधारण कर सकती है। इसके जवाब में, दोनों महिलाओं ने पहले ही एक स्त्री रोग विशेषज्ञ से प्रमाण पत्र जमा कर दिए हैं, जिसमें उन्हें पूरे नौ महीने तक गर्भ धारण करने के लिए ‘मेडिकली फिट’ घोषित किया गया है।

न्याय मित्र की नियुक्ति

इस मामले की कानूनी पेचीदगियों को समझने और अदालत की मदद करने के लिए, हाई कोर्ट ने वरिष्ठ वकील और महाराष्ट्र के पूर्व महाधिवक्ता आशुतोष कुंभकोणी को ‘एमिकस क्यूरी’ (विशेषज्ञ सलाहकार) के रूप में नियुक्त किया है।

इस केस का क्या असर हो सकता है?

अगर बॉम्बे हाई कोर्ट अंततः महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाता है और ART अधिनियम की धारा 21(g) (जो उम्र सीमा तय करती है) को रद्द कर देता है, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे।

यह पूरे भारत में अधिक उम्र की महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को फिर से परिभाषित करेगा। इससे यह ऐतिहासिक मिसाल कायम होगी कि किसी भी महिला के मां बनने के अधिकार को तय करने के लिए सिर्फ उसकी ‘उम्र’ ही एकमात्र पैमाना नहीं हो सकती।

contact.satyareport@gmail.com

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