Satya Report: राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस आज है. यह साल 2010 से लगातार मनाया जा रहा है. इस दिन देश के अलगअलग हिस्सों में केंद्र और राज्य सरकारें पंचायतों को पुरस्कार देती हैं. केंद्र सरकार कई बार पंचायतों के लिए नई घोषणाएं भी करती है. यह खास दिवस संविधान के 73 वें संशोधन के लागू होने के दिन को केंद्र में रखकर मनाया जाता है. इस दिवस और संविधान संशोधन का एक मात्र उद्देश्य पंचायतों को मजबूत करना है. इतना सबके बावजूद अफसरों की लापरवाही एवं राजनीतिक वजहों से किसी न किसी राज्य में चुनाव टलते ही रहते हैं. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में पंचायत चुनाव अटके हैं. उम्मीद की जा रही है कि अगले साल विधान सभा चुनाव के बाद ये चुनाव होंगे.

आइए, राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के बहाने जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर यूपी में क्यों अटक गए हैं पंचायत चुनाव? क्या हैं चुनाव से जुड़े प्रावधान? राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस का इतिहास भी जानेंगे.
अलगअलग कारणों से अटकते रहे हैं चुनाव
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कई बार अलगअलग कारणों से अटकते रहे हैं. इस बार भी अटक गए हैं. चुनाव कब होंगे, किसी को नहीं पता. सरकार से लेकर प्रशासन तक में कोई हलचल नहीं है. इसका सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कारण आरक्षण सूची तय करने में देरी है. पंचायत चुनाव से पहले सीटों का आरक्षण तय किया जाता है. इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होती हैं. यह प्रक्रिया हर चुनाव में नए सिरे की जाती है, इसलिए इसमें समय लगता है.
साल 2021 के उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव की तस्वीर.
आरक्षण तय करने वाला आयोग ही नहीं बना
यूपी में तो अभी जिस आयोग को यह काम करना है, उसका गठन अभी तक नहीं हो पाया है. अगर सब कुछ समय से होता तो मई 2026 में चुनाव होते, पर अब यह तय है कि ऐसा नहीं होने जा रहा है. दूसरा कारण प्रशासनिक तैयारी होती है. पंचायत चुनाव बहुत बड़े स्तर पर होते हैं. इसमें लाखों कर्मचारी लगते हैं. मतदान केंद्रों की व्यवस्था करनी होती है. सुरक्षा बलों की तैनाती करनी होती है. कई बार यह तैयारी समय पर पूरी नहीं हो पाती. इस वजह से भी देरी होती है.
पंचायत की मतदाता सूची भी तैयार नहीं
एक और महत्वपूर्ण कारण मतदाता सूची का अपडेट न होना है. पंचायत चुनाव में ग्राम स्तर पर वोटर लिस्ट तैयार की जाती है. इसमें नाम जोड़ने और हटाने का काम होता है. अगर इसमें गड़बड़ी की शिकायत आती है, तो सुधार प्रक्रिया चलती है. इससे चुनाव कार्यक्रम आगे बढ़ जाता है. कभीकभी प्राकृतिक आपदाएं या महामारी भी कारण बनती हैं. जैसे कोविड19 के समय कई राज्यों में चुनाव कार्यक्रम प्रभावित हुआ था. इसके अलावा राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच तालमेल की कमी भी देरी का कारण बन सकती है.
वोटर लिस्ट.
पंचायत चुनाव से जुड़े प्रमुख प्रावधान भी जानें
भारत में पंचायत चुनाव संविधान के 73वें संशोधन के तहत होते हैं. यह संशोधन साल 1992 में मंजूर हुआ और इसे साल 1993 में लागू किया गया. इसके बाद पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला. हर राज्य में तीन स्तर की पंचायत व्यवस्था होती है. ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत. नियमानुसार पंचायत चुनाव हर पांच साल में होना जरूरी है. अगर किसी पंचायत को भंग किया जाता है, तो छह महीने के अंदर चुनाव कराने का नियम है. चुनाव कराने की जिम्मेदारी राज्य चुनाव आयोग की होती है. यह आयोग स्वतंत्र होता है और इसका गठन राज्य सरकारें करती हैं.
आरक्षण बेहद महत्वपूर्ण फैसला
आरक्षण का प्रावधान भी महत्वपूर्ण है. पंचायत चुनाव में कुल सीटों में से एकतिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है. कई राज्यों में यह प्रतिशत 50 तक बढ़ा दिया गया है. अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए उनकी आबादी के अनुसार सीटें आरक्षित होती हैं. कुछ राज्यों में ओबीसी के लिए भी आरक्षण तय है.
विकास में पंचायतों की भागीदारी
पंचायतों को स्थानीय विकास के काम दिए गए हैं. इसमें सड़क, पानी, स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे काम शामिल हैं. पंचायतों को धन और अधिकार भी दिए जाते हैं. इसमें ग्राम सभा को सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना गया है. नियम है कि चुनाव में पूरे गाँव के अधिकृत मतदाता शामिल हों. यही ग्राम सभा पंचायत के कामों की निगरानी करने के लिए जिम्मेदार है.
राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस क्यों?
हर साल 24 अप्रैल को यह दिवस मनाया जाता है. इसी दिन साल 1993 को 73वां संविधान संशोधन पूरे देश में लागू हुआ. इसे कानूनी मंजूरी साल 1992 में मिली थी. इसी दिन को याद करते हुए राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है. इसका उद्देश्य ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत करना है. इस दिन पंचायतों के अच्छे कामों को सराहा जाता है. कई राज्यों और पंचायतों को पुरस्कार दिए जाते हैं. सरकारें नई योजनाओं की घोषणा भी करती हैं. यह दिन लोगों को पंचायतों की भूमिका के बारे में जागरूक करता है.
National Panchayati Raj Day to be celebrated Pan India on 24th April 2026
This year marks 33 years of that defining milestone in India’s democratic journey
The national event will be graced by Union Minister of State Prof. S. P. Singh Baghel
Report on
— PIB India April 23, 2026
क्या है देश में पंचायत चुनाव का इतिहास?
- भारत में स्थानीय स्वशासन की परंपरा बहुत पुरानी है. प्राचीन भारत में भी गांव स्तर पर पंचायतें होती थीं. ये पंचायतें विवाद सुलझाती थीं और प्रशासनिक काम भी देखती थीं.
- ब्रिटिश शासन के दौरान पंचायत व्यवस्था कमजोर हो गई. साल 1882 में लॉर्ड रिपन ने स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा देने की बात कही. इसे भारत में स्थानीय शासन की शुरुआत माना जाता है. इसके बाद भी पंचायतें पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाईं.
- आजादी के बाद पंचायतों को फिर से मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई. साल 1957 में बलवंत राय मेहता समिति बनाई गई. इस समिति ने तीन स्तरीय पंचायत व्यवस्था की सिफारिश की. इसके बाद कई राज्यों में पंचायत चुनाव शुरू हुए.
- साल 1978 में अशोक मेहता समिति बनी. इसने पंचायतों को और अधिक अधिकार देने की बात कही. इसके बावजूद पंचायतें कमजोर ही रहीं. कई जगह चुनाव समय पर नहीं होते थे. सरकारें पंचायतों को भंग कर देती थीं.
- फिर साल 1992 में बड़ा बदलाव आया. 73वां संविधान संशोधन पारित हुआ. इससे पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला. चुनाव नियमित रूप से कराने का प्रावधान किया गया. राज्य चुनाव आयोग की स्थापना की गई. वित्त आयोग भी बनाया गया जो पंचायतों को धन देने की सिफारिश करता है.
- इसके बाद पंचायत चुनाव देश भर में नियमित होने लगे. महिलाओं की भागीदारी बढ़ी. ग्रामीण स्तर पर लोकतंत्र मजबूत हुआ. कई गांवों में विकास कार्य तेज हुए. पर, अब यूपी जैसे मामले सामने है, जहां ड्यू डेट के बाद भी चुनाव नहीं हो पा रहे हैं.
- आज भी पंचायत चुनाव लोकतंत्र की नींव माने जाते हैं. ये लोगों को सीधे शासन से जोड़ते हैं. गांव के लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं. इससे जवाबदेही बढ़ती है. हालांकि, चुनौतियां अभी भी हैं. कई जगह पारदर्शिता की कमी है. वित्तीय संसाधन सीमित हैं. फिर भी पंचायत व्यवस्था भारत के लोकतंत्र का मजबूत आधार है.



