Satya Report: कहते हैं कि किसी भी फिल्म कहानी तब शानदार होती है, जब उसमें खलनायक ताकतवर होता है। बॉलीवुड के इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब सिनेमाघरों से बाहर निकलने के बाद दर्शकों के जेहन में हीरो की मुस्कान नहीं, बल्कि विलेन की दहाड़, उसकी दहशत, डायलॉग और उसका अंदाज घर कर गया। आज हम अपनी इस स्पेशल स्टोरी में उन्हीं खलनायकों के बारे में बताएंगे, जो हीरो से ज्यादा सुर्खियों में रहे। साथ ही यह बदलाव कब और कैसे आया सिनेमा डिकोड में आज हम इसका भी जिक्र करेंगे।

70s के बाद होने लगा बदलाव
शुरुआती सिनेमा में विलेन अक्सर जमींदार या साहूकार हुआ करते थे, जो सिर्फ कागजों पर अंगूठा लगवाते थे। लेकिन 70 के दशक तक आतेआते विलेन का किरदार ‘ग्रे’ और प्रभावशाली होने लगा। फिर विलेन को सिर्फ एक बुरा आदमी नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में पेश किया गया। जब विलेन के पास हीरो से बेहतर डायलॉग्स, अनोखा गेटअप और एक खौफनाक बैकग्राउंड म्यूजिक होने लगा, तब वह हीरो को टक्कर देने लगा।
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वो खलनायक जो हुए हीरो से ज्यादा चर्चित
गब्बर सिंह
अमजद खान ने गब्बर के किरदार से विलेन की परिभाषा ही बदल दी। फिल्म ‘शोले’ में जय और वीरू जैसे दो बड़े स्टार्स होने के बावजूद आज भी यह फिल्म गब्बर के नाम से जानी जाती है। गब्बर की हंसी, उसके पत्थरों पर रगड़ते जूते और “कितने आदमी थे?” जैसे डायलॉग्स ने उसे एक कल्ट फिगर बना दिया।
मोगैम्बो
अमरीश पुरी ने मोगैम्बो के रूप में एक ऐसा विलेन दिया जो किसी कॉमिक बुक के विलेन जैसा था। एक विशाल सिंहासन, मिसाइलें और अपनी ही दुनिया। मोगैम्बो की क्रूरता इतनी स्टाइलिश थी कि दर्शक हीरो के गायब होने से ज्यादा मोगैम्बो के “मोगैम्बो खुश हुआ” कहने का इंतजार करते थे।
कांचा चीना
चाहे डैनी डेन्जोंगपा का सोफिस्टिकेटेड अंदाज हो या संजय दत्त का बिना भौंहों वाला खौफनाक लुक कांचा चीना हमेशा हीरो पर भारी रहा। संजय दत्त के कांचा ने तो क्रूरता के सारे पैमानों को पार कर दिया था, जिससे वह ऋतिक रोशन के ‘विजय दीनानाथ चौहान’ किरदार से कहीं ज्यादा चर्चा में रहे।
राहुल मेहरा
यश चोपड़ा की फिल्म ‘डर’ में सनी देओल हीरो थे, लेकिन आज यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ शाहरुख खान के लिए जानी जाती है। इस फिल्म ने विलेन से नफरत करवाने के बजाय उसे ‘सहानुभूति’ और ‘दहशत’ के एक अजीब मिश्रण में बदल दिया। राहुल मेहरा कोई डकैत नहीं था, वह एक साधारण दिखने वाला लड़का था, जिसके अंदर एक सनकी आशिक छिपा था। हकलाते हुए बोला गया डायलॉग ‘ककक… किरण’ आज भी बॉलीवुड के सबसे आईकॉनिक डायलॉग्स में से एक है।
शाहरुख की उस सनक ने दर्शकों को इतना प्रभावित किया कि लोग हीरो के बजाय उस विलेन के बारे में ज्यादा बात करने लगे जो फोन पर धमकियां देता था। यहां से शुरुआत हुई ‘एंटीहीरो’ के उस दौर की, जहां बुराई को पर्दे पर क्यूट लेकिन जानलेवा दिखाया गया।
अलाउद्दीन खिलजी
संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावत’ में शाहिद कपूर ने एक आदर्श राजा का किरदार निभाया, लेकिन रणवीर सिंह का ‘अलाउद्दीन खिलजी’ पूरी फिल्म को निगल गया। खिलजी का किरदार किसी सभ्यता को नहीं मानता था। उसका खाना खाने का तरीका, उसका डांस और उसकी आंखों में छिपी हवस ने दर्शकों को न सिर्फ डराया बल्कि मंत्रमुग्ध भी किया।
आमतौर पर ऐतिहासिक फिल्मों में महान राजाओं की चर्चा होती है, लेकिन यहां खिलजी की ‘बर्बरता’ इतनी प्रभावशाली थी कि वह फिल्म का मुख्य आकर्षण बन गया। रणवीर सिंह ने विलेन के किरदार को एक ऐसी ‘लार्जर दैन लाइफ’ इमेज दी कि हीरो की सादगी उसके सामने फीकी लगने लगी।
रहमान डकैत
‘धुरंधर’ 5 दिसंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हुई है जिसमें अक्षय खन्ना ने रहमान डकैत का किरदार निभाया है। इस फिल्म से अक्षय का डांस काफी, उनका अंदाज ही लोगों को दीवाना बना गया। इसी वजह से पहले पार्ट में रणवीर से ज्यादा चर्चा विलेन बने अक्षय खन्ना की हुई थी।
क्यों हीरो पर भारी पड़ते हैं विलेन?
विलेन्स के हीरो से ज्यादा मशहूर होने के पीछे कुछ मनोवैज्ञानिक और सिनेमैटिक कारण हैं। सबसे पहले आजादी…. दरअसल, ज्यादातर फिल्मों में हीरो को हमेशा आदर्श दिखना होता है। वह गलत नहीं कर सकता, वह रो नहीं सकता, वह स्वार्थी नहीं हो सकता। लेकिन विलेन आजाद होता है। वह कुछ भी कर सकता है और यही अनप्रिडिक्टेबिलिटी दर्शकों को आकर्षित करती है।
इसके अलावा विलेन का स्टाइल और सिग्नेचर भी खास होता है। बॉलीवुड ने विलेन्स को बेहतरीन डायलॉग और लुक्स दिए जाते हैं, जो कई बार हीरो के सीधेसादे डायलॉग्स पर भारी पड़ जाते हैं और लोगों को वह पसंद आते हैं। वहीं, अब जैसेजैसे समय और बदलता जा रहा है वैसेवैसे विलेन के किरदारों में और भी बदलाव आ रहे हैं। अब विलेन बनने के लिए सिर्फ बड़ी मूंछों की जरूरत नहीं, बल्कि एक गहरी और डार्क पर्सनालिटी की जरूरत होती है।
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