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केजरीवाल का ‘न्यायिक सत्याग्रह’, जस्टिस स्वर्णकांता की बेंच से बनाई दूरी, बोले- अन्याय पर चुप रहना गांधी के आदर्शों के खिलाफ !

Satya Report: दिल्ली : दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और भारतीय न्यायपालिका के बीच एक संवैधानिक गतिरोध उत्पन्न हो गया है, जिसे भारतीय न्यायिक इतिहास में शायद ही देखा गया हो। केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच से दूरी बना ली है और इसके पीछे का कारण उनकी ‘रिक्यूज़ल’ वाली अर्जी को 20 अप्रैल 2026 को खारिज किया जाना है। केजरीवाल का दावा है कि इस आदेश के बाद भी उनकी न्याय की निष्पक्षता को लेकर बनी “गहरी आशंका” दूर नहीं हुई है।

केजरीवाल का ‘न्यायिक सत्याग्रह’, जस्टिस स्वर्णकांता की बेंच से बनाई दूरी, बोले- अन्याय पर चुप रहना गांधी के आदर्शों के खिलाफ !
केजरीवाल का ‘न्यायिक सत्याग्रह’, जस्टिस स्वर्णकांता की बेंच से बनाई दूरी, बोले- अन्याय पर चुप रहना गांधी के आदर्शों के खिलाफ !

जस्टिस स्वर्णकान्ता शर्मा जी से न्याय मिलने की मेरी उम्मीद टूट चुकी है।

अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनते हुए, गांधी जी के सिद्धांतो को मानते हुए और सत्याग्रह की भावना के साथ, मैंने फ़ैसला किया है कि मैं इस केस में उनके सामने पेश नहीं हूंगा और कोई दलील भी नहीं रखूँगा। pic.twitter.com/vhTSEZabqa

— Arvind Kejriwal April 27, 2026

अरविंद केजरीवाल ने इस प्रकरण को कानूनी लड़ाई के बजाय एक ‘न्यायिक सत्याग्रह’ के रूप में पेश किया है। उन्होंने महात्मा गांधी के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि जब एक नागरिक को व्यवस्था में अन्याय का आभास होता है, तो उसका पहला कर्तव्य विद्रोह नहीं बल्कि संवाद करना है। उनका मानना है कि जब उनकी अंतरात्मा ने उन्हें यह बताया कि उनकी चिंताओं का समाधान नहीं हुआ है, तो उन्होंने सत्याग्रह का मार्ग चुना।

केजरीवाल ने पत्र के माध्यम से एक गंभीर सवाल उठाया है और कहा है कि लोकतंत्र के हर स्तंभ की लड़खड़ाहट के बावजूद, जनता ने हमेशा न्यायपालिका पर उम्मीद जताई है। उनका कहना है कि उनका कदम न्यायपालिका को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि उसे और मजबूत और विश्वसनीय बनाने के लिए है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर एक पूर्व मुख्यमंत्री को न्याय नहीं मिल पा रहा है, तो यह सामान्य नागरिक के लिए चिंता का विषय है जो अदालत के दरवाजे पर खड़ा है।

हालांकि केजरीवाल ने इस बेंच से दूरी बना ली है, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वह कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के अपने संवैधानिक अधिकार को सुरक्षित रखा है और इसके लिए 90 दिनों की अवधि का हवाला दिया है। उन्होंने इसे एक ‘जिम्मेदार नागरिक के कर्तव्य’ के रूप में देखा और यह संदेश देने की कोशिश की कि वह सिद्धांतों के लिए किसी भी परिणाम को भुगतने के लिए तैयार हैं।

अरविंद केजरीवाल का यह ‘न्यायिक सत्याग्रह’ न केवल कानूनी हलकों में हलचल पैदा कर रहा है, बल्कि यह जनता को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वे सिद्धांतों से समझौता नहीं करेंगे और न्याय की प्राप्ति के लिए किसी भी परिणाम का सामना करने के लिए तैयार हैं।

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