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‘मुआवजे पर 30 दिनों में फैसला ले जिला प्रशासन, आयोग नहीं’, महाकुंभ भगदड़ मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट

Satya Report: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जनवरी, 2025 के महाकुंभ मेला भगदड़ मामले में स्पष्ट किया कि पीड़ितों को अनुग्रह मुआवजे के दावों का निर्णय जिला प्रशासन और मेला प्राधिकरण द्वारा 30 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए, न कि राज्य द्वारा नियुक्त न्यायिक जांच आयोग द्वारा।

‘मुआवजे पर 30 दिनों में फैसला ले जिला प्रशासन, आयोग नहीं’, महाकुंभ भगदड़ मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट
‘मुआवजे पर 30 दिनों में फैसला ले जिला प्रशासन, आयोग नहीं’, महाकुंभ भगदड़ मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस सत्यवीर सिंह की पीठ संजय कुमार शर्मा द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जिसमें 29 जनवरी, 2025 को हुई भगदड़ में एक रिश्तेदार की मृत्यु के लिए मुआवजे की मांग की गई थी।

न्यायिक जांच आयोग के सचिव द्वारा दायर हलफनामे का अध्ययन करने के बाद पीठ ने पाया कि मुआवजे के लिए अभ्यावेदनों का निपटारा जांच के दायरे से बाहर है। हलफनामे में यह भी बताया गया कि आयोग ने याचिकाकर्ता की फाइल मेलााधिकारी को लौटा दी थी और मेला प्रशासन को सलाह दी थी कि वह इस मामले का फैसला अपने स्तर पर करे।

आयोग के कार्यक्षेत्र की जांच करते हुए कोर्ट ने पाया कि उसके प्राथमिक कार्य घटना के कारणों और परिस्थितियों का पता लगाना, भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सुझाव देना, जानमाल के नुकसान की जांच करना और मेला प्रशासन, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच समन्वय की जांच करना था।

महत्वपूर्ण बात यह है कि पीठ ने आगे टिप्पणी की कि मामले की सुनवाई के दौरान न तो अतिरिक्त महाधिवक्ता और न ही राज्य पैनल के वकील भगदड़ की घटना से इनकार कर सके। वास्तव में राज्य ने भी इस बात से इनकार नहीं किया कि उसने कुछ पीड़ितों के आश्रितों को पहले ही मुआवजा दे दिया है।

इस बात को ध्यान में रखते हुए पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि राज्य द्वारा यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किए जाने के मद्देनजर कि वास्तव में जानमाल का नुकसान हुआ था। आयोग को इस बात की आगे जांच करने की आवश्यकता नहीं है कि भगदड़ हुई थी या नहीं।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “जब राज्य ने स्वयं स्वीकार किया है कि ऐसी घटना घटी थी, तो आयोग को इस बात की आगे जांच करने की आवश्यकता नहीं थी कि वास्तव में भगदड़ हुई थी या नहीं। राज्य ने इस बात से इनकार नहीं किया है कि उसने कुछ मृतकों के आश्रितों को मुआवजा दिया है, इसलिए यह भी स्वीकारोक्ति है कि जानमाल का नुकसान हुआ था।”

दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी की 92 साल की पत्नी ने कर्नाटक हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है। जिसमें उसने कहा कि उसके स्वतंत्रता सेनानी पति के योगदान के सम्मान में भारत सरकार द्वारा उन्हें दी जा रही पेंशन को 2019 में रोक दिया गया था। जस्टिस सचिन शंकर मगदुम ने बुधवार को इस मामले में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया से जवाब मांगा।

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