Satya Report: बॉलीवुड फिल्मों और ओटीटी शोज़ ने इंटीमेट सीन ने एक ऐसी इमेज बना दी है, जहां सब कुछ परफेक्ट, स्मूद और एफर्टलेस लगता है। लेकिन क्या रियल लाइफ में इसका गलत असर पड़ रहा है? क्या हमारा दिमाग एक ऐसी तुलना में फंस गया है जो बेवजह है।

इस बारे में हमने क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट सेजल अग्रवाल से बात की, उन्होंने बताया कि हां काफी हद तक इसका असर रियल लाइफ रिश्तों और इंटीमेसी पर पड़ता है। उन्होंने कहा,”फ्रांसीसी मार्क्सवादी समाजशास्त्री और दार्शनिक Jean Baudrillard कहते हैं किसी की कॉपी ज्यादा देखते हैं, तो असली चीज़ कमज़ोर लगने लगती है।”
उन्होंने आगे कहा, ”फिल्मों में बोल्ड सीन ‘परफेक्ट’ दिखाते हैं , कोई झिझक नहीं, कोई डर नहीं। रियलिटी में दिमाग में बहुत कुछ चलता है, मेरी बॉडी कैसी दिख रही है, परफॉर्मेंस सही हो रही है या नहीं? जब वो मोमेंट खत्म होता है तो कई बार इसलिए सैटिस्फाइंग नहीं लगता क्योंकि हम अपना एक्सपीरियंस मूवी से कम्पेयर करते हैं।”
आपको बता दें, फिल्मों वाले इंटीमेट सीन इस वजह से बहुत आइडियल लगते हैं क्योंकि फिल्मों के बोल्ड सीन्स में सब कुछ प्लान्ड होता है। लाइटिंग, एंगल यहां तक कि एक्सप्रेशंस भी कंट्रोल्ड होते हैं। कोई ऑकर्डनेस या हेजीटेशन नहीं दिखती है।
वहीं रियल लाइफ अलग होती है। असल अनुभव नेचुरल होते हैं इस वजह से परफेक्ट नहीं होते हैं। रियल लाइफ में नर्वसनेस होती है, कन्फ्यूजन होता है और इमोशन्स शामिल होते हैं।
हमारा दिमाग कम्पेरिजन करता है और लोग अनजाने में स्क्रीन और रियलिटी की तुलना करने लगते हैं। लोग सोचने लगते है कि वैसा क्यों फील नहीं हो रहा जैसा फिल्मों में दिखता है।
व्यक्ति अपनी बॉडी, बिहैवियर और परफॉरमेंस को लेकर सोचने लगता है और फ्लो टूट सकता है।
इसलिए असल समस्या इंटीमेसी नहीं बल्कि वो उम्मीद है जो लोगों ने बोल्ड सीन देखकर बना ली है।



