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माता-पिता की हर संपत्ति पर बच्चों का हक नहीं होता! ये है कानून

Satya Report: हममें से ज्यादातर लोग यह मानकर बड़े होते हैं कि मातापिता की जायदाद पर सीधासीधा बच्चों का ही हक है. जब कोई मकान या जमीन सालों से परिवार का हिस्सा हो, तो यह धारणा और भी पक्की हो जाती है. लेकिन अगर आप भी इसी मुगालते में हैं, तो भविष्य में आपको संपत्ति के कानूनी पचड़ों का सामना करना पड़ सकता है. भारतीय कानून के नजरिए से जायदाद के मामलों में भावनाएं नहीं, बल्कि संपत्ति की प्रकृति मायने रखती है. कोई भी बच्चा अपने मातापिता की संपत्ति पर दावा कर सकता है या नहीं, यह इस एक बात पर निर्भर करता है कि वह जायदाद पुश्तैनी है या फिर खुद की मेहनत की कमाई से खरीदी गई है.

माता-पिता की हर संपत्ति पर बच्चों का हक नहीं होता! ये है कानून
माता-पिता की हर संपत्ति पर बच्चों का हक नहीं होता! ये है कानून

कैसे तय होता है आपका अधिकार?

कानून की भाषा में संपत्ति को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है. पहली, ‘सेल्फएक्वायर्ड’ यानी खुद की मेहनत से कमाई गई संपत्ति और दूसरी, ‘एंसेस्ट्रल’ यानी पुश्तैनी जायदाद. यही वह बुनियादी फर्क है जो यह तय करता है कि किसी संपत्ति में बच्चों को हिस्सा मिलेगा या नहीं. अक्सर पारिवारिक विवादों की जड़ यही गलतफहमी होती है कि हर तरह की प्रॉपर्टी पर जन्मसिद्ध अधिकार लागू होता है. सच्चाई यह है कि मातापिता की अपनी कमाई से बनाई गई संपत्ति पर कानून उन्हें यह पूरा अधिकार देता है कि वे उसका अपने हिसाब से निपटारा करें.

अगर किसी व्यक्ति ने अपनी खूनपसीने की कमाई और बचत से कोई घर, प्लॉट या दुकान खरीदी है, तो कानूनन उस पर सिर्फ और सिर्फ उसी व्यक्ति का मालिकाना हक होता है. इस ‘सेल्फएक्वायर्ड प्रॉपर्टी’ पर पिता अपनी मर्जी का मालिक होता है. वे चाहें तो इसे भविष्य में बेच सकते हैं, किसी करीबी को तोहफे में दे सकते हैं, या फिर वसीयत के जरिए किसी एक ही व्यक्ति के नाम कर सकते हैं. बच्चे इस संपत्ति पर कानूनी तौर पर कोई दबाव नहीं डाल सकते.

यहां एक और अहम कानूनी पेंच समझना जरूरी है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम , 1956 और सुप्रीम कोर्ट के कई स्पष्ट फैसलों के मुताबिक, अगर पिता को 1956 के बाद अपने पिता से कोई संपत्ति विरासत में मिली है, तो उसे भी पिता की ‘सेल्फएक्वायर्ड प्रॉपर्टी’ ही माना जाएगा. इस स्थिति में भी बच्चों का उस संपत्ति पर जन्म से कोई सीधा अधिकार नहीं बनता.

बच्चों को जन्मसिद्ध अधिकार कैसे मिलता है?

अब सवाल यह उठता है कि आखिर वो कौन सी स्थिति है जब बच्चों का प्रॉपर्टी पर पुख्ता अधिकार होता है. इसका जवाब है, पुश्तैनी जायदाद. अगर कोई संपत्ति परिवार में लगातार चार पीढ़ियों से बिना किसी बंटवारे के चली आ रही है, तो वह पुश्तैनी जायदाद की श्रेणी में आती है. ऐसी संपत्ति को ‘हिंदू अविभाजित परिवार’ का हिस्सा माना जाता है.

इस मामले में नियम बिल्कुल साफ हैं. ऐसी संपत्ति में बच्चों को जन्म लेते ही अधिकार मिल जाता है. पिता इस जायदाद को लेकर अकेले कोई फैसला नहीं कर सकते. इसे बेचने या किसी को ट्रांसफर करने के लिए परिवार के सभी हिस्सेदारों की रजामंदी लेना अनिवार्य होता है. यहां तक कि अगर परिवार में कोई सदस्य नाबालिग है, तो उसके मातापिता उसकी तरफ से कानूनी फैसले लेते हैं, लेकिन उसके हिस्से को खत्म नहीं किया जा सकता.

कैसे करें पुश्तैनी जायदाद की सही पहचान?

किसी भी संपत्ति को पुश्तैनी साबित करने के लिए कुछ कड़े कानूनी मापदंड होते हैं. सबसे पहली शर्त यह है कि वह संपत्ति कम से कम चार पीढ़ियों से परिवार का हिस्सा हो. दूसरी बात, उस संपत्ति का अब तक कोई कानूनी बंटवारा न हुआ हो और वह पिता की तरफ के पूर्वजों से ही मिली हो.

यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि अगर कोई संपत्ति किसी को उपहार के रूप में मिली है, वसीयत के जरिए हासिल हुई है या फिर व्यक्ति ने खुद अपने पैसों से खरीदी है, तो कानून उसे किसी भी सूरत में पुश्तैनी नहीं मानेगा.

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