मिजोरम में मिजो विवाह और संपत्ति उत्तराधिकार कानून 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिए शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है. याचिका में कहा गया है कि यह संशोधन उन मिजो महिलाओं के साथ भेदभाव करता है जो गैरमिजो पुरुषों से शादी करती हैं. याचिका में दावा किया गया है कि मिजोरम में विवाह, तलाक और विरासत से संबंधित कानूनी ढांचे से ऐसी महिलाओं को बाहर रखा गया है.

ये याचिका लालसांगलियानी कोलनी ने दायर की है. यह याचिका एक मिजो महिला ने 1984 में एक गैरमिज़ो पुरुष से शादी करने के मामले में दायर की गई है. याचिका में यह भी कहा गया है कि यह संशोधन सीधे तौर पर उन पर, उनकी बेटी, पोतेपोतियों और उन सभी मिज़ो महिलाओं पर असर डालता है जो गैरमिजो पुरुषों से शादी करती हैं.
याचिका में कौन से संशोधनों को दी गई चुनौती
लालसांगलियानी कोलनी की ओर से दायर याचिका में मिज़ो विवाह, तलाक और संपत्ति उत्तराधिकार अधिनियम, 2014 की धारा 2, 3 , 25 और 26 में किए गए संशोधनों को चुनौती दी गई है. मिज़ो विवाह को लेकर विवाद मिज़ोरम के Mizo Marriage and Inheritance of Property Bill, 2026 से शुरू हुआ है, जो फरवरी 2026 में विधानसभा में पास हुआ.
इस कानून से महिलाओं की पहचान और ST स्टेटस पर प्रभाव पड़ेगा. बिल के मुताबिक अगर कोई मिजो महिला किसी नॉनमिज़ो से शादी करती है, तो वह अपनी मिजो पहचान खो देगी. उसके बच्चे और पोतेपोती भी Scheduled Tribe का दर्जा और लाभ नहीं पा सकेंगे.
कानून का हो रहा विरोध
मिजोरम की सबसे बड़ी महिला संगठन ने बिल को महिलाओं के खिलाफ और असुरक्षित बताते हुए वापस लेने की मांग की है. उन्होंने कहा कि उन्हें बिल बनाने में शामिल नहीं किया गया, जबकि वे Mizo Customary Law Committee का हिस्सा हैं. महिलाओं के अधिकारों, संवैधानिक समानता और जनजातीय पहचान के संरक्षण पर बहस छिड़ी है.



