सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बुधवार को एक अहम टिप्पणी की. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है जहां बहुमत का शासन है, लेकिन बहुसंख्यकवाद संवैधानिकवाद पर हावी नहीं हो सकता है. साथ ही कहा कि अदालतों को संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णयों का परीक्षण करना चाहिए. अदालत की इस टिप्पणी को इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि देश की कई निचली अदालतों ने बहुसंख्यकवाद को ध्यान में रखते हुए फैसले सुनाए हैं.

सबरीमाला मामले की सुनवाई जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने ये टिप्पणी की हैं. जिसमें भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित सात बड़े कानूनी प्रश्न शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा बहुत सीमित है. न्यायालयों को सामान्यतः इस विषय को विधायिका पर छोड़ देना चाहिए
बहुसंख्यकवाद शब्द के इस्तेमाल पर उठे सवाल
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह दलील स्वीकार्य नहीं है. इसका मतलब यह है कि सिर्फ बहुसंख्यकवाद के कारण, हमें ऐसा नहीं करना चाहिए? मेहता ने बहुसंख्यकवाद शब्द के प्रयोग पर सवाल उठाया. कहामुझे खेद है, यह लोकतंत्र है. लोकतंत्र का अर्थ है बहुमत है. मामले पर सुप्रीम कोर्ट में कल भी सुनवाई जारी रहेगी.
क्या है सबरीमाला केस?
सबरीमाला केस केरल के प्रसिद्ध भगवान अयप्पा मंदिर से जुड़ा एक मामला है, जो अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. मंदिर की परंपरा के मुताबिक 1050 साल की महिलाओं को प्रवेश पर पाबंदी थी, क्योंकि अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है. 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने 4:1 बहुमत से यह पाबंदी असंवैधानिक करार दिया. कोर्ट ने कहा कि यह महिलाओं के धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है और महिलाओं को सभी उम्र में प्रवेश की अनुमति दी. इस फैसले के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और इसे धार्मिक परंपरा में हस्तक्षेप बताया गया. 2026 में इस केस में रिव्यू पिटीशन डाली गई, जिसकी अब 9 जजों की बड़ी बेंच सुनवाई कर रही है.



