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शी जिनपिंग से ‘हेल्प’ मांगने चीन गए हैं डोनाल्ड ट्रंप? एयरपोर्ट पर उतरते ही लगा दोहरा झटका

चीन पहुंचे ट्रंप को दोहरा झटका लगा है. जब वह बीजिंग में उतरे, तो राष्ट्रपति जिनपिंग अगवानी करने खुद नहीं आए. उधर, चीन ने ताइवान को हथियार बेचने को लेकर अमेरिका को चेतावनी दे दी है. पिछले साल दिसंबर में ही अमेरिका ने ताइवान को 11 अरब डॉलर के हथियार सेल पैकेज को मंजूरी दी थी. ऐसे में ट्रंप की मंशा अधूरी रह सकती है.

शी जिनपिंग से ‘हेल्प’ मांगने चीन गए हैं डोनाल्ड ट्रंप? एयरपोर्ट पर उतरते ही लगा दोहरा झटका
शी जिनपिंग से ‘हेल्प’ मांगने चीन गए हैं डोनाल्ड ट्रंप? एयरपोर्ट पर उतरते ही लगा दोहरा झटका

चीन पर कई तरह की पाबंदियां लगाकर कोसने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समय बीजिंग में हैं. ट्रंप का आज सुबह जब बीजिंग में पारंपरिक स्वागत किया जा रहा था, तो कैमरे में चारों तरफ लाल झंडे चमक रहे थे. जिनिपिंग और ट्रंप ने हाथ तो मिलाया, लेकिन शी के चिरपरिचित अंदाज के कारण दोनों में गर्मजोशी नदारद रही. कैमरे ने जूम किया तब दिखा कि शी थोड़ा मुस्कुराए थे. हालांकि, ट्रंप को चीन में दोहरा झटका लगा है. बीजिंग एयरपोर्ट पर ट्रंप की अगवानी करने शी खुद नहीं गए, बल्कि उपराष्ट्रपति हान झेंग को भेज दिया. इसके अलावा, ताइवान को हथियार बेचने से रोकने के लिए चीन ने कुछ घंटे पहले ही अमेरिका को चेतावनी जारी की. यह अमेरिका को अच्छा नहीं लगेगा. अब पता चला है कि चीन को लगभग हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोसने वाले ट्रंप एक खास मकसद से चीन गए हैं. पहले पढ़िए शी से मिलकर ट्रंप ने क्या कहा.

गार्ड ऑफ ऑनर के बाद दोनों देशों का प्रतिनिधिमंडल आमनेसामने बैठा. ट्रंप बोले मिस्टर प्रेसिडेंट मेरा यहां होना सम्मान की बात है. दोनों देशों के संबंध बेहतर होने जा रहे हैं, जैसे पहले कभी नहीं रहे. यह सबसे लंबा रिलेशनशिप रहा है. परेशानियां आईं. मैंने आपको कॉल किया. आपने मुझे कॉल किया. लोग नहीं जानते हैं कि हमने अपनी समस्याओं को जल्दी दूर करने का प्रयास किया. आप ग्रेट लीडर हैं. मेरे साथ शानदार बिजनसमैन आए हैं. टॉप 30… मैं सेकेंड या थर्ड नहीं चाहता. मैं केवल टॉप चाहता हूं.

शी जिनपिंग से क्या चाहते हैं ट्रंप?
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलेंगे, तो वह ईरान के साथ अपने महंगे और अलोकप्रिय युद्ध को सुलझाने में मदद मांग सकते हैं. हालांकि, उन्हें चीन से सहयोग मिलने की संभावना कम ही है.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि भले ही शी ईरान के नेताओं को बातचीत की मेज पर वापस लाने के लिए राजी हो जाएं, पर चीन के नेता पश्चिम एशिया में अपने सबसे अहम साझीदार को आर्थिक मदद देना बंद करने या उसकी सेना को जरूरत के हिसाब से दोहरे इस्तेमाल वाले सामान की सप्लाई को रोकना नहीं चाहेंगे.

चीन पर ट्रंप की प्रेशर पॉलिटिक्स!
हां, ट्रंप के पास चीन पर दबाव बनाने के लिए कई टूल हैं. इसमें चीन के बड़े बैंकों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी शामिल है. हालांकि, इन टूल्स का इस्तेमाल करने की कीमत अमेरिका को बहुत ज्यादा चुकानी पड़ सकती है, जो शायद उसे मंजूर न हो. अमेरिका और ईरान के बीच टकराव खत्म करने के लिए किसी समझौते की उम्मीदें अब धुंधली पड़ गई हैं. संकट की वजह से तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और दोनों देशों के बीच सीजफायर भी कमजोर पड़ता दिख रहा है.

चीनईरान की दोस्ती ट्रंप को पता है
इस बैठक की तैयारियों से जुड़े दो लोगों ने समाचार एजेंसी को बताया है कि ट्रंप के सहयोगी शी जिनपिंग को उन चुनिंदा ताकतों में से एक मानते हैं, जो तेहरान के फैसला लेने वाले नेताओं को वॉशिंगटन के साथ कोई समझौता करने के लिए राजी कर सकते हैं. चीन ही ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है.

चीन क्या चाहता है?
वॉशिंगटन का मकसद चीन के नेताओं को यह समझाना हो सकता है कि इस युद्ध का अभी खत्म हो जाना उनके अपने ही फायदे में है. हालांकि, चीन के अपने अलग हित हैं. एक तरफ वह होर्मुज को खुलवाना चाहता है, जिसे ईरान की सेना ने रोक रखा है. दुनिया के कुल तेल सप्लाई का पांचवां हिस्सा और चीन जाने वाला ज्यादातर तेल इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है.

अंदर ही अंदर खुश होंगे जिनपिंग
ईरान एक अहम क्षेत्र में चीन का रणनीतिक सहयोगी बना हुआ है और अमेरिका के मुकाबले एक मजबूत ताकत के तौर पर डटा है. यह युद्ध, भले ही चीन के लिए आर्थिक तौर पर नुकसानदेह हो, लेकिन इसने अमेरिका का ध्यान कूटनीतिक और सैन्य दोनों तरीकों से हिंदप्रशांत क्षेत्र से हटा दिया है. यही वजह है कि शी के लिए ईरान पर अपने असर का इस्तेमाल करके उसे बड़ी रियायतें देने के लिए राजी करना मुश्किल हो जाता है. अंदर ही अंदर शी खुश हो रहे होंगे.

वॉशिंगटन स्थित काउंसिल फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल रिलेशंस थिंक टैंक की सीनियर फेलो हेनरिटा लेविन का कहना है कि शी इस शिखर सम्मेलन में बढ़े हुए आत्मविश्वास के साथ हिस्सा ले रहे हैं. उन्हें इस बात से और भी ज्यादा हौसला मिला है कि ट्रंप ने पिछले साल शुरू की गई टैरिफ वाली मुहिम से अपने कदम पीछे खींचलिए हैं और उन्हें यह भी लग रहा है कि ईरान में चल रहे अमेरिकी टकराव की वजह से अमेरिका के जरूरी सैन्य संसाधन पड़ोस वाले इलाके से हटकर कहीं और लग रहे हैं.

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