गृह मंत्री अमित शाह ने एक पर कहा, “यह बताते हुए खुशी हो रही है कि ‘ऑपरेशन RAGEPILL’ के जरिए, हमारी एजेंसियों ने पहली बार 182 करोड़ रुपये की कीमत का ‘कैप्टागॉन’ जब्त किया है, जिसे जिहादी ड्रग भी कहा जाता है. कैप्टागॉन दुनियाभर में जिहादी ड्रग और गरीबों का कोकीन भी कहा जाता है, एक खतरनाक सिंथेटिक उत्तेजक है. मूल रूप से 1960 के दशक में बीमारियों के इलाज के लिए बनी यह दवा अब अवैध तस्करी और चरमपंथी गतिविधियों का हथियार बन चुकी है. खास बात यह है कि आज बाजार में मिलने वाली ज्यादातर कैप्टागॉन नकली हैं, जिन्हें गुप्त लैब में एम्फेटामाइन और कैफीन जैसे रसायनों से बनाया जाता है. मध्यपूर्व से लेकर एशिया तक, यह ड्रग संगठित अपराध और आतंकी फंडिंग का बड़ा जरिया बन गया है.

यह मूल रूप से फेनेथिलाइन नामक एक सिंथेटिक उत्तेजक दवा थी, जिसे 1960 के दशक में न्यूरोडेवलपमेंटल और नार्कोलेप्सी जैसी बीमारियों के इलाज के लिए बनाया गया था. लेकिन इसकी लत लगाने की प्रवृत्ति और दुरुपयोग की संभावना के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे बैन कर दिया गया है.
Modi govt is resolved for a DrugFree India.
Glad to share that through Operation RAGEPILL, our agencies have achieved the firstever seizure of Captagon, the socalled Jihadi Drug, worth ₹182 crore.
The busting of the drug consignment destined for the Middle East and
— Amit Shah May 16, 2026
जानकारों के मुताबिक अब अवैध बाजारों में मिलने वाली अधिकांश कैप्टागॉन गोलियां नकली हैं. ये असली फेनेथिलाइन नहीं होती, बल्कि सीरिया, लेबनान और तुर्की जैसे देशों की गुप्त लैब में बनाई जाती हैं. इनमें एम्फेटामाइन, कैफीन, मेथाम्फेटामाइन और अन्य सिंथेटिक उत्तेजक पदार्थों का मिश्रण पाया जाता है.
क्यों कहा जाता है ‘जिहादी ड्रग’?
अंतरराष्ट्रीय मीडिया और खुफिया एजेंसियां इसे जिहादी ड्रग इसलिए कहती हैं क्योंकि सालों से संघर्ष क्षेत्रों और चरमपंथी नेटवर्कों में इसके इस्तेमाल के सबूत मिले हैं. यह ड्रग उपयोगकर्ताओं को डर और थकान दबाने, लंबे समय तक सक्रिय रहने, आक्रामकता बढ़ाने और तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी काम करने में सक्षम बनाती है.
क्या हैं इसके प्रभाव?
कैप्टागॉन का सेवन करने वाले अत्यधिक सतर्क और ऊर्जावान हो जाते हैं. यह ड्रग भूख और थकान को दबाता है, लंबे समय तक जागने की क्षमता देती है, आत्मविश्वास और आक्रामकता को बढ़ाती है. हालांकि, इसके कई नुकसान भी हैं, यह फैसले लेने की क्षमता को कम करती है, आवेगपूर्ण और जोखिमपूर्ण व्यवहार को प्रोत्साहित करता है. बारबार सेवन से मानसिक निर्भरता विकसित हो जाती है.
तस्करी से होता है भारी मुनाफा
कैप्टागॉन की तस्करी से भारी मुनाफा होता है. इसका पैसा कई संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में संगठित अपराध, अवैध नेटवर्क और कथित चरमपंथी गतिविधियों के वित्तपोषण में इस्तेमाल होता है. इसे गरीबों का कोकीन भी कहा जाता है क्योंकि इसकी उत्पादन लागत बहुत कम है, लेकिन अवैध मांग बेहद ज्यादा है.
रिपोर्ट अमोद राय



